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Bharat Mein Nag Parivar Ki Bhashain

Bharat Mein Nag Parivar Ki Bhashain

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  • Pages: 123p
  • Year: 2006
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 8126712090
  •  
    भारत में दुनिया के चार सबसे प्रमुख भाषा-परिवारों की भाषाएँ बोली जाती हैं। सामान्यतया उत्तर भारत में बोली जानेवाली भारोपीय परिवार की भाषाओं को आर्यभाषा समूह, दक्षिण की भाषाओं को द्रविड़भाषा समूह, आस्ट्रो-एशियाटिक परिवार की भाषाओं को मंुडारी भाषा समूह तथा पूर्वोत्तर में रहनेवाली तिब्बती-वर्मी नृजातीय समूह की भाषाओं को नाग-भाषा समूह के रूप में जाना जाता है। पूर्वोत्तर की मंगोलायड प्रजाति के नृजातीय समूह (जनजातियों) को प्राचीन साहित्य में नाग अथवा किरात के रूप में वर्णित किया गया है। भाषा और नस्ल - दोनों ही दृष्टियों से इनका गहरा सम्बन्ध चीनी-तिब्बती भाषा- परिवार से है, लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से यह समूह भारत का अभिन्न अंग है और भारतीयजन के रूप में इनकी पहचान सुस्थापित है। इनकी संख्या भले ही कम हो, मगर सांस्कृतिक वैभव और भाषिक विविधता अनमोल है। डॉ. ग्रियर्सन ने भाषा-सर्वेक्षण के दौरान कुल 179 भाषाओं को चिद्दित किया था, जिनमें से 113 भाषाएँ केवल इस समूह द्वारा बोली जाती हैं। इस दृष्टि से इनकी भाषाओं का अध्ययन जितना रोचक है, उतना ही जश्रूरी भी। परन्तु दुर्भाग्य से भाषाविज्ञान सम्बन्धी अध्ययन केवल भारत में आर्य और द्रविड़ भाषाओं तक ही सीमित रहा है। युवा भाषा वैज्ञानिक राजेन्द्रप्रसाद सिंह ने अपनी पहली पुस्तक भाषा का समाजशास्त्र में अन्य भाषाओं के साथ-साथ आस्ट्रो-एशियाटिक समूह की एक भारतीय भाषा - मुंडारी - को भी अपने विश्लेषण का आधार बनाया था। अब इस पुस्तक में उन्होंने नाग-परिवार की भाषाओं की विस्तृत विवेचना की है और इसके माध्यम से पूर्वोत्तर की संस्कृति पर भी प्रकाश डाला है। भाषाविज्ञान के अध्येता इस क्षेत्र में डॉ. रामविलास शर्मा के कार्य को आगे बढ़ाने के इस सार्थक प्रयत्न का निश्चित रूप से स्वागत करेंगे।

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    Rajendra Singh

    समृद्ध किसान के घर 6 अगस्त, 1959 में जन्मे राजेन्द्र सिंह 12 वर्ष की आयु में ही सामाजिक कार्यो में जुट गए थे। अपने विद्यार्थी जीवन में ही सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन से जुड़ने के बाद, इन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी कर 1980 से भारत सरकार के नेहरू युवक केन्द्र जयपुर में 4 वर्ष तक कार्य किया।

    1985 में राजस्थान के सूखे और उजड़े क्षेत्र थानागाजी के गोपालपुरा में जल संरक्षण कार्य शुरू करके मिट्टी का कटाव रोकने और धरती का पेट पानी से भरने में जुट गए। इन्होंने इस तरह की जल संरचनाओं का निर्माण किया जिनमें जल का वाष्पीकरण न हो और धरती का पेट पानी से भरकर जलस्तर ऊपर आए। यह सारा काम मेवात क्षेत्र में किया गया है। इस क्षेत्र की 7 नदियों अरवरी, रूपारेल, साबी, जहाजवाली, महेश्वरा, भगाणी एवं सरसा को पुनर्जीवित करने में अपना जीवन लगाया है।

    गाँव स्तर पर जल सभा, ग्राम सभा संगठित की, पूरे नदी क्षेत्र में नदी संगठन बनाए। इन संगठनों ने एक तरफ वर्षा जल का संरक्षण किया और दूसरी तरफ इस जल का अनुशासित उपयोग करना सिखाया।

    ये वर्षा जल को संरक्षित करने और नदी को पुनर्जीवित करने वाले समाज के साथ सदैव जुड़े रहे हैं। दिल्ली में यमुना नदी की भूमि पर हो रहे अतिक्रमण को रोकने के लिए सत्याग्रह किया। आजकल गंगा नदी की अविरलता और निर्मलता हेतु संघर्षरत हैं। भारत सरकार के नदी जोड़ योजना के पर्यावरण विशेषज्ञ समिति एवं योजना आयोग के अन्तर मंत्रालय गंगा समूह और राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के सदस्य हैं।

    प्रमुख सम्मान: 2001 में जल संरक्षण के लिए सामुदायिक नेतृत्व के क्षेत्र में एशिया का प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे पुरस्कार। 2005 में जमना लाल बजाज पुरस्कार।

    सम्प्रति: अध्यक्ष, तरुण भारत संघ।

    सम्पर्क: भीकमपुरा-किशोरी, थानागाजी, अलवर, राजस्थान-301022

    मो.: 09414066765

    ई-मेल: jalpurushtbs@gmail.com

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