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  • Pages: 140p
  • Year: 2019, 7th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126705405
  •  
    भीष्म साहनी मूलत: कथाकार हैं, और नाट्य-लेखन के क्षेत्र में उनका पहला नाटक ‘हानूश’ ऐसा सशक्त प्रयास है जो भीष्म साहनी की प्रतिभा को रेखांकित करता है। इसकी पहली प्रस्तुति का ही दिल्ली में जैसा स्वागत हुआ, वह हिन्दी-रंगमंच के इतिहास की एक उपलब्धि है। चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग में आज से लगभग पाँच सौ साल पहले ताले बनानेवाले एक सामान्य मिस्त्री के दिमाग में घड़ी बनाने का भूत सवार हुआ, और तरह-तरह की विषम परिस्थितियों में लगातार सत्रह साल की कड़ी मेहनत के बाद वह चेकोस्लोवाकिया की पहली घड़ी बनाने में कामयाब हुआ, जो नगरपालिका की मीनार पर लगाई गई। लेकिन इतनी बड़ी सफलता के बाद उस कलाकार को क्या मिला? बादशाह ने उसकी आँखें निकलवा लीं कि वह उस तरह की दूसरी घड़ी न बना सके। चेक-इतिहास की इस छोटी-सी घटना ने भीष्म साहनी के रचनाकार को आन्दोलित किया, और यों हिन्दी में एक श्रेष्ठ नाटक जन्म ले सका। ‘हानूश’ के माध्यम से भीष्म साहनी ने एक ओर कलाकार की सृजन की अदम्य अकुलाहट और उसकी निरीहता को उजागर किया है तो दूसरी ओर धर्म एवं सत्ता के गठबन्धन के साथ सामाजिक शक्तियों के संघर्ष को मार्मिक अभिव्यक्ति दी है। कलाकार के आमूल तनावों का अंकन ‘हानूश’ की एक उपलब्धि है, जो आज भी उतने ही सच हैं जितने पाँच शताब्दी पहले थे।

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    Bhishm Sahni

    भीष्म साहनी

    जन्म : 8 अगस्त, 1915 को रावलपिंडी (पाकिस्तान) में।

    शिक्षा : हिन्दी-संस्कृत की प्रारम्भिक शिक्षा घर में। स्कूल में उर्दू और अंग्रेज़ी। गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए., फिर पंजाब विश्वविद्यालय से पीएच.डी.।

    बँटवारे से पूर्व थोड़ा व्यापार, साथ-साथ मानद (ऑनरेरी) अध्यापन। बँटवारे के बाद पत्रकारिता,

    ‘इप्टा’ नाटक मंडली में काम, बम्बई में बेकारी। फिर अम्बाला के  एक कॉलेज में तथा खालसा कॉलेज, अमृतसर में अध्यापन। तत्पश्चात् स्थायी रूप से दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में साहित्य का प्राध्यापन। इस बीच लगभग सात वर्ष ‘विदेशी भाषा प्रकाशन गृह’, मॉस्को में अनुवादक के रूप में कार्य। अपने इस प्रवासकाल में उन्होंने रूसी भाषा का यथेष्ट अध्ययन और लगभग दो दर्जन रूसी पुस्तकों का अनुवाद किया। करीब ढाई साल ‘नई कहानियाँ’ का सौजन्य-सम्पादन। ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ तथा ‘अफ्रो-एशियाई लेखक संघ’ से भी सम्बद्ध रहे।

    प्रकाशित पुस्तकें : भाग्य-रेखा, पहला पाठ, भटकती राख, पटरियाँ, ऌऌऌवाङचू, चीलें, शोभायात्रा, निशाचर, पाली, डायन (कहानी-संग्रह); तमस, झरोखे, कडिय़ाँ, बसंती, मय्यादास की माड़ी, कुंतो (उपन्यास); माधवी, हानूश, कबिरा खड़ा बजार में, मुआवजे, सम्पूर्ण नाटक (दो खंडों में)(नाटक); आज के अतीत (आत्मकथा); गुलेल का खेल (बालोपयोगी कहानियाँ)।

    सम्मान : अन्य पुरस्कारों के अलावा तमस  के लिए ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ तथा हिन्दी अकादमी, दिल्ली का ‘शलाका सम्मान’।

    साहित्य अकादेमी के महत्तर सदस्य भी रहे।

    निधन : 11 जुलाई, 2003

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