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  • Pages: 503p
  • Year: 2010
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126719389
  •  
    हां, हम तैयार हैं... —देश की अर्थव्यवस्था को लाइसेंसी राज की बेड़ियों से मुक्त कराकर आर्थिक स्वतंत्रता के वैश्विक रास्ते पर ले जाने वाले अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं—'दुनिया में लोग चीन की तरक्की से आशंकित होते हैं, लेकिन इसके विपरीत भारत की आर्थिक तरक्की को सकारात्मक नजरिये से देखते हैं...' —व्हार्टन स्कूल ऑफ द यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया के चार प्रोफेसरों के अध्ययन का निष्कर्ष है—वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने बेहतर प्रदर्शन किया क्योंकि वहाँ के उद्योगपतियों के कामकाज का अपना तौर-तरीका है...' —भारतीय अर्थव्यवस्था सन् 2020 में तीन ट्रिलियन डॉलर होगी... —कभी विदेशी उद्योगपति हमारी कंपनियाँ खरीदते थे, आज भारतीय 'कॉरपोरेट-हाट' के बड़े सौदागार हैं। यहाँ तक कि कभी भारत पर राज करने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी के नए मालिक हैं—मंबई में जन्मे उद्योगपति संजीव मेहता... ऐसी सकारात्मक सच्चाइयों से प्रेरित इस पुस्तक 'लोकल से ग्लोबल : इंडियन कॉरपोरेट्स' में उदारीकरण के दूसरे दशक (2001-2010) में भारतीय उद्योग जगत की 'लोकल से ग्लोबल' बनने की सफल कोशिश दोहराई गई है। यह पुस्तक उन पचास भारतीयों की यशोगाथा है, जिन्होंने साबित किया है कि भारतीय ठान लें तो कुछ भी कर सकते हैं, वह भी दूसरों से बेहतर।

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    Prakash Biyani

    किशोरावस्था से सतत् लेखन कर रहे प्रकाश बियाणी मूलत: बैंकर हैं। भारतीय स्टेट बैंक में 25 साल (1968-1995) नौकरी करने के बाद वे आठ साल देश के अग्रणी समाचार पत्र समूह 'दैनिक भास्कर’ में कार्पोरेट संपादक रहे हैं। देश के औद्योगिक परिदृश्य व उद्योगपतियों पर उनके दो हजार से ज्यादा लेख/साक्षात्कार/समीक्षाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। इस दौरान उन्हें देश के कई अग्रणी उद्योगपतियों से प्रत्यक्ष मुलाकात का सुअवसर भी मिला है एवं राष्टï्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बिजनेस मीट/ इवेंट्स में शिरकत करने का मौका भी। इन दिनों वे कार्पोरेट जगत व कंपनी मामलों पर स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। आपकी पुस्तक 'शून्य से शिखर’ (35 भारतीय उद्योगपतियों की यशोगाथा) को पाठकों खासकर बिजनेस स्कूल के छात्रों ने खूब सराहा है। अपने किस्म की इस अनूठी पुस्तक का द्वितीय संशोधित संस्करण एवं पेपरबैक संस्करण भी एक साल में मार्केट में लांच हो चुके हैं।

    'जो समाज धनोपार्जन करने वाले लोगों को कोसता है वह दरिद्रता में जीता है’ - स्व. धीरूभाई अंबानी के इस कथन से सहमत होते हुए

    श्री बियाणी का मत है कि राष्टï्रीय संपदा का समाज के हर वर्ग में न्यायोचित वितरण होना चाहिए। वे मानते हैं कि प्रतिस्पर्धा के ताजा दौर में केवल सर्वश्रेष्ठï ही बचेंगे पर शिक्षित व अशिक्षित अथवा कुशल व अकुशल हर शख्स को रोजगार के अवसर मिलना चाहिए। तद्नुसार यदि अब कोई चूक न हुई तो उदारीकरण व आर्थिक सुधार कार्यक्रम का दूसरा दौर देश के हर वर्ग को उनके वाजिब हक दिलवाएगा। इतिहास से सबक लेने की मंशा से लिखी गई है यह पुस्तक : 'जी, वित्तमंत्रीजी!’

    सम्पर्क : (०७३१) २५६०७७७, ०९३०३२२३९२८

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