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Sambharant Veshya

Sambharant Veshya

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  • Pages: 87p
  • Year: 2006
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126711663
  •  
    ज्याँ पॉल सार्त्र के लेखन और चिन्तन के केन्द्र में है - मानवमुक्ति। अस्तित्ववाद से मार्क्सवाद तक की उनकी विचार यात्रा का केन्द्रीय तत्त्व भी शायद यही है। रंगभेद, वर्गभेद, भाषाभेद, धर्मभेद, जातिभेद से आक्रांत मानव समाज की विडम्बनाओं की ओर ही वे इशारा नहीं करते बल्कि इनके विरुद्ध संघर्ष में सक्रिय भागीदारी की भी तरफ़दारी करते हैं। अपने इस नाटक में उन्होंने न केवल गोरों की धूर्तता के शिकार एक हब्सी की पीड़ा को व्यक्त किया है बल्कि, इसके माध्यम से नस्लभेदी व्यवस्था पर गहरी चोट की है। यह एक विडम्बना ही है कि पुनर्जागरण के इतने सारे आन्दोलनों के बाद भी विश्वसमाज अच्छे-बुरे तथा सही-गलत का निर्णय मानवीय विवेक के आधार पर लेने के बजाय जाति, नस्ल, भाषा, धर्म आदि के पूर्वग्रहों से ग्रस्त होकर लेता है। ऐसे में हर बार समाज का निचला तबका उ$परी तबके की चालाकियों की मार झेलने पर मजबूर हो जाता है। दक्षिणी अमेरिका की पृष्ठभूमि पर आधारित यह नाटक आज के भारतीय समाज की विसंगतियों पर भी परोक्ष चोट करता प्रतीत होता है।

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    Jean Paul Sarte

    जन्म: 21 जून, 1905; पेरिस, फ्रांस में।

    पेरिस जलसेना अधिकारी ज़ाँ बापतिस्त और ऐन-मरी सार्त्र की गोद ली हुई सन्तान ज़ाँ पॉल सार्त्र की शिक्षा-दीक्षा फ्रांस के अलावा मिस्र, इटली, ग्रीक और जर्मनी में एडमुंड हुसेर्ल और मार्टिन हाइडेगर की देखरेख में हुई। विचारों से नास्तिक व साम्यवाद के समर्थक सार्त्र ने कभी किसी पार्टी की सदस्यता नहीं ली और चालीस के दशक में फ्रांसीसी सेना में भी रहे। सन् 1940-41 में वे युद्धकैदी के रूप नौ महीने जर्मनी रहे। ‘फ्रेंच रैली ऑफ रिवसेल्यूशनरी डेमोक्रेट्स’ के संस्थापकों में भी वे एक थे। 1941-44 ‘रजिस्टेंश मूवमेंट’ के लिए भूमिगत रूप से उन्होंने उसके समाचार पत्रों कॉम्बात और ललेत्र फ्रांत्सुवा के लिए काम किया।

    एक दार्शनिक और लेखक के रूप में उन्होंने उपन्यास, नाटक, पटकथाएँ, आत्मकथाएँ व साहित्यिक-राजनीतिक आलोचनाएँ लिखीं।

    सम्मान: 1940 में ल मूर के लिए उन्हें रोमां पोपुलिस्त पुरस्कार मिला। 1945 में उन्होंने फ्रेंच लेज़ाँ दोनॉर सम्मान ठुकरा दिया। 1947 में न्यूयॉर्क ड्रामा क्रिटिक लॉ नौसे के लिए और सम्पूर्ण कृतित्व के लिए 1960 का ओमेग्ना पुरस्कार। साहित्य का नोबल पुरस्कार भी उन्होंने 1964 में ठुकरा दिया। जेरूसलम की हिब्रू विश्वविद्यालय ने 1976 में उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया।

    मृत्यु: 15 अप्रैल, 1980; फेफड़े की बीमारी से।

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