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Nadi Mein Khada Kavi

Nadi Mein Khada Kavi

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  • Pages: 216
  • Year: 2012, 1st Ed
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126722846
  •  
    शरद जोशी हिंदी के मूर्धन्य व्यंग्य शिल्पी हैं | उन्हें हिंदी गद्य के समृद्ध इतिहास में विलक्षण शैलीकार की प्रसिद्धि प्राप्त है | शरद जोशी सामाजिक यथार्थ का आलोचनात्मक परिक्षण करते हुए उसे व्यग्य-विदग्ध भाषा-शिल्प में अभिव्यंजित करते हैं | उनके व्यग्यालेखों में शब्द सामाजिक सरोकारों से जुड़कर अर्थ की नवीन आभा से संपन्न हो उठते हैं | एक तरह से उनके व्यंग्य बहुस्तरीय भारतीय समाज में परिवर्तन की प्रक्रिया पर गहरी दृष्टि रखते हैं और उसमे वैचारिक हस्तक्षेप करते हैं | ‘नदी में खड़ा कवि’ शरद जोशी के बहुचर्चित व्यग्यलेखों का संग्रह है | इसमें सम्मिलित व्यंग्य यह सिद्ध करते हैं कि लेखक ने पाखंड, कदाचार, विसंगति और अव्यवस्था के विरुद्ध शब्दों का सतर्क प्रयोग किया है | संवेदना की सिकुड़ती धरती और विचारों का बौना होता आसमान शरद जोधी की चिंता का केद्रीय विषय है | विशेषकर साहित्य-संसार से संदर्भित व्यग्य इस संग्रह का प्राण-तत्व है | कल्पना के कुलाबे मिलाने के स्थान पर शरद जी जीवंत यथार्थ के साक्ष्य चुनते हैं, फिर उनमे व्यापक मानवीय सत्य की तलाश करते हैं | इस प्रक्रिया में वे उन संधियों/दुरभिसंधियों की शिनाख्त करते हैं जिनसे छोटे-बड़े अवरोधों का जन्म होता है | उनके वाक्यों से निहितार्थ के जाने कितने आयाम खुलने लगते हैं | ‘यदि महाभारत फिर से लिखा जाए’ में वे लिखते हैं, ‘और आज का लेखक यों भी अकेलेपन का चित्रण करने का इच्छुक है | उसका हीरो अर्जुन नहीं, अश्वत्थामा है, जो कडवी स्मृतियों का भर ले आज भी जी रहा है, जो युद्ध के नाम से कांपता है |’ ऐसे अनेकानेक सन्दर्भ शरद जोशी के व्यग्यालेखों को स्मरणीय बनाते हैं | ‘नदी में खड़ा कवि’ एक ऐसे महँ व्यग्याकर की कृति है जिसने व्यंग्य को कालजयी सार्थकता प्रदान की है |

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    Sharad Joshi

    21 मई, 1931 को उज्जैन, मध्य प्रदेश में जन्मे शरद जोशी, होल्कर कॉलेज, इन्दौर के दिनों में ही एक लेखक के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुके थे। इन्दौर के 'नई दुनिया’ अखबार में 'परिक्रमा’ कॉलम से उनकी प्रसिद्धि और लेखक के रूप में पहचान बनी। पहली पुस्तक 'परिक्रमा’ (उन्हीं लेखों का समावेश) 1958 में छपी।

    उनके दो व्यंग्य नाटक 'अन्धों का हाथी’ और 'एक था गधा उर्फ अलादाद खाँ’ आज भी देश-विदेश में मंचित हो रहे हैं।

    अन्तिम कॉलम 'प्रतिदिन’ नवभारत टाइम्स में लगातार 7 वर्षों तक छपा।

    शरद जी की 21 पुस्तकें छपी हैं—'परिक्रमा’; 'किसी बहाने’; 'रहा किनारे बैठ’; 'दूसरी सतह’; 'मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ’; 'यथासम्भव’; 'यत्र-तत्र-सर्वत्र’; 'यथासमय’; 'हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे’; प्रतिदिन 3 भागों में; 'नावक के तीर’; 'मुद्रिका रहस्य’; 'झरता नीम शाश्वत थीम’; 'मैं, मैं और केवल मैं’; 'शरद जोशी एक यात्रा’ (अन्य लेखकों के विचार, डॉ. शशि मिश्रा); 'जादू की सरकार’; 'पिछले दिनों’; 'दो व्यंग्य नाटक’; 'राग भोपाली’; 'नदी में खड़ा कवि’; 'घाव करे गम्भीर’।

    सरकारी पुरस्कारों से बचते रहे। मात्र एक पद्मश्री 1990 में उनके खाते में। पी-एच.डी. के घोर विरोधी रहे, आज उन पर ही कई पी-एच.डी. हो गई हैं।

    हिन्दी की पहली कॉमेडी Sitcom सीरियल 'यह जो है जि़न्दगी’ लिखने का श्रेय भी। 'मालगुडी डेज़’ (हिन्दी संवाद), 'विक्रम और बेताल’, 'सिंहासन बत्तीसी’, 'वाह जनाब’, 'दाने अनार के’, 'यह दुनिया गज़ब की’ सीरियल्स भी लिखे... और 'क्षितिज’, 'गोधूलि’, 'उत्सव’, 'उड़ान’, 'चोरनी’, 'साँच को आँच नहीं’, और 'दिल है कि मानता नहीं’ फिल्मों के संवाद भी...!

    निधन : 5 सितम्बर, 1991

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