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Pratinidhi Kavitayen : Srikant Verma

Pratinidhi Kavitayen : Srikant Verma

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  • Pages: 131p
  • Year: 2005
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8171785832
  •  
    श्रीकान्त वर्मा का कविता-संसार उनके पाँच कविता-संग्रहोंµभटका मेघ (1957), दिनारम्भ (1967), माया दर्पण (1967), जलसाघर (1973) और मगध (1984) में फैला हुआ है। यहाँ इन्हीं से इन कविताओं का चयन किया गया है। इन कविताओं से गुजरते हुए लगेगा कि कवि में आद्यन्त अपने परिवेश और उसे झेलते मनुष्य के प्रति गहरा लगावप है। उसके आत्मगौवर और भविष्य को लेकर वह लगातार चिन्तित है। उसमें यदि परम्परा का स्वीकार है तो उसे तोड़ने और बदलने की बेचैनी भी कम नहीं है। शुरू में उसकी कविताएँ अपनी जमीन और ग्राम्य जीवन की जिस गन्ध को अभिव्यक्त करती हैं, ‘जलसाघर’ तक आते-आते महानगरीय बोध का प्रक्षेपण करने लगती हैं या कहना चाहिए, शहरीकृत अमानवीयता के खिलाफ एक संवेदनात्मक बयान में बदल जाती हैं। इतना ही नहीं, उनके दायरे में शोषित-उत्पीड़ित और बर्बरता के आतंक में जीती पूरी-की-पूरी दुनिया सिमट आती है। कहने की जरूरत नहीं कि श्रीकान्त वर्मा की कविताओं से अभिव्यक्त होता हुआ यथार्थ हमें अनेक स्तरों पर प्रभावित करता है और उनके अन्तिक कविता-संग्रह ‘मगध तक पहुँचकर वर्तमान शासकवर्ग के त्रास और उसके तमाच्छन्न भविष्य को भी रेखांकित कर जाता है।

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    Shrikant Verma

    जन्म: 18 सितम्बर, 1931, बिलासपुर (म.प्र.) में। 1956 में नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एम.ए.। 1955-56 में बिलासपुर से नई दिशा का सम्पादन। फिर भविष्य की खोज में दिल्ली आ गए। कुछ दिनों भारतीय श्रमिक में उपसम्पादक। 1958 से 62 तक दिल्ली की विशिष्ट पत्रिका कृति का नरेश मेहता के साथ सम्पादन। 1964 से साप्ताहिक दिनमान से सम्बद्ध हुए। सन् 77 में दिनमान से त्यागपत्र।

    साहित्य के अलावा राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप। साठ के दशक में डॉ. राममनोहर लोहिया के सम्पर्क में आए। उनके विचार और कर्म से गहरे स्तर पर प्रभावित। डॉ. लोहिया के असामयिक निधन और समाजवादी आन्दोलन के बिखराव के बाद सन् 69 में श्रीमती इंदिरा गांधी से परिचय और कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय भागीदारी। सन् 67 में म.प्र. से राज्यसभा के सदस्य। सन् 80 में कांग्रेस (ई.) के चुनाव अभियान का संचालन। सन् 85 में कांग्रेस पार्टी के प्रमुख महासचिव और प्रवक्ता।

    फरवरी 86 में अस्वस्थ। कैंसर के इलाज के लिए अमेरिका गए। 25 मई, 1986 को अमेरिका के स्लोन केटरिंग मेमोरियल अस्पताल में निधन।

    सम्मान: म.प्र. शासन द्वारा ‘उत्सव-73’ में विशिष्ट लेखन के लिए सम्मानित। जलसाघर के लिए तुलसी सम्मान। सन् 81 में म.प्र. शासन का प्रथम शिखर सम्मान। सन् 84 में कुमार आशान, यूनाइटेड नेशंस इंडियन कौंसिल आफ यूथ एवार्ड और म.प्र. के नंददुलारे वाजपेयी पुरस्कार से सम्मानित। सन् 86 में मरणोपरान्त साहित्य अकादमी पुरस्कार और सन् 85 में इंदिरा प्रियदर्शिनी सम्मान से सम्मानित।

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