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Kavita Ka Uttar Jiwan

Kavita Ka Uttar Jiwan

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  • Pages: 218p
  • Year: 2004
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126708875
  • ISBN 13: 9788126708871
  •  
    ‘कविता का उत्तर जीवन’ उत्तर समय में लिखी जा रही कविता का एक आलोचनात्मक पाठ-भर नहीं है, एक पूरे समय और काव्य-समय पर सघन विमर्श भी है। ‘शब्द और समय’ (1988) और ‘कविता का अर्थात्’ (1999) से जुड़कर अब वह एक त्रयी का हिस्सा भी है और फलश्रुति भी ! (यद्यपि कोई भी फलश्रुति एक मिथ या यूटोपिया है)। परमानन्द श्रीवास्तव आधी सदी की कविता और आलोचना के संघर्ष के साक्षी ही नहीं रहे हैं, उनके आलोचनात्मक हस्तक्षेप की विश्वसनीयता भी प्रायः असंदिग्ध है। उनका आलोचनात्मक गद्य खास रचनात्मक चमक लिये हुए है, जिसकी छाप ‘कविता का उत्तर जीवन’ पर सबसे अधिक है। ‘कविता का उत्तर जीवन’ इस प्रमुख स्थापना के साथ पाठकों-लेखकों के बीच है कि किसी भी समय की महत्त्वपूर्ण कविता का एक वृहत्तर स्पेस होता है और वही दूसरे तीसरे पाठ को दूसरे तीसरे जीवन में फिर से घटित करता है। कविता का कोई भी नया पाठ एक पुनर्जीवन है, जो आस्वाद और मूल्यांकन के द्वन्द्व को अनिवार्य बनाता है। ‘कविता का उत्तर जीवन’ इसका साक्ष्य है कि कैसा भी प्रतिमानीकरण ;ब्ंदवदप्रंजपवदद्ध समूचे काव्यन्याय में अपने को असमर्थ पाता है; इसलिए भी कि ग़ालिब और कबीर हमारे लिए उतने ही समकालीन हो सकते हैं, जितने मुक्तिबोध और शमशेर। परमानन्द श्रीवास्तव की यह कृति शुद्ध स्वायत्त कविता की जगह अशुद्ध अनगढ़, पर जब-तब अथाह, कोशिश को महत्त्व देती है जिसमें आश्चर्य नहीं कि कभी डायरी, आत्मकथा तथा कॉलमनुमा लेख भी शामिल हैं। यह एक नयी पहल है - इससे आलोचना, रचना - दोनों में समय की आहटों का पता चलता है।

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    Parmanand Shrivastava

    जन्म: 10 फरवरी, 1935

    पहली कविता ‘नई धारा’ (1954) में और आलोचना के रूप में पहला निबन्ध (1957) ‘युगचेतना’ में प्रकाशित। दर्जन-भर कहानियाँ - कहानी, सारिका, धर्मयुग’ अणिमा आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित। आलोचक और कवि के रूप में खास अपनी पहचान। कई लघु पत्रिकाओं के संपादन में सहयोग। कई वर्षों तक आलोचना की प्रसिद्ध पत्रिका ‘आलोचना’ के संपादन से सम्बद्ध रहे। सम्प्रति ‘आलोचना’ के संपादक के रूप में सक्रिय। बहुत पहले ‘साखी’ अनियतकालीन पत्रिका का संपादन।

    उत्तर-प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘समकालीन कविता का यथार्थ’ के लिए रामचन्द्र शुक्ल पुरस्कार से समानित। आलोचना की दो अन्य पुस्तकें ‘कवि-कर्म और काव्य भाषा’ एवं ‘उपन्यास का यथार्थ और रचनात्मक भाषा’ तथा कविता-संग्रह ‘अगली शताब्दी के बारे में’ उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा पुरस्कृत। केन्द्रीय साहित्य अकादेमी की साधारण सभा (1983-02) के सदस्य रहे। साहित्य अकादमी के लिए ‘समकालीन हिन्दी कविता’ और ‘समकालीन हिन्दी आलोचना’ का संपादन। गोरखपुर विश्वविद्यालय से प्रेमचंद पीठ के प्रोफेसर के रूप में 1995 में अवकाश प्राप्त। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली द्वारा एमेरिटस प्रोफेसर मनोनीत। एक वर्ष बर्दवान विश्वविद्यालय (प.बं.) में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर रहे। कलकत्ता विश्वविद्यालय की घनश्यामदास बिड़ला व्याख्यानमाला में समकालीन कविता पर तीन व्याख्यान। भारतीय भाषा परिषद् कलकत्ता की हजारीप्रसाद द्विवेदी स्मृति व्याख्यानमाला में ‘उपन्यास का भूगोल’ और ‘उपन्यास की मुक्ति’ विषय पर दो व्याख्यान। उपन्यास का समाशास्त्र अध्ययन अनुसन्धान योजना के लिए उत्तर-प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा रंगनाथ फेलोशिप।

    प्रकाशित कृतियाँ:

    कविता: उजली हँसी के छोर पर (1960), अगली शताब्दी के बारे में (1981), चौथा शब्द (1993), एक अनायक का वृत्तांत (2004)।

    आलोचना: नई कविता का परिप्रेक्ष्य (1965), हिन्दी कहानी की रचना प्रक्रिया (1963), कविकर्म और काव्यभाषा (1975), उपन्यास का यथार्थ और रचनात्मक भाषा (1975), जैनेन्द्र और उनके उपन्यास (1976), समकालीन हिन्दी कविता का व्याकरण (1980), समकालीन कविता का यथार्थ (1988), शब्द और मनुष्य (1988), उपन्यास का पुनर्जन्म (1995) तथा कविता का अर्थात् (1999), कविता का उत्तर जीवन आलोचना (2004)।

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