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Pahar Ki Pagdandiyan

Pahar Ki Pagdandiyan

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  • Pages: 110p
  • Year: 2009
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126716531
  •  
    पहाड़ चार आयामी होता है। उसमें लम्बाई-चौड़ाई के साथ-साथ ऊँचाई और गहराई भी होती है। इस भौगोलिक विशिष्टता के कारण वहाँ नजरिया भी कई कोण लिए होता है। पहाड़ की पगडंडियों पर चलने के लिए चाल में दृढ़ता जरूरी है और पाँव खास तरह की पकड़ माँगते हैं। प्रकाश थपलियाल की इन कहानियों में यह पकड़ है। ये पहाड़ की शृंखलाओं की तरह परत-दर-परत खुलती जाती हैं और हर कहानी नए गिरि-गह्वरों की सैर कराती जाती है। इनमें पहाड़ की मासूमियत और पगडंडियों के रास्ते गाँव-गाँव तक पहुँची तिकड़मी राजनीति एक साथ दिखाई देती हैं। फिर भी ये राजमार्ग और उसकी संस्कृति से काफी दूर और दुर्गम हैं। जीव-जगत के साथ मानवी अन्योन्याश्रितता को ये बखूबी रेखांकित करती हैं और यह बताती हैं कि किस तरह पहाड़ी जन-जीवन बाहरी दबावों से, शुरुआती संशय के साथ, ताल-मेल बैठाकर समायोजन और अनुकूलन करता जा रहा है। इन कहानियों में पर्वतीय जनजीवन अपनी कठिनाइयों, संघर्षों, ठिठोलियों और शहरों को अनोखे लगने वाले अपने पात्रों के साथ पाठकों के सामने उतर आता है। थपलियाल की ये कहानियाँ कोरी रुमानियत वाली नहीं हैं बल्कि कदम-दर-कदम जीवन के तर्क के साथ आगे बढ़ती हैं।

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    Prakash Thapliyal

    जन्म: 23 सितम्बर, 1956 को उत्तराखंड में आदिबदरी के पास थापली गाँव में।

    शिक्षा: आठवीं तक शिक्षा गाँव में; माध्यमिक शिक्षा दिल्ली में। स्नातक परीक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की। बाद में उन्होंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर इसी विषय में डॉक्टरेट की।

    प्रकाश थपलियाल पेशे से पत्रकार हैं और गत ढाई दशक से इस पेशे से जुड़े हैं। हिन्दी साहित्य में भी उनका योगदान विशिष्ट है। उन्होंने सुप्रसिद्ध ‘हिमालयन गजेटियर’ ग्रन्थ-शृंखला का अनुवाद किया है। जिम कार्बेट की ‘मैन ईटिंग लेपर्ड ऑफ रुद्रप्रयाग’ के हिन्दी अनुवाद का श्रेय भी उन्हें है। इनके अलावा भी अनेक पुस्तकों का उन्होंने अनुवाद और सम्पादन किया है। उनके व्यंग्य और कहानियाँ प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं।

    डॉ. थपलियाल का मानना है कि हिन्दी मुख्यधारा में पर्वतीय परिवेश के शब्दों की बेहद कमी है और पर्वतीय बोली-भाषा से अधिक से अधिक संवाद से यह कमी दूर की जा सकती है। पर्वतीय परिवेश पर यह कहानी-संग्रह भी उसी संवाद का हिस्सा है। थपलियाल घटनाधर्मिता को कहानी की आत्मा मानते हैं और उसके बिना कहानी को एक बंजर प्रयास कहते हैं। थपलियाल की कहानियों की रोचकता इसी घटनाधर्मिता में है जिसे वे बिना हिंसा और मार-धाड़ के, मासूमियत से निभा जाते हैं और पाठक को नई दिशा में सोचने को मजबूर करते हैं।

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