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Samkaleenta Aur Sahitya

Samkaleenta Aur Sahitya

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  • Pages: 308p
  • Year: 2015, 2nd Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126718863
  •  
    जब मैं बैंक में काम करता था, एक भिखारी था जो थोड़े अन्तराल से बैंक आता और रोकड़िया के काउंटर पर जाकर बहुत सारी चिल्लर अपनी थैली से उलट देता, फिर अपनी अंटी से, कभी अपनी आस्तीन से तुड़े-मुड़े नोट निकाल कर एक छोटी-सी ढेरी लगा देता । कहता, इसे जमा कर लीजिए । उसके आने से मजा आता, आश्चर्य भी होता और एक किस्म की खीज भी होती-उन नोटों और गन्दी-सी चिल्लर को गिनने में । उस रोकड़िया जैसी ही स्थिति मेरी भी होती है जब समय-समय पर लिखी गई, छोटी-बड़ी टिप्पणियों को जमा कर उनकी किताब बनाने लगता हूँ । इस पूरी प्रक्रिया में लेकिन भिखारी भी मैं ही हूँ और रोकड़िया भी । सारी चिल्लर और नोट गिन लिए जाते तब पता लगता कि राशि कम नहीं हैं-कुल जमा काफी अच्छा खासा है । ऐसा आश्चर्य कभी-कभी मुझे भी होता है । पृष्ठ गिनने लगता हूँ तो लगता है कि बहुत कुछ जमा हो गया है । सबकुछ चोखा नहीं है, कुछ खोटे सिक्के और फटे हुए नोट भी हैं । इस दूसरी नोटबुक में इतना ही फर्क है कि इसमें गद्य की कुछ किताबों पर गाहे-बगाहे लिखी गई टिप्पणियों को भी शामिल किया गया है । पहली नोटबुक के फ्लैप पर मैंने कहा था कि लिखने के सरि कौशल सिर्फ रचनाकार की क्षमताओं से ही पैदा नहीं होते हैं, कई बार वह अक्षमताओं से भी जन्म लेते हैं । ये नोट्‌स और टिप्पणियाँ मेरी क्षमताओं के बनिस्वत मेरी अक्षमताओं से ज्यादा पैदा हुई हैं । मुझे लगता था कि बाजार हिन्दी की कविता का कभी कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा क्योंकि न तो इस क्षेत्र में अधिक पैसा है, न ही कीर्ति के कोई बहुत बड़े अवसर ही हैं । पर मैं गलत था । बाजार एक प्रवृत्ति है । इसका ताल्लुक अवसर, पैसे या कीर्ति से नहीं है । हिन्दी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य जिस तरह के घमासान और निरर्थक विवादों से भरा नजर आ रहा है, वह बाजार के ही प्रभाव का परिणाम है । विगत तीन दशकों की कविता का जैसा मूल्यांकन होना चाहिए, वह नहीं हो पा रहा हे । 'आलोचना से यह उम्मीद तब तक निरर्थक ही होगी जब तक कि कवि स्वयं इस दृश्य के मूल्यांकन की कोशिश नहीं करेंगे । यही हालत गद्य की भी हे, विशेष रूप से कहानी और उपन्यास की । उसमें हल्ला अधिक है, सार्थक विमर्श और साफ बोलने वाली आलोचना कम । आलोचना का एक बड़ा हिस्सा या तो उजड़ता और अहंकार से भरा है या 'अहो रूपम् अहो धनी: ' के शोर से । एक कवि और कथाकार ही इसमें हस्तक्षेप कर सकता है । उसी की जरूरत है । -राजेश जोशी

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    Rajesh Joshi

    जन्म: 18 जुलाई, 1946 नरसिंहगढ़, मध्यप्रदेश।

    किस्सा कोताह (उपन्यास), समरगाथा (एक लम्बी कविता) के साथ ही पाँच कविता संग्रह: एक दिन बोलेंगे पेड़, मिट्टी का चेहरा, नेपथ्य में हँसी, दो पंक्तियों के बीच, चाँद की वर्तनी

    धूप घड़ी (एक दिन बोलेंगे पेड़ और मिट्टी का चेहरा का संयुक्त संस्करण), गंेद निराली मीठू की (बच्चों के लिए कविताएँ), ब्रह्मराक्षस का नाई (बच्चों के लिए नाटक), सोमवार और अन्य कहानियाँ तथा कपिल का पेड़: कहानी संग्रह।

    जादू जंगल, अच्छे आदमी, तुम सआदत हसन मंटो हो, पाँसे, सपना मेरा यही सखी, हमें जवाब चाहिए: नाटक;

    एक कवि की नोटबुक तथा एक कवि की दूसरी नोटबुक: समकालीनता और साहित्य: आलोचनात्मक टिप्पणियों का संग्रह।

    पतलून पहिना बादल (मायकोव्स्की की कविताओं का अनुवाद), भूमि का कल्पतरु यह (भर्तृहरि की कविताओं की अनुरचना); कविताओं का अनेक भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद।

    इसलिए पत्रिका का कुछ वर्ष तक प्रकाशन एवं संपादन। नया पथ के निराला शताब्दी अंक के साथ ही पाँच अंक तथा वर्तमान साहित्य के कविता विशेषांक का संपादन।

    त्रिलोचन के कविता संग्रह ताप के ताए हुए दिन, नागार्जुन संचयन, शरद बिल्लौरे का कविता संग्रह तय तो यही हुआ था तथा नाटक अमरू का कुर्ता का संपादन।

    साहित्य अकादेमी सम्मान 2002, श्रीकान्त वर्मा स्मृति सम्मान, पहल सम्मान, शमशेर सम्मान, मुक्तिबोध सम्मान, माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार तथा शिखर सम्मान।

    आजकल स्वतन्त्र लेखन।

    संपर्क: 11 निराला नगर, भदभदा रोड, भोपाल-462003 (म.प्र.) दूरभाष: 0755-2770046

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