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  • Pages: 152p
  • Year: 2006
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126712341
  •  
    इला (1944-2003) की ये कृतियाँ आपके सामने रखते हुए, उनके कुछ विचार, उन्हीं के शब्दों मंे पिरोए, और उनका कुछ इतिहास आपके सामने रखना अपेक्षित होगा- अपने समय की, अपनी खोज और अपनी आस्थाओं की निशान उनकी हर रचना में जो है। इला बीससवीं शताब्दी के उन दशकों में बड़ी हुई- उसे ‘होश सँभालना’ भी तो कहा जाता है- जब सम्भ्रान्त परिवार की बेटियों के लिए सिर्फ एक ही रास्ता खुला था- जल्दी से शादी करना और उसके बाद जैसे-तैसे, हो सके तो मुस्कुराते हुए, दाम्पत्य जीवन निभाना। जिन्होंने ऐसा न चाहा, जो अपनी ही जिद्द से अट्ठारह-उन्नीस की उम्र के बाद भी कुछ समय तक कुँवारापन खींच ले गईं, अपनी आवाज़, अपनी रचनात्मकता ढँूढ़ते हुए, वे समाज की किस इकाई से जुड़ सकती थीं? इला दो विरोधी संस्कृतियों की टकराहट में पलीं। एक ओर थी रूढ़िवादी मारवाड़ी सभ्यता जो शहरी जीवन में भी ग्रामीण लोक संस्कृति को सँजोए हुई थी, जो स्त्रियों को दबाकर रखती थी। पिता स्वयं स्वतन्त्र वृत्ति के थे, उदारचित थे, विद्या का सम्मान करते थे पर पुत्रियों को काबू में रखना चाहते थे। दूसरी ओर थी शिक्षा को जीवन में अत्यन्त उच्च पद देने वाली संयुक्त प्रान्त की कायस्थ संस्कृति। कुछ लोगों का कहना है कि हम सभ्यता की, इसकी दार्शनिक और सामाजिक जागरूकता की तुलना उन्नीसवीं सदी के बंगाली ब्राह्म समाज से की जा सकती है। इलाहाबाद, आगरा, लखनऊ में बंगाली भद्र समाज के परिवार भी कम न थे और उनसे सांस्कृतिक सम्बन्ध की भी कमी न थी।

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    Ila Dalmiya

    इला (1944-2003) की ये कृतियाँ आपके सामने रखते हुए, उनके कुछ विचार, उन्हीं के शब्दों में पिरोए, और उनका कुछ इतिहास आपके सामने रखना अपेक्षित होगा - अपने समय की, अपनी खोज और अपनी आस्थाओं की निशान उनकी हर रचना में जो है।

    इला बीससवीं शताब्दी के उन दशकों में बड़ी हुई - उसे ‘होश सँभालना’ भी तो कहा जाता है - जब सम्भ्रान्त परिवार की बेटियों के लिए सिर्फ एक ही रास्ता खुला था - जल्दी से शादी करना और उसके बाद जैसे-तैसे, हो सके तो मुस्कुराते हुए, दाम्पत्य जीवन निभाना। जिन्होंने ऐसा न  चाहा, जो अपनी ही जिद्द से अट्ठारह-उन्नीस की उम्र के बाद भी कुछ समय तक कुँवारापन खींच ले गईं, अपनी आवाज़, अपनी रचनात्मकता ढँूढ़ते हुए, वे समाज की किस इकाई से जुड़ सकती थीं?

    इला दो विरोधी संस्कृतियों की टकराहट में पलीं। एक ओर थी रूढ़िवादी मारवाड़ी सभ्यता जो शहरी जीवन में भी ग्रामीण लोक संस्कृति को सँजोए हुई थी, जो स्त्रियों को दबाकर रखती थी। पिता स्वयं स्वतन्त्र वृत्ति के थे, उदारचित थे, विद्या का सम्मान करते थे पर पुत्रियों को काबू में रखना चाहते थे। दूसरी ओर थी शिक्षा को जीवन में अत्यन्त उच्च पद देने वाली संयुक्त प्रान्त की कायस्थ संस्कृति। कुछ लोगों का कहना है कि हम सभ्यता की, इसकी दार्शनिक और सामाजिक जागरूकता की तुलना उन्नीसवीं सदी के बंगाली ब्राह्म समाज से की जा सकती है। इलाहाबाद, आगरा, लखनऊ में बंगाली भद्र समाज के परिवार भी कम न थे और उनसे सांस्कृतिक सम्बन्ध की भी कमी न थी।

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