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Kuchh Purvgrah

Kuchh Purvgrah

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  • Pages: 207p
  • Year: 2003, 2nd Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126705469
  •  
    पिछले वर्षो में हिंदी आलोचना में जो नाम छाए रहे हैं उनमे एक नाम निश्चय ही अशोक वाजपेयी का है कविता के लिए उनका पूर्वग्रह अब कुख्यात ही है ! उन्होंने उसकी आलोचना, प्रकाशन और प्रसार के लिए जितने व्यापक और सुचिंतित रूप से काम किया है उतना इस दौरान शायद ही किसी ने किया हो ! 1970 में उनकी पहली आलोचना-पुस्तक फिलहाल ने हिंदी आलोचना को तेजी और सार्थक आलोचना-भाषा दी थी जिसका व्यापक प्रभाव आज तक देखा जा सकता है ! फिलहाल के चार संस्करण निकलना इस बात का प्रमाण है कि समकालीन कविता की आलोचना में उसे एक उद्गम-ग्रन्थ की मान्यता मिली है ! इस बीच अशोक वाजपेयी ने 1974 से भोपाल से बहुचर्चित आलोचना द्वामसिक 'पूर्वग्रह' का संपादन और प्रकाशन आरम्भ किया ! हिंदी की समकालीन साहित्य-संस्कृति में इस प्रयत्न का ऐतिहासिक महत्त्व है ! इस पुस्तक की अधिकांश सामग्री 'पूर्वग्रह' में ही प्रकाशित हुई है ! कम लिखकर भी कारगर हस्तक्षेप कर पाने में वे सक्षम हैं, यह इसका प्रमाण है ! कविता, साहित्य और संस्कृति के लिए अपनी गहरी आसक्ति को अशोक वाजपेयी असाधारण स्पष्टता और सूक्ष्म सम्वेदंशेलता के साथ व्यक्त करते हैं हालाँकि हर हालत में अपने को ही सही मानने का उन्हें कोई मुगालता नहीं है ! उनकी आलोचना आज की सृजनात्मकता को समझने और आगे बढाने का एक उत्कट और विचारसंपन्न प्रयत्न है ! वे जो प्रश्न उठाते हैं या चुनौतियाँ सामने रखते हैं वे आज की परिश्थितियों में केन्द्रीय हैं और उन्हें नजरअंदाज करना संभव नहीं है !

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    Ashok Vajpeyi

    1970 में अपने निबंध-संग्रह 'फ़िलहाल' से हिंदी में आलोचना-प्रवेश करनेवाले कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी लगभग एक अधसदी से कविता, साहित्य, संस्कृति, संगीत, रूपंकर कलाओं आदि पर हिंदी और अंग्रेजी में आलोचना लिखते रहे हैं ! उन्होंने आलोचना की भाषा को नई ताजगी और सूक्ष्मता देने के साथ-साथ उसे सामाजिक संवाद का हिस्सा बनाने में सार्थक भूमिका निभाई है !

    उनकी प्रकाशित आलोचना पुस्तकों में 'फ़िलहाल', 'कुछ पूर्वग्रह', 'कविता का गल्प', 'सीढियां शुरू हो गई हैं', 'कभी-कभार', 'यहाँ से वहां' , 'कुछ खोजते हुए', 'पुनर्भव', 'समय से बाहर' आदि शामिल हैं !

    अशोक वाजपेयी को साहित्य अकादेमी पुरस्कार (जो उन्हें 1994 में मिला उसे बढती असहिष्णुता के विरोध में 2015 में लौटा दिया), दयावती मोदी कविशेखर सम्मान, कबीर सम्मान, समन्वय भाषा सम्मान आदि से अलंकृत किया गया है ! फ्रेंच और पोलिश सरकारों ने उन्हें उच्च नागरिक सम्मान दिए हैं ! 2011 में उन्होंने उत्तर प्रदेश सर्कार का भारत भारती पुरस्कार विरोधस्वरुप स्वीकार नहीं किया था !

    वे 35 वर्ष भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहे ! महात्मा गाँधी अन्तराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के सस्थापक-कुलपति, केन्द्रीय ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष रहे हैं और इन दिनों रजा फाउंडेशन के प्रबंध-न्यासी हैं ! वे भारत भवन न्यास के संस्थापक न्यासी सचिव और अध्यक्ष भी रहे हैं ! हिंदी आलोचना की पत्रिका 'पूर्वग्रह' का उन्होंने लगभग 16 वर्षों तक संपादन किया !

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