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Hind Swaraj : Nav Sabhyata Vimarsh

Hind Swaraj : Nav Sabhyata Vimarsh

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  • Pages: 323p
  • Year: 2011
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126720842
  •  
    हिन्द स्वराज : नवसभ्यता विमर्श गांधी के ‘हिन्द स्वराज’ का प्रखर उपनिवेश विरोधी तेवर सौ साल बाद आज और भी प्रासंगिक हो उठा है । नव उपनिवेशवाद की विकट चुनौतियों से जूझने के संकल्प को लगातार दृढ़तर करती ऐसी दूसरी कृति दूर–दूर नज़र नहीं आती । उसकी शती पर हुए विपुल लेखन के बीच उस पर यह किताब थोड़ा अलग लगेगी । इसकी मुख्य वजह गांधी के बीज–विचारों को अपेक्षाकृत व्यापकतर परिप्रेक्ष्य में समझने की इसकी विशद–समावेशी और संश्लिष्ट दृष्टि है । इसमें गांधी के सोच और कर्म के मूल में सक्रिय विचारकों और इतिहास नायकों–मैज़िनी, टालस्टॉय, रस्किन, एमर्सन, थोरो, ब्लॉवत्स्की, ह्यूम, वेडेनबर्न, नौरोजी, रानाडे, आर–सी– दत्त, मैडम कामा, श्याम जी कृष्ण वर्मा, प्राणजीवन दास मेहता और गोखले आदि के अद्भुत जीवन और चिन्तन की संक्षिप्त पर दिलचस्प बानगी तो है ही, साथ ही गांधीमार्गी मार्टिन लूथर किंग जू–, नेल्सन मंडेला, क्वामेन्क््रू़मा, केनेथ क्वांडा, जूलियस न्येरेरे, डेसमंड टूटू और सेज़ार शावेज़ आदि के विलक्षण अहिंसक संघर्ष की प्रेरक झलक भी । बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की भ्रष्ट सरकारों के साथ निर्लज्ज दुरभिसंधि को उजागर कर उनके पर्यावरण और मानव–द्रोही चरित्र के विरुद्ध गांधी की परम्परा में संघर्षरत और शहीद नाइजीरिया के अदम्य केन सारो वीवा और उनके साथियों के मार्मिक प्रसंग इसमें गहराई से उद्वेलित करते हैं । आधुनिक सभ्यता की जड़ें मशीन और उससे प्रेरित अंधाधुंध औद्योगीकरण में हैं । उनके प्रबल प्रतिरोध का गांधी का जीवट जगजाहिर है । अकारण गांधी उत्तर–आधुनिकता के प्रस्थान–बिन्दु नहीं माने जाते । पुस्तक सोवियत रूस की कम्युनिस्ट तानाशाही के ख़्िालाप़़ हंगरी, चेकोस्लावाकिया और पोलैंड के आत्मवान राज नेताओं इमरे नागी, वैक्लाव हैवेल और लेस वालेश के अहिंसक प्रतिरोध की गौरव–झांकी के साथ गांधी की सोच के वैश्विक और उत्तर–आधुनिक आयाम को बखूबी उद्घाटित करती है । ‘हिन्द स्वराज’ का गुजराती मूल इस पुस्तक के जरिये पहली बार देवनागरी में आया है । कई अनुशासनों से रस ग्रहण करता ‘हिन्द स्वराज’ पर इस अनूठे विमर्श का प्रांजल–ललित गद्य इसे बेहद पठनीय बनाता है ।

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    Virendra Kumar Baranwal

    वीरेन्द्र कुमार बरनवा

    जन्म : 21 अगस्त, 1941; फूलपुर, आज़मगढ़ (उ.प्र.)।

    माँ गायत्री देवी; पिता दयाराम बरनवाल—स्वतंत्रता सेनानी, भारत छोड़ो आन्दोलन (1942) के दौरान जेल-यात्रा, समाजवादी आन्दोलन से गहरा जुड़ाव।

    शिक्षा : बी.ए. (ऑनर्स), एम.ए. (अंग्रेज़ी साहित्य), काशी हिन्दू विश्वविद्यालय; एल-एल.बी., भोपाल विश्वविद्यालय।

    पेशा : कुछ वर्ष अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य का अध्यापन, सन् 1969 से 2005 तक भारतीय राजस्व सेवा (इंडियन रेवेन्यू सर्विस) में, मुख्य आयकर आयुक्त के पद से सेवानिवृत्त।

    कृतियाँ : ‘पानी के छींटे सूरज के चेहरे पर’ (नाइज़ीरियाई कविताओं के अनुवाद), वोले शोयिंका की कविताएँ (नोबेल पुरस्कार सम्मानित पहले अश्वेत रचनाकार की कविताओं के अनुवाद), ‘पहल’ पुस्तकमाला के अन्तर्गत ‘रक्त में यात्रा’ (रेड इंडियन कविताओं के अनुवाद) एवं  ‘वो पहला ना$खुदा हिन्दोस्तानी के स$फीने का—वली दक्खिनी’ तथा ‘तनाव’ पुस्तकमाला के अन्तर्गत ‘माची तवारा की कविताएँ’ (युवा जापानी कवयित्री की तन्काओं

    के अनुवाद)—सभी पुस्तकें/पुस्तिकाएँ विस्तृत परिचयात्मक भूमिका के साथ।

    ‘जिन्ना : एक पुनर्दृष्टि’ (जिन्ना तथा उनके महत्त्वपूर्ण समकालीनों पर एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में विमर्श), ‘हिन्द स्वराज : नव सभ्यता-विमर्श’, ‘रतनबाई जिन्ना’ (नाटक— प्रकाश्य) तीनों राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से।

    अभिरुचियाँ : हिन्दी, उर्दू, अंग्रेज़ी, संस्कृत तथा तुलनात्मक साहित्य के साथ हाशिये पर पड़े साहित्य, $खासकर अश्वेत और रेड इंडियन साहित्य एवं भारतीय पुनर्जागरण तथा स्वतंत्रता-संग्राम के विमर्श में गहरी रुचि।

    पुरस्कार : केंद्रिय हिंदी संस्थान (आगरा) के महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार से राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित।

    सम्प्रति :  महात्मा गांधी से जुड़ी एक पुस्तक पर काम कर

    रहे हैं।

    सम्पर्क : ‘गायत्री’, बी-72, कौशाम्बी, गाजि़याबाद-201010 (उ.प्र.)।

     

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