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Ek Sadhvi Ki Satta Katha

Ek Sadhvi Ki Satta Katha

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  • Pages: 367p
  • Year: 2008
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126716029
  •  
    उदयपुरम् में मचे राजनीतिक कोलाहल और आपाधापी के उन अस्थिर क्षणों में मथुरा प्रस्थान करने से पूर्व साध्वी ने ‘राष्ट्रहित में हिंसा के विरुद्ध’ राज्यपाल को अपना त्यागपत्र सौंप दिया। उनके लिए यह निर्णायक क्षण थे। एक बड़ा दांव उन्होंने लगा दिया था। जब वे राजमहल से बाहर निकलीं तो महल के प्रवेश द्वार पर पलटकर भीतर उस भित्ति पर अपनी दृष्टि केंद्रित की, जहां महात्मा का विशाल चित्र लगा हुआ था। चित्र के नीचे महात्मा के अंतिम वचन अंकित थे - ‘ईश्वर साक्षी है...।’ सत्ता से बाहर होने पर प्रत्येक मुख्यमंत्री द्वार पर आकर कुछ क्षण ठहरकर महात्मा से दृष्टि अवश्य मिलाता था। साध्वी ने भी महात्मा को करबद्ध प्रणाम किया और द्वार से बाहर आ गईं। एक बार पुनः उन्होंने भावपूर्ण होकर राजमहल को अपने दृष्टि-पटल पर अंकित किया। वे लगभग एक वर्ष ही राजमहल में रह पाई थीं और अब भूतपूर्व मुख्यमंत्री थीं। जब उनके रथ राजमहल के विशाल मुख्य द्वार से बाहर निकले तो वे मौन थीं और उनके नेत्र अश्रुपूरित थे। ‘...अंततः धन की उन्हें भी आवश्यकता है...उन्हें भी अपने पुत्रों को विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालयों में अध्ययन के लिए भेजना है...अपनी कन्याओं के विवाह उन्हें भी राजसी ठाट-बाट से करने हैं...महलों के आकार के आवास उन्हें भी चाहिए...आय के अकूत स्रोतों की आवश्यकता उनके परिजनों और संबंधियों को भी है...उनकी पत्नियों और प्रेमिकाओं को ऐश्वर्य के पौष्टिक आहार की जीवनपर्यंत आवश्यकता है...फिर उनकी बिगड़ैल और दिशाभ्रष्ट संतानों की अपनी अपेक्षाएं हैं...जब जनतंत्र में अर्थ की यह महाप्रतापी गंगा बह ही रही है तो वे बेचारे क्यों सत्ता के समृद्ध तट पर सूखे खड़े रहें...यह तो उनके प्रति अन्याय होगा।’ यह स्वर उनका था, जो प्रसिद्ध व्यंग्यकार थे। मदिरा के चार चषक उदर में उतारने के बाद उनका व्यंग्यबोध कुंडलिनी की भांति जाग्रत हो जाता था। इस समय उनकी यही प्रकाशित अवस्था थी।

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    Vijay Manohar Tiwari

    विजय मनोहर तिवारी

    पेशे से पत्रकार। मध्यप्रदेश के सागर जिले के मंडीबामौरा में जन्म। एसएसएल जैन पीजी कॉलेज, विदिशा से गणित में एम.एस-सी. प्रथम श्रेणी प्रथम-1991। एक वर्ष कॉलेज के ही गणित विभाग में अध्यापन। एक ही वर्ष में अध्यापन से मुक्ति और पत्रकारिता में प्रवेश। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से 1993 में पत्रकारिता स्नातक की उपाधि प्रथम श्रेणी प्रथम। ‘दैनिक नई दुनिया’ भोपाल से पत्रकारिता की शुरुआत। तत्पश्चात् हिन्दी पत्रकारिता की पवित्र विद्यापीठ ‘नई दुनिया’ इन्दौर में नौ वर्ष रिपोर्टिंग। 2003 में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रवेश और ढाई साल तक ‘सहारा-समय’ न्यूज चैनल में रिपोर्टिंग। संप्रति भारत के सबसे तेज बढ़ते बहुप्रसारित अग्रणी अखबार ‘दैनिक-भास्कर’ में विशेष संवाददाता।

    विशेष: वर्ष 2004 के मानसून में मध्यप्रदेश की इंदिरा सागर बाँध परियोजना में डूबे हरसूद समेत ढाई सौ गाँवों के विस्थापन पर ढाई महीने तक टीवी पर लाइव कवरेज। इस कवरेज पर केन्द्रित पुस्तक ‘हरसूद 30 जून’ को वर्ष 2007 में अखिल भारतीय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार। एनएसडी, दिल्ली द्वारा इस किताब पर एक नाटक की रचना। रोजमर्रा की रिपोर्टिंग के अलावा वर्ष 2000 में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र व गुजरात में स्वाध्याय परिवार के आत्मनिर्भर गाँवों में भ्रमण व रिपोर्टिंग। झाबुआ के चर्चित हिन्दू संगम और धार के विवादास्पद भोजशाला आन्दोलन व मध्यप्रदेश में हर्बल खेती पर कवरेज।

    पुरस्कार: वर्ष 1997 से 2007 तक प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में श्रेष्ठ रिपोर्टिंग के अनेक अवार्ड।

    प्रकाशन व लेखन: दो किताबें ‘हरसूद 30 जून’ और ‘प्रिय पाकिस्तान’ प्रकाशित। मीडिया पर केन्द्रित उपन्यास ‘अन्तःकथा’ और संस्मरण संकलन ‘अपनी आयतें’ अप्रकाशित। भारत के सन्दर्भ में आतंकवाद पर केन्द्रित एक अन्य उपन्यास पर लेखन जारी।

    ईमेल: vijaye9@gmail.com फोन: 098930.43200

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