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Irina Lok : Kachchh Ke Smriti Dweepon Par

Irina Lok : Kachchh Ke Smriti Dweepon Par

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  • Pages: 278p
  • Year: 2019, 1st Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9789388933667
  •  
    संस्कृति की लीक पर उल्टा चलूँ तो शायद वहाँ पहुँच सकूँ जहाँ भारतीय जनस्मृतियाँ नालबद्ध हैं। वांछित लीक के दरस हुए दन्तकथाओं तथा पुराकथाओं में और आगाज़ हुआ हिमालय में घुमक्कड़ी का। स्मृतियों की पुकार ऐसी ही होती है। नि:शब्द। बस एक अदृश्य-अबूझ खेंच, अनिर्वचनीय कर्षण। और चल पड़ता है यायावर वशीभूत...दीठबन्द...। जगहों की पुकार गूगल गुरु की पहुँच से परे। गूगल मैप के अनुगमन से रास्ते तय होते हैं, जगहें मिलती हैं पर क्या उनसे राबता हो पाता है? जब चित्त संघर्ष, त्याग, आत्मा का अनुगामी हो जाए तब हासिल होती है आलम-ए-बेखुदी। जाग्रत होती हैं सुषुप्त स्मृतियाँ। खेंचने लगती हैं जगहें। घटित होता है असल रमण। अगस्त दो हज़ार दस में, ऐसी ही आलम-ए-बेखुदी में, हम पहुँचे थे हिमालय में—सरस्वती नदी के उद्गम स्थल पर। परन्तु आन्तरिक जगत् में चपल चित्त अधिक ठहर थोड़े ही सकता है, सो बेखुदी के वे आलम भी अल्पकालिक ही होते हैं। इस वर्ष भी वही हुआ। हिमालय की ना-नुकुर से आजिज़ आ, हमने चम्बल के बीहड़ों में जाने का मन बनाया। जानकारियाँ जुट गईं, तैयारियाँ मुकम्मल हुईं। किन्तु घर से निकलने के ठीक पहले अनदेखे ‘रन’ का धुँधला-सा अक्स ज़ेहन में उभरा और मैं वशीभूत-सा चल दिया गुजरात की ओर। किसे खबर थी कि यह दिशा परिवर्तन अप्रत्याशित नहीं वरन् सरस्वती नदी की पुकार के चलते है, कि यह असल में ‘धूमधारकांडी’ अभियान की अनुपूरक यात्रा ही है। तो साहेब लोगो, आगे के सफहों पर दर्ज हर हर्फ दरअसल गवाह है उस परानुभूति का जिसके असर में मुझे शब्दों में मंज़र और मंज़रों में शब्द नज़र आए। या यूँ कहूँ कि प्रचलित किसी शब्द में इतिहास या परिपाटी में समूचा कालखंड अनुभूत हुआ। यानी कि यह किताब यायावरी का ‘डबल डोज़’ है।

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    Ajoy Sodani

    अजय सोडानी

    अप्रैल, 1961 में जन्मे अजय सोडानी का मन रमण में रमता है। उनका प्रबल विश्वास है कि इतिहास की पोथियों से गुम देश की आत्मा दन्तकथाओं एवं जनश्रुतियों में बसती है। लोककथाओं से वाबस्ता सौंधी महक से मदहोश अजय अपनी जीवन-संगिनी के संग देश के दूर-दराज़ इलाकों में भटका करते हैं। बहुधा पैदल। यदा-कदा सडक़ मार्ग से। अक्सर बीहड़, जंगल तथा नक्शों पर ढूँढे नहीं मिलने वाली मानव बस्तियों में। उनको तलाश है विकास के जलजले से अनछुए लोकों में पुरा-कथाओं के चिह्नों की। इसी गरज़ के चलते वे तकरीबन दो दशकों से साल-दर-साल हिमालय के दुर्गम स्थानों की यात्राएँ कर रहे हैं। अब तक प्रकाशित : एक कथा संग्रह अवाक् आतंकवादी; दो यात्रा-आख्यान दर्रा-दर्रा हिमालय व दरकते हिमालय पर दर-ब-दर; मिर्गी रोग को लेकर एक लम्बी कहानी टेक मी आऊट फॉर डिनर टु नाइट । अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली से न्यूरोलॉजी विषय में दीक्षित अजय सोडानी वर्तमान में सेम्स मेडिकल कॉलेज, इन्दौर के तंत्रिका-तंत्र विभाग में प्रोफेसर हैं।

     

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