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Lahooluhan Afganistan

Lahooluhan Afganistan

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  • Pages: 231p
  • Year: 2002
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 8126705124
  •  
    अफ़गशनिस्तान की भौगोलिक संरचना उसकी स्थिति को अनूठा बनाती है। सभ्यता की शुरुआत से ही ये विभिन्न क़ाफ़िलों के आने-जाने का मार्ग रहा है। जो भी सुदूर पूर्व या भारत के जंगलों तथा नदियों की तरफ़ जाना चाहता उसे अफ़गशनिस्तान की घाटियों तथा पहाड़ियों को ज़रूर पार करना पड़ता। एशिया और यूरोप, अरब दुनिया और दक्षिण एशिया और मध्य एशिया एवं पश्चिम एशिया के बीच स्थित होने की वजह से ये हर किसी को लुभाता है। क्या तालिबान के हटने तथा नई सत्ता के आने से ये लोभ-लालच ख़त्म होगा? पाँच साल के तालिबान शासन ने अफ़गशनिस्तान को सदियों पीछे ढकेल दिया है। शासकों ने बामियान की बौद्ध मूर्तियों के रूप में अपनी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर खो दी। ये एक तरह से द्वेष में आकर अपनी ही नाक काट लेने जैसा था, क्योंकि दुनिया ने तालिबान के तौर-तरीक़ों तथा विश्व आतंकवाद के निर्माता के रूप में उसे नामंजूश्र कर दिया था। काबुल के संग्रहालय को प्रसिद्ध गांधार चित्रों तथा प्रतिमाओं से वंचित कर दिया गया। कम्युनिस्ट शासन के दौरान महिलाओं को काम करने की पूरी आज़ादी थी, मगर अफ़गशनिस्तान इस स्थिति से उस स्थिति में ले जाया गया जहाँ तालिबान का राज था और जिसमें महिलाएँ दरवाज़ों के पीछे क़ैद कर दी गईं। स्कूल-कॉलेज तथा कामकाज की जगहों से हटाकर उन्हें बलात्कार के लिए छोड़ दिया गया। अपने समूचे ख़ूनी इतिहास में संभवतः एक बरबाद समाज ने सबसे ज़्यादा विधवाएँ और अनाथ देखे। इससे भी बुरा ये हुआ कि जो भी पढ़ा-लिखा था और मुल्क से जा सकता था, वो अपनी ज़िन्दगी की हिफ़ाज़त के लिए चला गया। क्या उनमें से कुछ लोग वापस लौटेंगे ? उम्मीद करनी चाहिए कि लौटेंगे, मगर कुछ समय के बाद ही क्योंकि आज की हालत डरावनी है। अब इतिहास ने अफ़गशनिस्तान को एक और मौक़ा प्रदान किया है। विश्व बिरादरी के लिए भी ये एक अवसर है जब वो अफ़गशनिस्तान में एक सामूहिक भूमिका अदा कर सकती है। अफ़गशनिस्तान के अतीत और वर्तमान पर एक अनिवार्यतः पठनीय पुस्तक।

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    Shridhar Rao

    श्रीधर राव
    श्रीधर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान, नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं । उन्होंने 1983 में नेशनल डिफेंस कॉलेज, नई दिल्ली से स्नातक की उपाधि प्राप्त की । वे प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के वुडरो विल्सन स्कूल ऑफ पब्लिक एंड इंटरनेशनल अफेयर्स (1978–79) और आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी, कैनबरा के स्ट्रेटजिक एंड डिफेंस स्टडीज सेंटर (1981–1982) में विज़िटिंग फेलो रहे । तालिबान परिघटना पर उनकी दो पुस्तकें हैं तालिबान एंड द अफग़ान टर्माइल (1997 में सम्पादित) और अफग़ान टर्माइल : चेंजिंग इक्वेशंस (1998, सह लेखक) । दक्षिण एशिया पर उनके द्वारा लिखी गई किताबें पाकिस्तान : अ विदरिंग स्टेट  ? (सह लेखक, 1999) और पाकिस्तान बम एंड पाकिस्तान आफ्टर जिया बेहद चर्चित रही हैं । इसके अलावा फारस की खाड़ी पर भी उनकी पैनी नजर रही है जो उनकी पुस्तकों गल्फ : स्क्रेम्बल फॉर सिक्योरिटी, टंकरवार तथा इराक ईरान वार में बखूबी जाहिर हुई है । वे विकासशील देशों के प्रमुख सामरिक विश्लेषकों में से हैं ।

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