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Nanya

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  • Pages: 168
  • Year: 2018, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9789387462359
  •  
    प्रभु जोशी, हिन्दी गल्प जगत् के ऐसे अनूठे कथा-नागरिक हैं, जो सूक्ष्मतम संवेदनाओं के रेशों से ही, विचार और संवेदना के वैभव का वितान रचते हैं, जिसमें रचना का स्थापत्य, अपने परिसर में, समय के भूगोल को चतुर्दिक घेर लेता है। यही वजह है कि उनकी लम्बी और औपन्यासिक आभ्यन्तर वाली लगभग सभी कथा-रचनाएँ, वर्गीकृत सामाजिकता के अन्तर्विरोधों के दारुण दु:खों को अपने कथ्य का केन्द्रीय-सूत्र बनाकर चलती आई हैं। प्रस्तुत कथा-कृति ‘नान्या’, औपनिवेशिक समय के विकास-वंचित अंचल के छोटे से गाँव में एक अबोध बालक के ‘मनस के मर्मान्तक मानचित्र’ को अपना अभीष्ट बनाती हुई, भाषा के नाकाफीपन में भी अभिव्यक्ति का ऐसा नैसर्गिक मुहावरा गढ़ती है कि भाषा के नागर-रूप में, तमाम ‘तद्भव’ शब्द अपने अभिप्रायों को उसी अनूठेपन के साथ रखने के लिए राज़ी हो जाते हैं, जो लोकभाषा की एक विशिष्ट भंगिमा रही है। कहने कि ज़रूरत नहीं कि हिन्दी गद्य में, मालवांचल की भाषिक सम्पदा से पाठकों का परिचय करानेवाले प्रभु जोशी निर्विवाद रूप से पहले कथाकार रहे हैं, जिनकी ग्राम-कथाओं के ज़रिये पाठकों ने सत्तर के दशक के पूर्वाद्र्ध में इस क्षेत्र के यथार्थ को उसकी समूची जटिलता के साथ जाना। जब कि इस अंचल से आनेवाले पूर्ववर्तियों से यह छूटता रहा था। अबोधता के इस अकाल समय में ‘नान्या’ की यह दारुण कथा जिस गल्पयुक्ति से चित्रित की गई है, उसमें प्रभु जोशी का कुशल गद्यकार, दृश्य-भाषा से रची गई कथा-अन्विति को, पर्त-दर-पर्त इतनी घनीभूत बनाता है कि पूरी रचना में कथा-सौष्ठव और औत्सुक्य की तीव्रता कहीं क्षीण नहीं होती। कहना न होगा कि यह हिन्दी गल्प की पहली ऐसी कृति है, जिसमें बाल-कथानायक के सोचने की भाषा के सम्भव मुहावरे में, इतना बड़ा आभ्यन्तर रचा गया है। इसमें उसकी आशा-निराशा, सुख-दु:ख, संवेदना के परिपूर्ण विचलन के साथ बखान में उत्कीर्ण हैं, जहाँ लोक-स्मृति का आश्रय, पात्र की बाल-सुलभ अबोधता को, और-और प्रामाणिक भी बनाता है। कहानी में यह वह समय है, जब कि नगर और ग्राम का द्वैत इतना दारुण नहीं था, और लोग ग्राम से पलायन में जड़-विहीन हो जाने का भय अनुभव करते थे। कथा में एक स्थल पर दादी की कथनोक्तिमें यह सामाजिक सत्य जड़ों से नाथे रखने के लिए तर्क पोषित रूप में व्यक्त भी होता है कि ‘जब कुण्डी में पाणी, कोठी में नाज, ग्वाड़ा में गाय, और हाथ में हरकत-बरकत होय तो, गाँव का कांकड़ छोड़ के हम सेरगाम क्यों जावाँ?’ बहरहाल, नान्या अपनी दादी और बड़े ‘बा के बीच ही मानसिक गठन की प्रश्नाकुलता से भिड़ता हुआ, यकीनों की विचित्र और उलझी हुई गाँठों में, और-और उलझता हुआ, हमें रुडयार्ड किपलिंग, चेखव और दॉस्तोयेव्स्की के बाल पात्रों की त्रासदियों का पुनर्स्मरण कराता हुआ, करुणा और संवेदना की सार्वभौमिकता के वृत्त के निकट ला छोड़ता है। प्रभु जोशी के कथाकार की दक्षता इस बात में भी है कि ‘नैरेटर’ की उपस्थिति कलात्मक ढंग से ‘कैमोफ्लेज्ड’ कर दी गई है। नान्या की यह कथा, अपने भीतर के एकांत में घटनेवाले आत्मसंवाद का रूप ग्रहण करती हुई इतनी पारदर्शी हो जाती है कि पाठक एक अबोध की त्रासदी के पास निस्सहाय-सा, व्यथा के वलय में खड़ा रह जाता है। कथा, काल-कीलित होते हुए भी, सार्वभौमिक सत्य की तरह हमारे समक्ष बहुत सारे मर्मभेदी प्रश्न छोड़ जाती है। विस्मय तो यह तथ्य भी पैदा करता है कि कथाकृति, काल के इतने बड़े अंतराल को फलाँग कर, साहित्य के समकाल से होड़ लेती हुई अपनी अद्वितीयता का साक्ष्य रखती है।

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    Prabhu Joshi

    जन्म : 12 दिसम्बर, 1950 को देवास (म.प्र.) के गाँव पीपलरावाँ में।

    जीवविज्ञान में स्नातक तथा रसायन विज्ञान में स्नातकोत्तर अध्ययन के उपरान्त अंग्रेज़ी साहित्य में भी प्रथम श्रेणी में एम.ए.। अंग्रेज़ी की कविता के स्ट्रक्चरल ग्रामर पर विशेष अध्ययन।

    पहली कहानी 1973 में 'धर्मयुग’ में प्रकाशित। 'किस हाथ से’, 'प्रभु जोशी की लम्बी कहानियाँ’ तथा 'उत्तम पुरुष’ शीर्षक से तीन कथा-संग्रह। 'नई दुनिया’ के सम्पादकीय तथा फीचर पृष्ठों का पाँच वर्षों तक सम्पादन। 'धर्मयुग’, 'सारिका’, 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, 'पहल’, 'पूर्वग्रह’, 'साक्षात्कार’, 'टाइम्स ऑफ इंडिया’, 'संडे आब्ज़र्वर’, 'फ्री प्रेस जर्नल’, 'आर्ट वर्ल्ड’, 'विज़न’, 'नेटवर्क’ आदि पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी तथा अंग्रेज़ी में, लेखों, टिप्पणियों तथा कहानियों का प्रकाशन।

    चित्रकारी बचपन से। जलरंग में विशेष रुचि। लिंसिस्टोन तथा हरबर्ट गैलरीज ऑस्ट्रेलिया के त्रिनाले में चित्र प्रदर्शित। गैलरी-फोर केलिफोर्निया (यू.एस.ए.) का जलरंग हेतु ढाई हज़ार डॉलर का पुरस्कार तथा थामसमोरान अवॉर्ड। ट्वेंटी फर्स्ट सेन्चुरी गैलरी, न्यूयॉर्क के टॉप सेवैंटी में शामिल। भारत भवन का चित्रकला तथा म.प्र. साहित्य परिषद का कथा-कहानी के लिए अखिल भारतीय सम्मान। साहित्य के लिए म.प्र. संस्कृति विभाग द्वारा गजानन माधव मुक्तिबोध फेलोशिप। बर्लिन में सम्पन्न जनसंचार की अन्तरराष्ट्रीय स्पर्धा में 'ऑफ्टर ऑल हाउ लांग’ रेडियो कार्यक्रम को जूरी का विशेष पुरस्कार। धूमिल, मुक्तिबोध, सल्वाडोर डाली, पिकासो, कुमार गन्धर्व तथा उस्ताद अमीर खाँ पर केन्द्रित रेडियो कार्यक्रमों को आकाशवाणी के राष्ट्रीय पुरस्कार। संगीत तथा चित्रकला पर विशेष लेखन। 'इम्पैक्ट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ऑन ट्रायबल सोसाइटी’ विषय पर किए गए अध्ययन को आडियंस रिसर्च विंग का राष्ट्रीय पुरस्कार। दूरदर्शन में रहते हुए इंडियन क्लासिक्स शृंखला में तीन टेलीफिल्मों का निर्माण। 'दो कलाकार’ नामक टेलीफिल्म एशिया पेसिफिक स्पर्द्धा में भारत की तरफ से एकमात्र प्रविष्टि की तरह प्रेषित।

    सम्पर्क : 'समग्र’, 303 गुलमोहर निकेतन, बसन्त विहार, शान्ति निकेतन के पास, इन्दौर-452010 (म.प्र.)

    फोन : 0731-2551719, मोबाइल : 094253 46356

    ई-मेल : prabhu.joshi@gmail.com

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