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Samay Se Aage

Samay Se Aage

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  • Pages: 207p
  • Year: 2005
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 8126709324
  •  
    डॉ. सीताराम झा ‘श्याम’ विरचित ‘समय से आगे’ शीर्षक उपन्यास जितना ही रोचक है, उतना ही प्रेरक और प्रभावक भी। इसमें विशाल एवं विस्तृत सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा बौद्धिक-सांस्कृतिक पट-भूमि पर समग्र मानव जीवन का अभूतपूर्व चित्रण किया गया है। वस्तुतः, जीवन के सभी पक्ष अपनी पूरिपूर्णता में व्यंजित हैं। मानव प्रेम एवं प्रकृति-प्रेम में समवाय सम्बन्ध दिखाते हुए प्रेम को नया विस्तार प्रदान किया गया है, जो जीवन में आशा का संचार करता है, विकास की नई दिशाओं की तलाश के लिए नई दृष्टि प्रदान करता है - शोषण, उत्पीड़न, प्रपीड़न से मुक्त होने तथा समस्त प्राणियों को निर्भर रहने का अमर सन्देश देता है। इस उपन्यस के कुछ पात्र - विभाकर, रंचना, नन्दिता, निदेश, चलित्तर, सुराजीदास, अनुपम आदि ऐसे हैं, जो धैर्य, साहस, आत्मबल, उत्साह, दूरदृष्टि, कर्मठता, दक्षता, ईमानदारी आदि मानवीय गुणों का उत्कृष्ट परिचय देकर जीवन को सफल-सार्थक बनाते हैं। इसके विपरीत, वल्लरी, सौदामिनी, पुरन्दर जैसे पात्र वर्तमान जीवन के संघर्षपूर्ण दौर में आगे बढ़ने के लिए छटपटाते तो हैं जरूर, पर उन्हें न तो आधार भूमि की परख है ओर न ही मंजिल का पता। इसी से आगे बढ़ने की अमर्यादित इच्छा उनके वर्तमान को तो विनष्ट कर ही देती है, गौरवपूर्ण अतीत से भी प्रेरणा लेने के योग्य नहीं रहने देती। ऐसी स्थिति में प्रोज्ज्वल भविष्य के दर्शन का सुयोग कैसे मिल सकता है? उपन्यास का पहला ही वाक्य अद्भुत प्रकाश फैला देता है अतीत से भविष्य तक ‘व्यक्ति बहुत कुछ बन जाने की भाग-दौड़ में मनुष्य बनना ही भूल जाता है।’ डॉ. श्याम के इस उपन्यास में मानवीय संवेदना की अप्रतिम अभिव्यंजना है - निश्चल संवेदना की वह मार्मिक व्यंजना, जो मनुष्यता की अनिवार्य शर्त है, जिसके बिना जीवन नीरस और निरर्थक बन जाता है। सम्पूर्ण उपन्यास पढ़ जाने पर किसी भी यह कहने में संकोच का अनुभव नहीं होगा कि ‘समय से आगे’ उपन्यास लेखन के क्षेत्र में नया प्रतिमान है।

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    Sitaram Jha Shyam

    सुविख्यात लेखक। आपके चालीस महार्घ ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। आपने 1963 में बिहार विश्वविद्यालय से हिन्दी भाषा साहित्य में एम.ए. किया तथा स्वर्णपदक प्राप्त किया। पटना विश्वविद्यालय से 1967 में पी-एच.डी. एवं 1972 में डी.लिट्. हुए। पटना विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग में युनिवर्सिटी प्रोफेसर तथा शोध-निर्देशक रहे। राष्ट्रीय चाणक्य पुरस्कार से सम्मानित। अंतर्राष्ट्रीय सहस्राब्दी स्वर्णपदक विभूषित (यू.एन. - आई.ए.ई.डब्ल्यू.पी., यू.एस.ए.)। राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री द्वारा ग्रंथों का लोकार्पण। अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन, लन्दन। भूदेव हिन्दी पदक सहित चार स्वर्णपदक प्राप्त। हिन्दी सलाहकार समिति, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार के मान्य सदस्य। प्रधानमंत्री हिन्दी सलाहकार समिति (विदेशों में हिन्दी) के मनोनीत सदस्य।

    श्याम-साहित्य के शिखर ग्रंथ: संसार को भारत का सारस्वत अवदान राष्ट्रपति भवन में महामहिम डॉ. शंकरदयाल शर्मा द्वारा लोकार्पित, नाटक और रंगमंच राष्ट्रपति में महामहिम ज्ञानी जैलसिंह द्वारा लोकार्पित, भारतीय स्वातंत्रय-संग्राम की रूपरेखा नई दिल्ली में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लोकार्पित एवं राष्ट्रीय चाणक्य पुरस्कार से सम्मानित, भाषा विज्ञान तथा हिन्दी भाषा का वैज्ञानिक विश्लेषण, राजभाषा हिन्दी: प्रगामी प्रयोग, तुलसीदास: साहित्य और दायित्व दर्शन, कामायनी: आवर्त और अभिव्यंजना, अध्ययन और अंतर्बोध।

    अन्य कृतियाँ: जिजीविषा, वर्तमान की पहचान, समय से आगे (उपन्यास), जिन्दगी: नजदीक से, नया आकाश, भागता अँधेरा (कहानी), मातृभूमि, विजय-केतु, सही दिशा, नई मंजिल (नाटक), स्तरीय निबन्ध (निबन्ध), अस्तित्व बोध, हम भारत के पहरेदार, गीत अमृत के सुन्दर (कविता), भारत भ्रमण, भव्य भारत, विदेश-यात्रा के अनुभव, वेद विश्लेषण (यात्रा-वृत्तांत), विश्व शान्ति और सांस्कृति एकता (चिंतन), भारतीय स्वातंत्रय-संग्राम और हिन्दी उपन्यास, पी-एच.डी., जिन्दी नाटक: समाजशास्त्रीय अध्ययन, डी.लिट्. (शोध-प्रबंध), भारतीय समाज का स्वरूप (संस्कृति समाजशास्त्र), काव्यशास्त्र: चिंतन और विवेचन (काव्यशास्त्र)।

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