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Rahasyavad

Rahasyavad

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  • Pages: 168
  • Year: 2018, 3rd Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9789387462205
  •  
    इस पुस्तक में रहस्यवाद जैसे गूढ़, गहन और अस्पष्ट विषय पर साहित्य और दर्शन के अध्येता डॉ. राममूर्ति त्रिपाठी ने स्पष्ट और सांगोपांग विवेचन प्रस्तुत किया है | पुस्तक पाँच अध्यायों में विभक्त है | प्रथम अध्याय-स्वरुप तथा प्रकार; द्वितीय अध्याय-अनुभूत रहस्य तत्त्व का स्वरुप; तृतीय अध्याय-रहस्यानुभूति की प्रक्रिया; चतुर्थ अध्याय-साधनात्मक रहस्यवाद; पंचम अध्याय-रहस्य की अभिव्यक्ति | रहस्यवाद के स्वरुप पर विचार करते हुए लेखक ने स्पष्ट किया है कि रहस्यवाद 'मिस्टीसिज्म' का रूपांतर नहीं है बल्कि स्वतंत्र शब्द है और स्वतंत्र रूप में यह शब्द भारतीय प्रयोगों के आधार पर सुनिश्चित अर्थ से सम्पन्न है | 'अनुभूत रहस्य तत्व का स्वरुप' बताते हुए लेखक ने उपनिषद, तंत्र एवं नाथ्सिद्ध विचार परम्परा के आधार पर रहस्यानुभूति की व्याख्या की है | पुस्तक का सबसे महत्त्पूर्ण अध्याय 'रहस्यानुभूति की प्रक्रिया' है जिसमें लेखक ने कबीर, जायसी आदि प्राचीन संत कवियों एवं प्रसाद, महादेवी आदि आधुनिक छायावादी कवियों के काव्य में प्राप्त रहस्यानुभूति के विविध रूपों का विवेचन किया है | रहस्यवादी कवियों की रूपगत और शिल्पगत विशेषताओं के विवेचन की दृष्टि से इस पुस्तक का अंतिम अध्याय 'रहस्य की अभिव्यक्ति' विशेष रूप से द्रष्टव्य है | जहाँ तक धर्म और रहस्य का सम्बन्ध है, निश्चय ही पश्चिम का religion भारतीय 'धर्म' का पर्याय नहीं है | अंग्रेजी के religion शब्द से विभिन्न जातीय ईश्वरोपासना की प्रणाली का बोध होता है | इसीलिए वहाँ मानव और ईश्वर के बीच का विश्वास ही धर्म कहा-सुना जाता है | अतएव उस दृष्टि से मत-परिवर्तन या धर्म-परिवर्तन भी हुआ करता है, किन्तु भारतीय दृष्टि से जो धर्म के स्वरुप पर विचार किया गया है वह कुल तीन दृष्टियों से दिखाई पड़ता है-तात्तिवक, पारलौकिक तथा ऐहिक या व्यावहारिक | तात्तिवकदृष्टि से धर्म वह वस्तु है, जिसके द्वारा प्रत्येक वस्तु अपने स्वरुप को धारण किए रहती है, जिससे शून्य होकर प्रत्येक वस्तु अपने आपको धारण नहीं कर सकती | वस्तुतः इस दृष्टि से 'स्वभाव' ही धर्म है, अतः यहाँ 'अधिकार-भेद' की बात कही गई है, इसीलिए वह अपरिवर्तनीय है | अग्नि का धर्म दाहकता या मनुष्य का धर्म मनुष्यता सर्वथा अपरिवर्तनीय तत्त्व हैं | इस प्रकार समस्त विश्व का धर्म वह तत्त्व है, जिससे विश्व आत्मरूप धारण किए हुए है | जिस प्रकार पिंड या शरीर का धारण पिंड-गत चेतना से है, विश्वव्याप्त चैतन्य से है | यही विश्वव्याप्त चैतन्य विश्व का धर्म है | इसी पुस्तक से

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    Dr. Ram Murti Tripathi

    जन्म: 4 जनवरी, 1929;

    जन्म-स्थान: नीवी कलाँ, वाराणसी (उ.प्र.)।

    शिक्षा: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम.ए., पी-एच.डी.; साहित्याचार्य, साहित्यरत्न।

    काव्यशास्त्र एवं दर्शन के प्रकांड पंडित। हिंदी विभाग, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त।

    प्रकाशित कृतियाँ: व्यंजना और नवीन कविता, भारतीय साहित्य दर्शन, औचित्य विमर्श, रस विमर्श, साहित्यशास्त्र के प्रमुख पक्ष, लक्षणा और उसका हिन्दी काव्य में प्रसार, रहस्यवाद, काव्यालंकार सार संग्रह और लघु वृत्ति की (भूमिका सहित) विस्तृृत व्याख्या, नृसिंह चम्पू (व्याख्या), हिन्दी साहित्य का इतिहास, कामायनी: काव्य, कला और दर्शन, आधुनिक कला और दर्शन, भारतीय काव्यशास्त्र के नए संदर्भ, भारतीय काव्यशास्त्र: नई व्याख्या, तंत्र और संत, आगम और तुलसी, रस सिद्धांत: नए संदर्भ (प्रस्तोता के रूप में)।

    निधन : 30 मार्च, 2009 |

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