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Hindu : Jeene Ka Samriddh Kabaad

Hindu : Jeene Ka Samriddh Kabaad

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  • Pages: 548
  • Year: 2015, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126727957
  •  
    'हिन्दू' शब्द के असीम और निराकार विस्तार के भीतर समाहित, अपने-अपने ढंग से सामाजिक रुढियों में बदलती उखड़ी-पुखड़ी, जमी-बिखरी वैचारिक धुरियों, सामूहिक आदतों, स्वार्थो और परमार्थो की आपस में उलझी पड़ी अनेक बेड़ियों-रस्सियों, सामाजिक-कौतुबिंक रिश्तों की पुख्तगी और भंगुरता, शोषण और पोषण की एक दुसरे पर चढ़ीं अमृत और विष की बेलें, समाज की अश्मिभूत हायरार्की में साँस लेता-दम तोड़ता जन, और इस सबके उबड़-खाबड़ से रह मनाता समय-मरण-लिप्सा और जिवानावेग की अताल्गामी भंवरों में डूबता-उतराता, अपने घावो को चाटकर ठीक करता, बढ़ता काल... देसी अस्मिता का महाकाव्य यह उपन्यास भारत के जातीय 'स्व' का बहुस्तरीय, बहुमुखी, बहुवर्णी उत्खनन है! यह n गौरव के किसी जड़ और आत्ममुग्ध आख्यान का परिपोषण करता है, n 'अपने' के नाम पर संस्कृति की रंगों में रेंगती उन दीमकों का तुष्टिकरण, जिन्होंने 'भारतवर्ष' को भीतर से खोखला किया है! यह उस विरत इकाई को समग्रता में देखते हुए चलता है जिसे भारतीय संस्कृति कहते हैं! यह समूचा उपन्यास हममें से किसी का भी अपने आप से संवाद हो सकता है- अपने आप से और अपने भीतर बसे यथार्थ और नए यथार्थ का रास्ता खोजते राष्टों से! इसमें अनेक पात्र हैं, लेकिन उपन्यास के केंद्र में वे नहीं, सारा समाज है, वही समग्रता में एक पत्र की तरह व्यव्हार करता है! पात्र बस समाज के सामूहिक आत्म के विराट समुद्र में ऊपर जरा-जरा-सा झाँकती हिम्शिलाए हैं! संवाद भी, पूरा समाज ही करता है, लोग नहीं! एक क्षरशील, फिर भी अडिग समाज भीता गूंजती, और 'हमें सुन लो' की प्रार्थना करती जीने की जिद की आर्ट पुकारें! कृषि संस्कृति, ग्राम व्यवस्था और अब, राज्य की आकंठ भ्रष्टाचार में लिप्त नई संरचना-सबका अवलोकन करती हुई यह गाथा-इस सबके अलावा पाठक को अपनी अंतड़ियो में खींचकर समो लेने की क्षमता से समृद्ध एक जादुई पाठ भी है!

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    Bhalchandra Nemade

    भालचन्द्र नेमाड़े

    महाराष्ट्र के सांगवी, जिला—जलगाँव में 27 मई, 1938 को जन्म। पुणे तथा मुंबई विश्वविद्यालयों से एम.ए. और औरंगाबाद विश्वविद्यालय से पी-एच.डी.। औरंगाबाद, लंदन, गोआ तथा मुंबई विश्वविद्यालयों में अध्यापन। मुंबई विश्वविद्यालय के गुरुदेव टैगोर चेयर ऑफ कम्पॅरेटिव लिटरेचर में प्रोफेसर तथा विभाग प्रमुख। सन् 1998 में अवकाश प्राप्त।

    प्रमुख कृतियाँ : उपन्यास : कोसला, बिढ़ार, हूल, जरीला  तथा झूल; काव्य : मेलडी तथा देखणी; आलोचना : साहित्याची भाषा, टीका स्वयंवर, साहित्य संस्कृति आणि जागतिकीकरण, ञ्जह्वद्मड्डह्म्ड्डद्व (साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित); The influence of English on Marathi; Indo-Anglian Writings; Frantz Kafka : A Country Doctor; Nativism : Deshivad अनेक भाषाओं में रचनाओं के अनुवाद।

    सम्मान एवं पुरस्कार : बिढ़ार  (उपन्यास)—महाराष्ट्र साहित्य परिषद का ह.ना. आपटे पुरस्कार; झूल  (उपन्यास)—यशवंतराव चव्हाण पुरस्कार; साहित्याची भाषा (आलोचना)—कुरुंदकर पुरस्कार; टीका स्वयंवर (आलोचना)—साहित्य अकादमी पुरस्कार; देखणी (कविता-संग्रह)—कुसुमाग्रज पुरस्कार; समग्र साहित्यिक उपलब्धियों के लिए महाराष्ट्र फाउंडेशन का गौरव पुरस्कार; शिक्षा एवं साहित्यिक योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान; कुसुमाग्रज जनस्थान पुरस्कार; एन.टी. रामाराव नेशनल लिटरेरी अवार्ड; बसवराज कट्टिमणि नेशनल अवार्ड, महात्मा फुले समता पुरस्कार; समग्र कृतित्व के लिए 50वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार।

    डॉ. गोरख थोरात

    महाराष्ट्र के संगमनेर, जिला—अहमदनगर में सन् 1969 को जन्म। पुणे विश्वविद्यालय से एम.ए. तथा पी-एच.डी.।

    प्रकाशित कृतियाँ : 'चित्रा मुद्गल के कथा साहित्य का अनुशीलन’, 'प्रयोजनमूलक हिंदी’, 'ऐसा सहारा और कहाँ’;  अनुवाद : भालचन्द्र नेमाड़े के 'हिन्दू’ व 'झूल’ (उपन्यास) तथा 'देखणी’ (कविता-संग्रह) के अलावा कई शैक्षिक पुस्तकों के अनुवाद; सम्प्रति : सर परशुरामभाऊ महाविद्यालय, पुणे (महाराष्ट्र) में एसो. प्रोफेसर (हिंदी) के रूप में कार्यरत।

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