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Nirgun Santon Ke Swapana

Nirgun Santon Ke Swapana

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  • Pages: 256p
  • Year: 2010
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126719112
  •  
    साहित्यिक बिरादरी से बाहर निकलकर व्यापक भारतीय समाज को देखें तो कबीर, तुकाराम, तुलसी, मीरा, अखा, नरसी मेहता आज भी समकालीन हैं। भक्त कवि हिन्दी समाज के रोजमर्रा के जीवन में किसी भी अन्य कवि से अधिक उपस्थित हैं। ‘निरक्षर’ हिन्दीभाषी भी कबीर के चार-छह दोहों और तुलसी की दो-चार चौपाइयों से तो वाकिफ हैं ही। हिन्दी समाज नियतिबद्ध है - भक्त कवियों से सतत संवाद करने के लिए। सवाल यह है कि क्या हिन्दी की समकालीन साहित्यिक चिंताओं में यह नियति प्रतिबिंबित होती है? भारत और अन्य समाजों की देशज आधुनिकता और उसमें औपनिवेशिक आधुनिकता द्वारा उत्पन्न किए गए व्यवधान को समझना अतीत, वर्तमान और भविष्य का सच्चा बोध प्राप्त करने के लिए जरूरी है। साहित्य को इतिहास-लेखन का स्रोत मात्र (सो भी दूसरे दर्जे का!) और किसी विचारधारात्मक प्रस्ताव का भोंपू मानकर नहीं, बल्कि उसकी स्वायत्तता का सम्मान करते हुए पढ़ने की पद्धति पर चलते हुए भक्ति-काव्य को पढ़ें तो कैसे नतीजे हासिल होते हैं? भक्ति साहित्य के विख्यात अध्येता पुरुषोत्तम अग्रवाल के संपादन में नियोजित ‘भक्ति मीमांसा’ पुस्तक-शंृखला ऐसी ही पढ़त की दिशा में एक कोशिश है। विभिन्न भक्त कवियों, रचनाओं और प्रवृत्तियों के अध्ययन इसमें प्रकाशित किए जाएँगे। इस शृंखला की यह पहली पुस्तक अग्रणी इतिहासकार डेविड लॉरेंजन के निबंधों का संकलन है। पिछले दो दशकों में प्रकाशित इन शोध-निबंधों में ‘निर्गुण संतों के स्वप्नों’ और उनकी परिणतियों के अनेक पहलू अत्यंत विचारोत्तेजक और प्रमाणपुष्ट ढंग से पाठक के सामने आते हैं। ‘गोरखनाथ और कबीर की धार्मिक अस्मिता’ निबंध अंग्रेजी में प्रकाशित होने के पहले ही इस संकलन के जरिये हिन्दी पाठकों के सामने आ रहा है। डेविड लॉरेंजन द्वारा प्रस्तावित ‘जाति-निरपेक्ष’ या ‘अवर्णाश्रमधर्मी’ हिन्दी परंपरा की अवधारणा से गुजरते हुए, पाठक को आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामविलास शर्मा और डॉ. नामवर सिंह का ‘लोकधर्म’ विषयक विचार-विमर्श स्वाभाविक रूप से याद आएगा। कबीरपंथ के सांस्कृतिक इतिहास और स्वरूप में निहित सामाजिक प्रतिरोध का विवेचन करते हुए डेविड कबीरपंथ के सामाजिक आधार की व्यापकता रेखांकित करते हैं। वे बताते हैं कि कबीरपंथी ‘भगत’ कबीरपंथ को आदिवासी समुदायों तक भी ले गए; और इस तरह उन्होंने ब्राह्मण वर्चस्व से स्वायत्त समुदाय की रचना में योगदान किया। इन निबंधों में निहित अंतर्दृष्टियों से निर्गुणपंथी परंपरा के बारे में ही नहीं, भारतीय इतिहास मात्र के बारे में भी आगे शोध के लिए प्रस्थानबिंदु प्राप्त होते हैं।

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    David Lorenzen

    डेविड लॉरेंजन उन इने-गिने इतिहासकारों में से हैं, जिनकी खोजों और विश्लेषणों ने प्राचीन से लेकर आरंभिक आधुनिक काल तक के भारतीय इतिहास-लेखन पर स्थायी छाप छोड़ी है।

    डेविड ने आठवें दशक के मध्य से कबीरपंथ के व्यवस्थित अध्ययन का श्रीगणेश किया। यह अध्ययन कबीर और अन्य निर्गुण संतों के काव्य, उनके सामाजिक प्रभाव और कबीरपंथ के विकास पर अत्यंत विचारोत्तेजक विचार से लेकर, अठारहवीं सदी में, उत्तरी बिहार में सक्रिय इटालियन पादरी मारको देला तोंबा की ‘आत्मकथा’ लिखने तक जा पहुँचा है। इसी अध्ययन-यात्रा के कुछ महत्त्वपूर्ण पड़ावों का बोध कराने वाले नौ निबंध यहाँ संकलित हैं।

    इन निबंधों के अलावा, अनंतदास की कबीर-परिचई का विस्तृत, विचारोत्तेजक भूमिका के साथ, अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित करने के साथ, कबीरपंथ और निर्गुण संवेदना

    के सांस्कृतिक इतिहास के बारे में अनेक निबंध लिखने के साथ ही डेविड लॉरेंजन ने ‘रिलीजन, स्किन कलरऐंड लैंग्वेज: आर्य ऐंड नॉन-आर्य इन वैदिक पीरियड’, ‘दि रिलीजियस आइडियोलॉजी ऑफ गुप्त किंगशिप’ तथा ‘हू इंवेंटेड हिन्दुइज्म’ जैसे बहुचर्चित और विचारोत्तेजक निबंध भी प्रकाशित किए हैं।

    पिछले चालीस बरसों से डेविड लॉरेंजन मेक्सिको के प्रतिष्ठित शोध संस्थान ‘कॉलेजियो दि मेक्सिको’ में प्रोफेसर हैं। उनके व्यक्तित्व में गहन जिज्ञासा और गंभीर अध्ययन से उत्पन्न गहराई के साथ ही है चुंबकीय सहजता और खुलापन। ‘हाथी चढ़िए ज्ञान का सहज दुलीचा डारि’ की सलाह को अपने जीवन और व्यक्तित्व में डेविड ने सोलहों आने चरितार्थ किया है।

    धीरेन्द्र बहादुर सिंह

    उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में जन्म। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से ‘सांस्कृतिक वर्चस्व बनाम साहित्यिक आलोचना, संदर्भ: मुक्तिबोध का आलोचना कर्म’ विषय पर पी-एच.डी.। विविध पत्र-पत्रिकाओं में आलेख एवं शोध-पत्र प्रकाशित। साहित्यिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में ‘जिज्ञासा’ के माध्यम से सक्रिय भागीदारी।

    संप्रति: दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद महाविद्यालय (सांध्य) में अध्यापन।

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