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Hatya Ki Pawan Ichchhayen

Hatya Ki Pawan Ichchhayen

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  • Pages: 144p
  • Year: 2014, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126725823
  •  
    भालचन्द्र जोशी की इन कहानियों में हमारा समय अपनी इतिहास-गति के साथ कुछ इस तरह से अवस्थित है कि यथार्थ की उत्कंठ तात्कालिकता मुकम्मल तौर पर आधुनिक कहानी के सार्वदेशिक रूपाकार में स्वायत्त हो उठती है। भालचन्द्र जोशी के यहाँ यथार्थ भी है, और कहानी भी—अपनी सुकुमार काया में सुगठित, सुघड़ और सुचिन्तित जो यथार्थ की निपट यथार्थता को भाषा की सृजनात्मक उठान से प्रतिसन्तुलित करती है। भालचन्द्र सामाजिक वास्तविकता को उसके ऊपरी लक्षणों के आधार पर पहचानने की बजाय उसके मूलवत्र्ती चरित्र में रेखांकित करते हैं। यथावसर भालचन्द्र फंतासी का प्रयोग या कल्पना का स्वैर संचरण सम्भव करते हैं। लेकिन ऐसे प्रयोग वे शिल्प-युक्ति के रूप में नहीं, बल्कि यथार्थ को यथातथ्यता से मुक्त करने के उद्देश्य से कथ्य की संश्लिष्ट अन्विति के भीतर, और उसके स्वाभाविक प्रतिफलन के रूप में करते हैं। 'हत्या की पावन इच्छाएँ' और 'नदी के तहखाने में' जैसी कहानियाँ दरअसल कथात्मक यथार्थ के अनूठे विन्यास को चरितार्थ करती हैं। लेकिन जरा गौर से देखें तो सहज ही अनुभव किया जा सकता है कि इन कहानियों में आख्यानात्मक कल्पना, यथार्थ के सिमटते परिसर में विलक्षण ढंग से मुक्त होती है। इस प्रक्रिया में कथा-भाषा यथार्थ की लय के साथ तरंगित होने लगती है और एक जादुई असर पैदा करती है। प्रत्येक कहानी का अपना अलग स्वाद और स्वतंत्र कथात्मक 'डिक्शनÓ है। यहाँ ब्यौरों की अनलंकारिक और तथ्यात्मक भाषा से लेकर लोक-कथा की मुहावरेदार भाषा या स्वैर-सृष्टि को साकार करने में समर्थ कल्पना-प्रवण भाषा अथवा अत्यन्त सौष्ठव सर्जनात्मक गद्य की अनेक छवियाँ हैं। इन कहानियों में नैरेटर यथार्थ को आत्मगत ढंग से नहीं, वस्तुगत तरीके से पेश करता है। यह कथाकार की सर्जनात्मक अन्तर्निष्ठा है जो कहानियों के पाठ की प्रक्रिया में सहज ही महसूस की जा सकती है।

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    Bhalchandra Joshi

    भालचन्द्र जोशी

    पेशे से इंजीनियर हैं और अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. भी किया है।

    आठवें दशक के उत्तरार्द्ध में कहानी लेखन की शुरुआत। आदिवासी जीवन पद्धति तथा कला का विशेष अध्ययन। निमाड़ की लोक-कलाओं और लोक-कथाओं पर काम। चित्रकला में सक्रिय रुचि। देश के प्रमुख अखबारों के लिए समसामयिक विषयों पर लेखन। कुछ समय तक लघु पत्रिका 'यथार्थ’ का सम्पादन। इसके अतिरिक्त 'कथादेश’ के नवलेखन अंक (जुलाई 2002) का सम्पादन। टेलीविजन के लिए क्लासिक सीरीज में फिल्म लेखन। कहानियों का अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद।

    हायर सेकंडरी हेतु एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम के लिए पुस्तक 'इनवाइरॉन्मेंटल एजुकेशन एंड डिजास्टर मैनेजमेंट’ प्रकाशित। कहानी संग्रह 'नींद से बाहर’, 'पहाड़ों पर रात’, 'चरसा’, 'पालवा’ और 'जल में धूप’ प्रकाशित तथा कथा-आलोचना पुस्तक 'यथार्थ की यात्रा’ प्रकाशित। एक उपन्यास 'जस का फूल’ शीघ्र प्रकाश्य। मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का 'वागीश्वरी पुरस्कार’। अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति पुरस्कार। इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी दिल्ली (हिन्दी पत्रिका 'पाखी’) का वर्ष 2012 का शब्द-साधक जनप्रिय लेखक सम्मान तथा मध्य प्रदेश अभिनव कला परिषद, भोपाल द्वारा अभिनव शब्द-शिल्पी सम्मान।

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