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Nepali Kavitayen

Nepali Kavitayen

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  • Pages: 103p
  • Year: 2020, 3rd Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9789389577570
  •  
    नेपाली साहित्य या भाषा की प्राचीनतम रचना चौदहवीं शती का एक ताम्रपत्र माना जाता है। लेकिन मल्लकाल के अन्त के साथ ही नेपाली में साहित्य सर्जना होने लगी। सुवानन्द दास की पहली कविता, जिसमें पृथ्वीनारायण शाह (प्रथम नेपाल नरेश) की विजय-यात्रा इत्यादि का वर्णन है, नेपाली साहित्य की प्रथम कविता है। लेकिन नेपाली साहित्य की वास्तविक शुरुआत भानुभक्त आचार्य और उनके महाकाव्य नेपाली रामायण से माननी चाहिए, जिसे भानुभक्त आचार्य ने जेल के अन्दर लिखा था। इस काल को हम नेपाली मानस के निराशा-युग, पराजय-काल के रूप में ले सकते हैं। अंग्रेजों के साथ अपमानजनक सुगौली सन्धि (1816) के समय अनेक दरबारी षड्यंत्रों की वीभत्सता चरम रूप में थी। सत्ता के लिए हर कोई दूसरे की लाश पर खड़े रहने को तत्पर था। नेपाली इतिहास के लहूलुहान पन्ने इन्हीं दिनों लिखे गए। भानुभक्त की रामायण इसी भक्तिकाल (1853) की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है। सत्ता और शास्त्रीयता के विरुद्ध भयंकर युद्ध के नायक गोपालप्रसाद रिमाल प्रथम कवि हैं जिनका प्रभाव आज तक बरकरार है। 1940 में ही महाकवि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा भी स्वतंत्रता युद्ध में कूद गए। रिमाल और देवकोटा दो ऐसे अद्वितीय कवि हैं, वे अब हमारे मध्य नहीं रहे, जिन्होंने नेपाल को नई जागृति दी। 1950 में नेपाल में प्रजातंत्र की स्थापना हुई। 1950-60 के दशक को हम नेपाली साहित्य का अभूतपूर्व दशक कह सकते हैं। इस संग्रह में 1961 के बाद के कवियों को ही प्रस्तुत किया गया है–अपवाद के रूप में सर्वश्री गोपालप्रसाद रिमाल, लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा और मोहन कोइराला हैं। संग्रह के कवियों में दुरूहतावादी और 'कला कला के लिए' माननेवाले और अपने को प्रगतिशील कहनेवाले किसी वाद के समर्थक कवियों को शामिल नहीं किया गया है। नेपाली कविता में साठ के दशक के बाद जो पीढ़ी उभरी है, वह साहित्य को आदमी की व्यथा, वेदना, विसंगति, कटुता और जीवन के घिनौने यथार्थ को प्रकट करने का माध्यम स्वीकारती है और उसे आम आदमी तक ले जाना चाहती है। ऐसे सभी कवियों को इस संग्रह में शामिल करने का प्रयास किया गया है जो सौ साल बाद के पाठक के लिए नहीं लिखते बल्कि आज के पाठकों के सामने आज की संवेदना को लेकर जाना चाहते हैं।

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    Sarveshwardayal Saxena

    सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

    सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का जन्म 15 सितम्बर, 1927 बस्ती, उत्तर प्रदेश में हुआ ।

    आपने इलाहबाद से बी.ए. और एम. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की ।

    जीविकोपार्जन के लिए मास्टर, क्लर्क, आकाशवाणी में सहायक प्रोड्यूसर, ‘दिनमान’ में प्रमुख उप-सम्पादक और फिर कुछ दिनों ‘पराग’ के सम्पादक। ‘तीसरा सप्तक’ के कवि और नई कविता के अधिष्ठाता शीर्षस्थ कवियों में एक।

    आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं --'काठ की घंटियाँ, 'बाँस का पुल', 'एक सूनी नाव', 'गर्म हवाएँ' (बाद में ये चारों कविता-संग्रह क्रमशः ‘कविताएँ : एक’ और ‘कविताएँ : दो’ में संकलित व प्रकाशित), 'कुआनो नदी', 'जंगल का दर्द', 'खूँटियों पर टँगे लोग', 'कोई मेरे साथ चले' (कविता); 'उड़े हुए रंग' (उपन्यास); 'पागल कुत्तों का मसीहा', 'सोया हुआ जल' (लघु उपन्यास); 'लड़ाई', 'अँधेरे पर अँधेरा' (कहानी); 'बकरी' (नाटक); 'बतूता का जूता', 'महँगू की टाई', 'बिल्ली के बच्चे' (बाल कविता); 'कुछ रंग, कुछ गंध' (यात्रा-संस्मरण) 'शमशेर', 'नेपाली कविताएँ', 'अँधेरा का हिसाब' आदि (सम्पादन) ।

    आपकी रचनाएँ भारतीय भाषाओँ के अलावा रूसी, जर्मन, पोलिश, चेक आदि भाषाओँ में अनूदित ।

    ‘खूंटियों पर टँगे लोग’ के लिए 1983 के 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार' से सम्मानित किए गए ।

    24 सितम्बर, 1983 को नई दिल्ली में निधन ।

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