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Ret Ret Lahoo

Ret Ret Lahoo

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  • Pages: 124p
  • Year: 2016, 2nd Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126701625
  • ISBN 13: 9788126701629
  •  
    जाबिर हुसेन अपनी शायरी को 'पत्थरों के शहर में शीशागरी' का नाम देते हैं। संभव है, एक नदी रेत भरी से रेत रेत लहू तक 'शीशागरी' का यह तकली$फदेह सफर खुद जाबिर हुसेन की नज़र में उनके सामाजिक सरोकारों के आगे कोई अहमियत नहीं रखता हो। संभव है, वो इन कविताओं को अपनी डायरी में दर्ज बेतरतीब, बेमानी, धुध-भरी इबारतें मानते रहे हों। इबारतें, जो कहीं-कहीं $खुद उनसे मंसूब रही हों, और जो अपनी तलिखयों के सबब उनकी याददाश्त में आज भी सुरक्षित हों। इबारतें, जिनमें उन्होंने अपने आप से गु$फ्तगू की हो, जिनमें अपनी वीरानियों, अपने अकेलेपन, अपने अलगाव और अपनी आशाओं के बिंब उकेरे हों। लेकिन इन कविताओं में उभरने वाली तीस्वीरें अकेले जाबिर हुसेन की अनुभूतियों को ही रेखांकित नहीं करतीं। अपने-आप को संबोधित होकर भी ये कविताएं एक अत्यंत नाज़ुक दायरे का सृजन करती हैं। एक नाज़ुक दायरा, जिसमें कई-कई चेहरे उभरते-डूबते नज़र आते हैं। जाबिर हुसेन की कविताएं, बेतरतीब $खाबों की तरह, उनके वजूद की रेतीली ज़मीन पर उतरती हैं, उस पर अपने निशान बनाती हैं। निशान, जो वक्त की तपिश का साथ नहीं दे पाते, जिन्हें हालात की तल्खयां समेट ले जाती हैं। और बची रहती है, एक टीस, जो एक-साथ अजनबी है, और परिचित भी। यही टीस जाबिर हुसेन की कविताओं की रूह है। एक टीस जो, जितनी उनकी है, उतनी ही दूसरों की भी! रेत रेत लहू की कविताएं बार-बार पाठकों को इस टीस की याद दिलाएंगी।

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    Zabir Hussain

    जाबिर हुसेन
    अंग्रेज़ी भाषा एवं साहित्य के प्राध्यापक रहे। जेपी तहरीक में बेहद सक्रिय भूमिका निभाई। 1977 में मुंगेर से बिहार विधान सभा के लिए चुने गए। काबीना मंत्री बने। बिहार अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष रहे।
    बिहार विधान परिषद् के सभापति रहे। राज्य सभा के सदस्य रहे।
    हिन्दी-उर्दू में दो दर्जन से ज़्यादा किताबें प्रकाशित। उर्दू-फारसी की लगभग 50 पांडुलिपियों का सम्पादन। उर्दू-हिन्दी की कई पत्रिकाओं का सम्पादन।

    रचनाएँ : रेत से आगे, चाक पर रेत, ये शहर लगै मोहे बन (हिंदी-उर्दू), डोला बीबी का मज़ार, रेत पर खेमा, जि़न्दा होने का सबूत, लोगां, जो आगे हैं, अतीत का चेहरा, आलोम लाजावा, ध्वनिमत काफी नहीं, दो चेहरों वाली एक नदी; कविता : कातर आँखों ने देखा, रेत-रेत लहू, एक नदी रेत भरी, उर्दू : अंगारे और हथेलियाँ, सुन ऐ कातिब, बे-अमां, बिहार की पसमांदा मुस्लिम आबादियाँ।

    सम्पादन : छह जिल्दों में बहार हुसेनाबादी का सम्पूर्ण साहित्य, मेरा सफ़र तवील है : अखतर पयामी, दीवारे शब, दयारे शब, हिसारे शब, निगारे शब (उर्दूनामा के अंक)।

    सम्मान : 2005 में उर्दू कथा-डायरी रेत पर खेमा के लिए साहित्य अकादेमी सम्मान। 2012 में नवें विश्व हिन्दी सम्मेलन (जोहान्सबर्ग, दक्षिण अफ्रीका) में विश्व हिन्दी सम्मान।
    सम्पर्क : 247 एमआईजी, लोहियानगर, पटना- 800020

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