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Mera Ujar Pados

Mera Ujar Pados

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  • Pages: 107p
  • Year: 2003
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126707062
  •  
    'मेरा उजाड़ पड़ोस' दिनेश जुगरान का दूसरा काव्य-संग्रह है। संग्रह की कविताएँ हमारे आज के आस्थाहीन समय के सत्य और संकट को, जिसमें जीवन-मूल्य पूरी तरह अपनी कदरो-कीमत खो चुके हैं, एक अत्यंत प्रभावशाली भाषा और मुहावरे में परिभाषित करती हैं। इनमें उस सफ्फाक और बेहिस दुनिया की परतें खुलकर सामने आती हैं जिसमें 'होशियार लम्हों' की 'साजिश' के चलते, यह एहसास कि 'जहरीले बीज, टूटे फावड़े और/बिना धार की खुरपियों से/नई क्यारियाँ कैसे बनेंगी', एक गहरी उदासी और असहायता का बोध छोड़ जाता है। लेकिन यह हार मान लेने वालों की कविताएँ नहीं हैं। इनका सरोकार जिन्दगी से है जहाँ हार-जीत साथ-साथ चलते हैं। दुनिया का बिगाड़, दिनेश जुगरान पर भी इस तरह असरअन्दाज होना चाहता है कि वह भीड़ का हिस्सा और खुद अपना तमाशा हो जाएँ, लेकिन इससे उनकी जिन्दगी के लिए शिद्दत और गर्मजोशी कम नहीं होती। वह कहते हैं—'मैंने अभी तक/हार नहीं मानी है/जीना चाहता हूँ/अपना ही किरदार/धरती को रख लिया है/अपनी जबान पर/और पहाड़ों की धड़कनों को/पहन लिया है अपनी साँसों में।' दिनेश जुगरान की कविता हमें अपने अन्तराल तक देखने की शक्ति प्रदान करती है और लगता है हम किसी जादुई गोले में अपनी जिन्दगी के अन्तर्विरोधों से रू-ब-रू होते हुए उन रहस्यों तक पहुँच रहे हैं जिन पर किसी कारणवश अभी तक पर्दा पड़ा हुआ था। वे कविताएँ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की पड़ताल करते हुए, उसका अतिक्रमण करने का प्रयास भी करते हैं। कविता दिनेश जुगरान के लिए किसी बदलाव का नारा नहीं, व्यक्ति के स्वतंत्र होने का एहसास है। उनका लहजा, खुद से बात करने का, और कविता का परिदृश्य एक बड़ी दुनिया के उजाड़ होने का खतरा और वह कुछ महत्त्वपूर्ण, जो उसके विरोध में किए जाने से रह गया, जिसका किया जाना अब पहले से भी ज्यादा जरूरी मगर दुश्वार है। कविता तब होती है जब शब्द पहचाने अर्थ से बाहर जाकर नए जीवन-सत्यों को पारदर्शिता के साथ सामने रख पाएँ। दो वाक्यों के बीच की खामोशी ही कभी-कभी वह रहस्यात्मकता होती है जिसे समझने में उम्रें बीत जाती है। जीवन की हर यात्रा दिनेश जुगरान के भीतर से गुजर कर, किसी बिम्ब, उपमा या प्रतीक में रूपान्तरित होती, ऐसे विरोधाभासों का सामना कराती है जो लगता है किसी और तरह से व्यक्त कर पाना संभव नहीं हो सकता। जैसे मैं देख और समझ सकता हूँ, उस एक मछली को जो 'पानी से ऊपर उठाकर मुँह' किसी को पुकारना चाहती है; जान सकता हूँ, उस 'अज्ञात भय' के टुकड़े को जो 'उन डरी हुई तितलियों में/शामिल हो गया है/जो पहाड़ों से/नीचे गिर रही हैं।' 'आने से पहले ही चुपचाप/गुजर जाता है लम्हा' के अनुभव का शरीकर, मैं महसूस कर सकता हूँ—'मेरी डूबी हुई नाव का/सबसे मजबूत हिस्सा/मेरी हथेलियों में/अभी भी चिपका हुआ है'। या 'सूर्योदय और सूर्यास्त का/फासला' 'किस प्रकार पिता के माथे की लकीरों में/नापा जा सकता है', और कैसे 'बचपन के रहस्य/अन्दर ही अन्दर जकड़ गए हैं। चेहरे और शब्दों के दायरे/अब मुझे बाँध नहीं पाते/मेरे अन्दर की शीशे की खान/चूर-चूर हो चुकी है।' जब वह कहते हैं—'उसके नन्हे आँसू/एक दरिया छीनकर ले गया है' तो जो मर्म उत्पन्न होता है, वह किसी दूसरी शब्दावली में कल्पना कर पाना संभव नहीं लगता। इसे उनकी भाषा पर अद्भ्भुत पकड़ भी कहा जा सकता है और जिन्दगी की असलियत की गहरी समझ भी। उनकी भाषा और मुहावरा आने वाले समय में लिख्खी जाने वाली कविता पर, देर तक और दूर तक, असरअन्दाज होगा। दिनेश जुगरान अपनी कविता में जिस रूपक का प्रयोग करते हैं वह उनके दुनिया के अनुभव और निजी सोच के द्वन्द्वात्मक संघर्ष का निचोड़ होता है। आपबीती के जगबीती बनने की प्रक्रिया में निजी जीवन-सत्य व्यक्तिगत सीमाओं का अतिक्रमण कर विराट जीवन-सत्य के विभिन्न रूप रच लेते हैं। संक्षेप में 'मेरा उजाड़ पड़ोस' एक ऐसा महत्त्वपूर्ण काव्य-संग्रह है जो हमारे मुश्किल संकटग्रस्त समय को आईना दिखाते हुए, हमें अपने भीतर के उजाड़ तक देखने की सलाहियत देता है। लगता है—'हवा के वजन की तरह/लम्हा चेहरे पर उतरता हुआ' के अन्दाज में। मंजूर एहतेशाम

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    Dinesh Jugran

    दिनेश जुगरान

    26 जुलाई, 1945; लखनऊ में जन्म। मूल निवास: ग्राम - धूरा, जिला - पौड़ी (उत्तरांचल)। एम.ए. (इतिहास) इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1964 में। ‘इन्द्रधनुष के अर्थ’ पहला काव्य-संग्रह (1998), ‘मेरा उजाड़ पड़ोस’ दूसरा काव्य-संग्रह (2003)। 1966 से भारतीय पुलिस में। वर्तमान में पुलिस महानिदेशक (मध्यप्रदेश)। पता: बी-18, चार इमली, भोपाल (मध्यप्रदेश)।

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