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Kaya Sparsh

Kaya Sparsh

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  • Pages: 140p
  • Year: 2012
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9789381863060
  •  
    यह लघु उपन्यास मुख्यतः उच्च वर्ग की स्वनिर्मित त्रासदी के उस जाल की गाथा है जिसके मोहपाश में फँसकर यह स्वार्थांध तबका स्वयं ही तबाही के गर्त में पहुँचकर समूल विनाश की सीमाओं को छूने लगता है। हृदय सुगति विकृत प्रकृति वाला एक धनाढ्य विधुर है। उसे रुपया कमाने और रंगरेलियाँ मनाने से ही फुरसत नहीं है। इस व्यक्ति की पैदा की गई त्रासदी के फलस्वरूप उसकी पत्नी मर जाती है। एक बेटा छत से कूदकर जान दे देता है। इन सबका प्रभाव झेलता है इक्ष्वाकु यानी इच्छु नामक बीस-बाईस बरस का उसका दूसरा बेटा जो एक समय जीवन्त युवा था लेकिन अब मनोरोग-ग्रस्त होकर अन्तर्मुखी हो गया है और अपने कमरे में निर्लिप्त-सा पड़ा शून्य में ताकता रहता है। इच्छु के उपचार के लिए काया नामक साइकलॉजिस्ट नियुक्त की जाती है। जिसकी अपनी दुखगाथा है: वह परित्यकता है। धोखे से उसकी शादी एक विवाहित से करवा दी गई थी। गर्भावस्था में पति के हिंसक व्यवहार के बाद अनेक दुखक घटनाओं से गुजरती हुई काया जब मनोरोगी इच्छु का उपचार आरम्भ करती है, तो यहाँ उसे इनसे भी वीभत्स स्थितियों का सामना करना पड़ता है। सबसे बड़ी बाधा इच्छु के पिता की रखैल है जिसे इनता रुपया इच्छु पर व्यय करना बुरी तरह अखरता है। वह इच्छु के पिता को कायल कर लेती है कि यदि इच्छु की शादी काया से कर दी जाए, तो पैसा भी बचेगा और लड़का चंगा भी हो जाएगा। बिना सोचे-समझे, स्वार्थवश किए गए इस प्रस्ताव का घातक परिणाम होता है: काया, जो पहले ही अपनों से सताई हुई थी, अपने लिए एक नया रास्ता ढूँढ़ने निकल पड़ती है और इच्छु भी अस्पताल की ऊपरी मंजिल से कूदकर जान दे देता है। आठ उत्कृष्ट उपन्यासों के रचयिता द्रोणवीर कोहली ने ‘काया-स्पर्श’ में एक सर्वथा अछूती समस्या को बहुत ही सहजता से उठाया है कि जो समस्या प्यार और स्नेह से हल हो सकती है, उसे पैसे का अहंकार हल नहीं कर सकता। लेखक ने बड़ी सटीक ढंग से यह रेखांकित किया है कि पैसा या आधुनिक सुख-सुविधाएँ वात्सल्य का पर्याय नहीं है। लेखक के विश्लेषण से प्रकट होता है कि सन्तान में मनोरोग के बीजाणु व्यक्ति में नहीं, उसके पारिवारिक परिवेश में ही पनपते हैं। इसी पर कहानी का ताना-बाना बुना गया है। लेखक ने इस हृदयग्राही कहानी में बड़ी कुशलता से हृदय सुगति, इक्ष्वाकु उर्फ इच्छु बाबा, काया जैसे अनेक चरित्रों को परत-दर-परत खोलकर रख दिया है - किसी मनोचिकित्सक के बौद्धिक व्ययाम की तरह नहीं, एक संवेदनशील कथाकार की भाँति। हिन्दी लेखन में इस प्रकार का यह सम्भवतः पहला प्रयास है, ऐसा सफल प्रयास कि पाठक उपन्यास को एक बार हाथ में लेकर फिर बिना समाप्त किए छोड़ नहीं पाएँगे। परिस्थितियों और मनःस्थितियों का बारीकी से संवेदनशील चित्रण लेखन के अध्ययन कौशल का परिचायक है। इस अछूती समस्या के चित्रण में उपन्यासकार ने सहज स्नेह की आवश्यकता को प्रस्थापित करने की पहल बड़े कौशल से की है। वह कथानक से बोलती है, उपन्यासकार के उपदेश से नहीं समाजशास्त्रीय अध्ययन में रुचि रखनेवालों को उपन्यास में चिन्तन की पर्याप्त सामग्री मिलेगी।

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    Dronveer Kohli

    जन्म: 1932 में रावलपिंडी के निकट एक दुर्गम एवं उपेक्षित ग्रामीण परिवार में हुआ। देश विभाजन के उपरान्त वह दिल्ली आए जहाँ इनकी किशोरावस्था बीती और शिक्षा-दीक्षा हुई।

    भारतीय सूचना सेवा के अन्तर्गत विभिन्न पदों पर काम करते हुए इन्होंने ‘आजकल’ साहित्यिक मासिक एवं ‘बाल भारती’ तथा तेरह भाषाओं में प्रकाशित ‘सैनिक समाचार’ का सम्पादन किया। कुछ समय के लिए वह आकाशवाणी में वरिष्ठ संवाददाता तथा बाद में हिन्दी समाचार विभाग के प्रभारी सम्पादक भी रहे।

    इनके ग्यारह मौलिक उपन्यासों: चौखट, मुल्क अवाणों का तथा आंगन-कोठा संयुक्त, तकसीम, वाह कैंप, नानी, ध्रुवसत्य, टप्पर गाड़ी, खाड़ी में खुलती खिड़की, पोटली के अलावा इन्होंने कई पुस्तकों का अनुवाद भी किया है: फ्रेंच लेखक ज़ोला का ‘उम्मीद है आएगा वह दिन’, स्वीडिश उपन्यास ‘डॉक्टर ग्लास’ सम्मिलित हैं। इनमें बच्चों के लिए भी अनेक पुस्तकें शामिल हैं।

    द्रोणवीर जाने-माने उपन्यासकार, कथाकार, सम्पादक और अनुवादक ही नहीं, वे निर्भीक पत्रकार भी रहे। ‘बुनियाद अली की बेदिल दिल्ली’, ‘हाइड पार्क’ एवं ‘राजघाट पर राजनेता’ जैसी पुस्तकें तथा ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘सारिका’ जैसी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित इनके रोचक रिपोर्ताज और इन्टरव्यू दिलचस्पी से पढ़े जाते थे।

    निधन: 24 जनवरी, 2012

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