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Aadi Dharam

Aadi Dharam

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  • Pages: 452p
  • Year: 2009
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126717514
  •  
    भारतीय संविधान ने देश के करीब 10 करोड़ आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति ;ैबीमकनसमक ज्तपइमद्ध के रूप में एक सामाजिक, आर्थिक पहचान दी है किन्तु जनगणना प्रक्रिया में आदिवासी आस्थाओं को प्रतिबिम्बित करने वाले किसी निश्चित ‘कोड’ के अभाव में इस आबादी के बहुलांश को ‘हिन्दू जैसा’ मानकर हिन्दू घोषित कर दिया गया है। एक अनिश्चित कोड जरूर है ‘अन्य’ किन्तु भूले-भटकों के इस विकल्प में कोई जानबूझकर सम्मिलित होना नहीं चाहता। सभी धर्मों के साथ वृहत्तर दायरे में अल्पांश में मेल रहते हुए और सतही तौर पर आपसी वैभिन्न्य के रहते हुए भी आदिवासी आस्थाएँ अन्दर से जुड़ी हुई हैं। यह पुस्तक आदिवासी आस्थाओं की इन्हीं विशिष्टताओं को उजागर करती है और उन्हें ‘आदि धरम’ के अन्तर्गत चिन्हित करने और कानूनी मान्यता देने का प्रस्ताव करती है। वे विशिष्टताएँ हैं: परमेश्वर के ‘घर’ के रूप में किन्हीं कृत्रिम संरचनाओं पर जोर न देकर प्रकृति के अवयवों (पहाड़, जंगल, नदियों) को ही प्राथमिकता देना। मृत्यु के बाद मनुष्य का अपने समाज में ही वापस आना और अपने पूर्वजों के साथ हमेशा रहना। इसलिए समाज सम्मत जीवन बिताकर पुण्य का भागी होना सर्वोत्तम आदर्श। समाज विरोधी होने को पापकर्म समझना। इसलिए स्वर्ग-नरक इसी पृथ्वी पर ही। अन्यत्र नहीं। आदि धरम सृष्टि के साथ ही स्वतःस्फूर्त है, किसी अवतार, मसीहा या पैगम्बर द्वारा चलाया हुआ नहीं। समुदाय की पूर्व आत्माओं के सामूहिक नेतृत्व द्वारा समाज का दिशा निर्देश। आदि धरम व्यवस्था में परमेश्वर के साथ सीधे जुड़ने की स्वतन्त्रता होना। किसी मध्यस्थ पुरोहित, पादरी की अनिवार्यता नहीं। सृष्टि के अन्य अवदानों के साथ पारस्परिक सम्पोषण ;ैलउइपवजपबद्ध सम्बन्ध का होना। आखेट एवं कृषि आधारित सामुदायिक जीवन के पर्व-त्योहारों के अनुष्ठानों एवं व्यक्ति संस्कार के अनुष्ठान मन्त्रों द्वारा पुस्तक में इन्हीं आशयों का सत्यापन हुआ है। पुस्तक में इन अवसरों पर उच्चरित होने वाले मन्त्रों पर विशेष जोर है क्योंकि वर्णनात्मक सूचनाएँ तो पूर्ववर्ती स्रोतों में मिल जाती हैं किन्तु भाषागत तथ्य बिरले ही मिलते हैं।

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    Ramdyal Munda

    जन्म: 1939 ई., डियूटी गांव, जिला: तामर, रांची।

    शिक्षा: लूथेरियन मिशन स्कूल, अमलेसा, तामर, रांची, 1946-53; एस.एस. हाई स्कूल, खुन्ती, रांची, 1953-57; एम.ए. (एनथ्रोपोलॉजी), रांची यूनिवर्सिटी, रांची, 1957-63; एम.ए., पी-एच.डी. (लिंग्युस्टिक) 1963-70; शिकागो यूनिवर्सिटी (यू.एस.ए.)।

    अध्ययन और शोध: साउथ एशियन लैंग्वेेजज एंड सीविलाइजेशन, शिकागो यूनिवर्सिटी में 1963-70 तक रिसर्च सहायक। साउथ एशियन स्टडीज, मिन्नेसोटा विश्वविद्यालय, मिन्नेसोटा में सहायक व संयुक्त प्रोफेसर के रूप में अध्यापन। 1970-1981 से 1999 तक ट्राइवल एंड रिजीनल लैंग्वेजज, रांची विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे। 1983 में आस्ट्रेलियन नेशनल विश्वविद्यालय कैनबरा में विजिटिंग प्रोफेसर। 1986 में साइरेकस विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर और 2001 में टोक्यो विश्वविद्यालय, जापान में विजिटिंग प्रोफेसर।

    फैलोशिप: 1977-78 में अमेरिकन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज से फैलोशिप; 1996 में युनाइटेड स्टेट एजूकेशन फाउंडेशन इन इंडिया से फैलोशिप तथा जापान सोसाइटी फॉर द प्रमोशन ऑफ साइंस, टोक्यो से 2001 में फैलोशिप।

    अध्ययन व शोध विषय: 1. इंडियन लैंग्वेजज एंड लिटरेचर; 2. ट्राइवल पीपल्स ऑफ इंडिया; 3. वर्ल्ड इंडिजिनियस मूवमेंट इन झारखंड मूवमेंट।

    प्रकाशित पुस्तकें: 13 पुस्तकें, जिनमें 3 पुस्तकों का सम्पादन किया; 51 पेपर्स; 7 पुस्तकों का हिन्दी, संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी में अनुवाद।

    प्रशासनिक कार्य: 1985-88 तक रांची विश्वविद्यालय में कुलपति। राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय कमेटियों और संगठनों की मेम्बरशिप।

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