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Hamara Shahar Us Baras

Hamara Shahar Us Baras

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  • Pages: 352p
  • Year: 2016, 3rd Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788171786299
  •  
    आसान दीखनेवाली मुश्किल कृति हमारा शहर उस बरस में साक्षात्कार होता है एक कठिन समय की बहुआयामी और उलझाव पैदा करनेवाली डरावनी सच्चाईयों से । बात ‘उस बरस’ की है, जब ‘हमारा शहर’ आए दिन सांप्रदायिक दंगों से ग्रस्त हो जाता था । आगजनी, मारकाट और तद्जनित दहशत रोजमर्रा का जीवन बनकर एक भयावह सहजता पाते जा रहे थे । कृत्रिम जीवन शैली का यों सहज होना शहरवासियों की मानसिकता, व्यक्तित्व, बल्कि पूरे वजूद पर चोट कर रहा था । बात दरअसल उस बरस भर की नहीं है । उस बरस को हम आज में भी घसीट लाये हैं । न ही बात है सिर्फ हमारे शहर की । ‘और शहरों जैसा ही है हमारा शहर’ – सुलगता, खदकता-‘स्रोत और प्रतिबिम्ब दोनों ही’ मौजूदा स्थिति का । एक आततायी आपातस्थिति, जिसका हल फ़ौरन ढूंढना है; पर स्थिति समझ में आए, तब न निकले हल । पुरानी धारणाए फिट बैठती नहीं, नई सूझती नहीं, वक्त है नहीं कि जब सूझें, तब उन्हें लागू करके जूझें स्थिति से । न जाने क्या से क्या हो जाए तब तक । वे संगीने जो दूर है उधर, उन पर मुड़ी, वे हम pa भी न मुद जाएँ, वह धुल-धुआं जो उधर भरा है, इधर भी न मुद आए । अभी भी जो समझ रहे हैं कि दंगे उधर हैं-दूर, उस पार, उन लोगों में-पाते हैं कि ‘उधर’ ‘इधर’ बढ़ आया है, ‘वे’ लोग ‘हम’ लोग भी हैं, और इधर-उधर वे-हम करके खुद को झूठी तसल्ली नहीं दी जा सकती । दंगे जहाँ हो रहे हैं, वहां खून बह रहा है । सो, यहाँ भी बह रहा है, हमारी खाल के नीचे । अपनी ही खाल के नीचे छिड़े दंगे से दरपेश होने की कोशिश हेई इस गाथा का मूल । खुद को चीरफाड़ के लिए वैज्ञानिक की मेज पर धर देने जैसा । अपने को नंगा करने का प्रयास ही अपने शहर को समझने, उसके प्रवाहों को मोड़ देने की एकमात्र शुरुआत हो सकती है । यही शुरुआत एक जबरदस्त प्रयोग द्वारा गीतांजलिश्री ने हमारा शहर उस बरस में की है । जान न पाने की बढती बेबसी के बीच जानने की तरफ ले जाते हुए ।

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    Geetanjali Shree

    गीतांजलि श्री

    गीतांजलि श्री के चार उपन्यास-माई, हमारा शहर उस बरस, तिरोहित, खाली जगह-और चार कहानी-संग्रह-अनुगूँज, वैराग्य, प्रतिनिधि कहानियां, यहाँ हाथी रहते थे-छप चुके हैं । अंग्रेजी में एक शोध ग्रन्थ और अनेक लेख प्रकाशित हुए हैं ।

    अंग्रेजी में एक शोध ग्रन्थ और अनेक लेख प्रकाशित हुए है ।

    इनकी रचनाओं के अनुवाद भारतीय और यूरोपीय भाषाओँ में हुए हैं ।

    गीतांजलि थियेटर के लिए भी लिखती हैं ।

    फेलोशिप, रेजिडेन्सी, लेक्चर आदि के लिए देश-विदेश की यात्राएँ करती हैं ।

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