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Mahashkti Bharat

Mahashkti Bharat

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  • Pages: 507p
  • Year: 2005
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126710195
  •  
    इस ग्रन्थ के निबन्धों और हमारी वर्तमान विदेश नीति में एक तरह से आँख–मिचैनी चलती रहती है । कभी विदेश नीति आगे होती है और निबन्ध पीछे और कभी निबन्ध आगे होते हैं और विदेश नीति पीछे! जब निबन्ध पीेछे–पीछे चलता है तो वह हर विदेश नीति सम्बन्ध पहल की चीर–फाड़ करता है, कार्य–कारण में उतरता है, जड़ों तक पहुँचता है और दूध को दूध और पानी को पानी कहता है । ताँगे में जुते घोड़े को वह अगर पुचकारता है तो कभी–कभी उस पर चाबुक भी बरसाता है । इसके अलावा यह भी बताता है कि सरकार ने किसी खास मुद्दे पर जो पहल की है, उसे वह बेतहर ढंग से कैसे उठा सकती थी । जब निबन्/ा आगे–आगे चलता है तो उसकी कोशिश होती है कि विदेश नीति को वह अपने पीछे खींचता चले । भारत सरकार की पाकिस्तान–नीति की विचित्रताएँ और वक्रताएँ इन निबन्/ाों में जमकर अनावृत हुई हैं । लाहौर का आकाश और आगरा की खाई इस लेखक को जैसे पहले से दिखाई पड़ रही थी, अगर भारत सरकार को भी दिखाई पड़ जाती तो जिस निराशा के दौर में वह बाद में फँसी, वह नहीं फँसती । अन्य पड़ोसी देशों और महाशक्तियों के साथ भारत के सम्बन्धों के अन्त: सूत्रों को खोजने और उन्हें नए आयाम देने का प्रयत्न भी इन निबन्धों में हुआ है । इस ग्रन्थ के अधिकतर निबन्ध तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में हैं लेकिन हर तत्काल की जड़ें कई कालों तक फैली हुई होती हैं । व्यक्ति के अपने, अन्य व्यक्तियों के, राष्ट्रों के, संस्कृतियों के कालों तक! कालों के विशेष अनुभवों तक! प्रत्येक विश्लेषण में, वह कितना ही तात्कालिक हो, इन सब अनुभवों का निकष होता है । और सबसे बड़ी बात यह कि अपने मस्तिष्क में अगर कोई चिन्तन का ढाँचा हो, चिन्तन–प्रणाली हो तो अलग–अलग समय पर पिरोए गए अलग–अलग आकार–प्रकार के मोती भी अपने–आप सुघड़ माला का रूप धारण करते चले जाते हैं । वाद्य–यंत्रों की विभिन्नता के बावजूद जैसे आर्केस्ट्रा का संगीत समवेत और समरस होता है, वैसे ही विभिन्न विषयों और विभिन्न तिथियों पर लिखे गए ये निबन्/ा पाठकों को विदेश नीति चिन्तन की एक प्रणाली के अनुशासन में बँधे हुए लगेंगे ।

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    Ved Pratap Vaidik

    वेदप्रताप वैदिक

    अपने मौलिक चिन्तन, प्रखर लेखन और विलक्षण वक्तृत्व के लिए विख्यात। जन्म: 30 दिसम्बर, 1944 में इन्दौर में। सदा प्रथम श्रेणी के छात्र। फ़ारसी, रूसी और संस्कृत आदि भाषाओं के जानकार। दर्शन और राजनीतिशास्त्र मुख्य विषय। 1971 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से ‘अफ़गानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’ विषय पर पी-एच.डी.। दिल्ली के मोतीलाल नेहरू कॉलेज में राजनीतिशास्त्र का अध्यापन। ‘इंडियन कौंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च’  द्वारा अफ़गानिस्तान पर शोध-कार्य के लिए वरिष्ठ शोधवृत्ति। 1981 से 1983 के बीच ‘इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस’ तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय राजनय विभाग में ‘सीनियर फैलो’ के तौर पर शोध एवं अध्यापन। 1999 में विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित दक्षिण एशियाई विश्व-सम्मेलन में उद्घाटन-भाषण। लगभग दस वर्षों तक पी.टी.आई. भाषा के संस्थापक-सम्पादक और उसके पहले नवभारत टाइम्स के सम्पादक (विचार) रहे।

    छात्र-काल में वक्तृत्व के अनेक अखिल भारतीय पुरस्कार। साठ से अधिक देशों की यात्राओं के साथ भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में अनेक व्याख्यान।  अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व। दूरदर्शन और आकाशवाणी पर 1962 से अब तक अगणित कार्यक्रम। पिछले 40 वर्षों में राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मामलों पर सैकड़ों लेख, हजारों संपादकीय टिप्पणियाँ और दर्जनों शोध-पत्र प्रकाशित।

    कृतियाँ: अफ़गानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा, हिन्दी पत्रकारिता: विविध आयाम, भारतीय विदेश नीति: नये दिशा संकेत, एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका: इंडियाज़ ऑप्शन्स, हिन्दी का सम्पूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो?, भारतीय भाषाएँ लाओ, अंग्रेज़ी हटाओ, वर्तमान भारत, अफगानिस्तान: कल आज और कल।

    भारतीय भाषाओं के संघर्ष के प्रतीक। 1966 में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का शोधग्रन्थ हिन्दी में लिखने का आग्रह। स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज से इसी कारण निष्कासन। संसद में दो वर्ष तक अपूर्व हंगामा। राष्ट्रीय विवाद। अन्ततः विजय। पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले।

    अनेक सम्मानों से विभूषित। एकाधिक प्रतिष्ठित संस्थाओं में सक्रिय योगदान।

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