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Mere Dil Mere Musafir

Mere Dil Mere Musafir

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  • Pages: 123p
  • Year: 2011
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126720408
  •  
    फ़ैज़ को ज़िन्दगी और सुन्दरता से प्यार है - भरपूर प्यार, और इसीलिए जब उन्हें मानवता पर मौत और बदसूरती की छाया मँडराती दिखाई देती है, वह उसको दूर करने के लिए बड़ी-से-बड़ी आहुति देने से भी नहीं चूकते। उनका जीवन इसी पवित्र संघर्ष का प्रतीक है और उनकी शाइरी इसी का संगीत। मेरे दिल मेरे मुसाफ़िर फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ की नज़्मों और ग़ज़लों का संग्रह है। इस संग्रह की ख़ासियत यह है कि रचनाओं को उर्दू और नागरी - दोनों लिपियों में रखा गया है। अपनी रचनात्मक भावभूमि पर इस संग्रह की कविताएँ फ़ैज़ के ‘जीवन-काल के विभिन्न चरणों की प्रतीक हैं और यह चरण उनके पूरे जीवन और पूरी कविता के चरित्र का ही स्वाभाविक अंग है।’ इनसान और इनसानियत के हक़ में उन्होंने एक मुसलसल लड़ाई लड़ी है और अवाम के दुख-दर्द और उसके गुश्स्से को दिल की गहराइयों में डूबकर क़लमबन्द किया है। इसके लिए हुक्मरानों का हरेक कोप और हर सजा क़बूल करते हुए आजीवन कुर्बानियाँ दीं। ज़ाहिरा तौर पर उनकी शायरी सच्चे इनसानों की हिम्मत, इनसानियत से उनके प्यार और एक ख़ूबसूरत भविष्य के लिए जीत के विश्वास से पैदा हुई है; और इसीलिए उनकी आवाज़ दुनिया के हर संघर्षशील आदमी की ऐसी आवाज़ है ‘जो क़ैदख़ानों की सलाखों से भी छन जाती है और फाँसी के फन्दों से भी गूँज उठती है।’

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    Faiz Ahmed Faiz

    फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

    जन्म: सन् 1911; सियालकोट (अविभाजित पंजाब) में। प्रारम्भिक शिक्षा उर्दू-फ़ारसी-अरबी में। अंग्रेज़ी और अरबी साहित्य में एम.ए.।

    अमृतसर में अंग्रेज़ी प्राध्यापक के रूप में कार्यारम्भ। कई महत्‍वपूर्ण पत्रों का सम्पादन। 1928 में पहली ग़ज़ल और 1929 में पहली नज़्म कही। पाक सरकार द्वारा 1951 और 1958 में गिरफ़्तार।

    सानफ्ऱान्सिस्को, जिनेवा, चीन, लन्दन, मास्को, हंगरी, क्यूबा, लेबनान, अल्जीरिया, मिस्र, फिलिपाइन और इंडोनेशिया की यात्राएँ। 1964 में अब्दुल्ला हारून कॉलेज, कराची के प्रिंसिपल। 1968 में इदारा-ए-यादगार-ए-ग़ालिब की स्थापना और 1969 में ग़ालिब-शती समारोह का आयोजन।

    1972 में राष्ट्रीय कला परिषद्, पाकिस्तान के अध्यक्ष। 1973 में अफ्रो-एशियाई लेखक सम्मेलन के अल्मा-अता (सोवियत संघ) और 1978 में लुआंडा (अंगोला) अधिवेशन में हिस्सेदारी। 1962 में ‘लेनिन शान्ति पुरस्कार’ से सम्मानित। अफ्रो-एशियाई लेखक संघ की पत्रिका ‘लोटस’ के सम्पादक।

    प्रमुख पुस्तकें: नक़्शे-फ़रियादी, दस्ते-सबा, ज़िन्दाँनामा, दस्ते-तहे-संग, सरे-वादिए-सीना, शामे-शह्रे-याराँ, मेरे दिल मेरे मुसाफ़िर (कविता-संग्रह); मीजान (लेख-संग्रह); सलीबें मेरे दरीचे में (पत्नी के नाम पत्र); मताए-लौहो-क़लम (भाषण, लेख, साक्षात्कार, भूमिकाएँ, पत्र, नाटक आदि)।

    निधन: 20 नवम्बर, 1984 को लाहौर में।

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