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Machhali Mari Hui : Stri Samlaingita Ko Rekhankit Karta Upanyas

Machhali Mari Hui : Stri Samlaingita Ko Rekhankit Karta Upanyas

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Special Price Rs. 225

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  • Pages: 172p
  • Year: 2009
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126705696
  •  
    ‘मछली मरी हुई’ राजकमल चौधरी का एक ऐसा उपन्यास है जो प्रकाशित होते ही चर्चा में आ गया और वह चर्चा आज भी जारी है। लीक से हटे हुए इस उपन्यास की विशेषता है कि इसमें कोई विषय नहीं है, विषय प्रस्ताव है - मात्र विषय प्रस्ताव! यह उपन्यास अपने समय के अन्य हिन्दी उपन्यासों में इसलिए भी विशिष्ट है कि अपने औपन्यासिक पैकर (ढाँचे) में मानवीय मनोवृत्तियों की जटिलताओं का जिस सरलता से उद्घाटन करता है, उसी सरलता से अपने देश-काल-परिवेश का परिचय भी देता है। इसमें द्वितीय विश्वयुद्ध के तुरन्त बाद के कलकत्ता शहर के उद्योग-जगत का प्रामाणिक और सजीव चित्रण प्रस्तुत है। उपन्यास का प्रमुख पात्र निर्मल पद्मावत हिन्दी उपन्यास साहित्य का अविस्मरणीय चरित्र है। हिंस्र पशुता और संवेदनशीलता, आक्रामकता और उदासी, सजगता और अजनबीपन, शक्ति और दुर्बलता का ऐसा दुर्लभ मिश्रण हिन्दी के शायद ही किसी उपन्यास में मिलेगा। ‘मछली मरी हुई’ के अधिकांश पात्र मानसिक विकृतियों के शिकार हैं, पर उपन्यासकार ने उनके कारणों की तरफ़ संकेत कर अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता का परिचय दिया है। यह प्रतिबद्धता उद्योगपतियों के व्यावसायिक षड्यन्त्र, भ्रष्ट आचरण आदि की विवेकपूर्ण आलोचना के रूप में भी दिखाई देती है। इस उपन्यास के केन्द्रीय पात्र निर्मल पद्मावत की कर्मठता, मजदूरों के प्रति उदार दृष्टिकोण, छद्म आचरण के प्रति घृणा, किसी भी हालत में रिश्वत न देने की दृढ़ता, ऊपर से हिंस्र जानवर जैसा दिखने पर भी अपनी माँ, पत्नी और अन्य स्त्रियों के प्रति गहरी संवेदनशीलता - ये सारी बातें उपन्यासकार के गहरे नैतिकता-बोध के प्रमाण हैं। इस उपन्यास को स्त्री-समलैंगिकता पर केन्द्रित एक श्रेष्ठ कृति के रूप में भी माना गया है। अपनी रोचकता और शैली का अछूतापन इस उपन्यास की सम्भवतः ऐसी विशेषता है जिससे यह उपन्यास कालजयी प्रमाणित हुआ है।

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    Rajkamal Chaudhari

    जन्म: 13 दिसम्बर, 1929 को अपने ननिहाल रामपुर हवेली में। पितृग्राम महिषी (सहरसा-बिहार)। इण्टरमीडिएट आर्ट्स में नामांकन, किन्तु उसे छोड़कर भागलपुर आकर इण्टरमीडिएट कॉमर्स में प्रवेश। मारवाड़ी कॉलेज, भागलपुर से 1955 में आई.कॉम.। 1953 में गया कॉलेज से बी.कॉम। लेखन की शुरुआत भागलपुर से ही हो गई थी। शिक्षा पूरी करने के बाद अधिकतर कलकत्ता में रहे। कई हिन्दी और मैथिली की पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। अन्तिम वर्षों में पूरी तरह स्वतंत्र लेखन। 19 जून, 1967 को पटना के अस्पताल में लम्बी बीमारी के बाद निधन।

    प्रकाशित कृतियाँ: हिन्दी में: अग्निस्नान, शहर था शहर नहीं था, नदी बहती थी, ताश के पत्तों का शहर, मछली मरी हुई (उपन्यास); बीस रानियों के बाइस्कोप, एक अनार: एक बीमार (लघु उपन्यास); मुक्ति प्रसंग, कंकावती, इस अकाल वेला में (कविता-संग्रह); मछली जाल, सामुद्रिक एवं अन्य कहानियाँ (कहानी-संग्रह)।

    मैथिली में: आदि कथा, पाथरफूल, आंदोलन (उपन्यास); स्वरगंधा, कविता राजकमलक (कविता-संग्रह); एकटा चंपाकली विषधर, कृति राजकमलक (कहानी-संग्रह)। अनूदित कृतियाँ: मूल बांग्ला से शंकर के उपन्यास चौरंगी और वाणी राय के उपन्यास चोखे आमार तृष्णा का हिन्दी अनुवाद।

    ‘राजकमल चौधरी रचनावली’ शीघ्र प्रकाश्य।

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      • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Funda An Imprint of Radhakrishna
      • Korak An Imprint of Radhakrishna
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