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Ek Kasbe Ke Notes

Ek Kasbe Ke Notes

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  • Pages: 223p
  • Year: 2012
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126724505
  •  
    एक कस्बे के नोट्स नीलेश रघुवंशी की एक उपलब्धि यह है कि उसने एक ऐसे कथानक को, जिसमें भावनिकता के भयावह अवसर थे, एक निर्मम ढंग से यथार्थवादी रखा है जिसमें हास-परिहास के लिए भी गुंजाइश है। परिवार में माँ है लेकिन वह हमेशा ममतामयी और पतिपरायणा नहीं है उसमें छिपी विद्रोहिणी कभी-भी जागृत हो सकती है। इकलौता बेटा मुँहफट और दुर्विनीत है। अलग-अलग उम्रों, स्वभावों और नियतियों वाली बेटियाँ हैं लेकिन उनमें एक बराबरी का बहनापा है। उनके अपने-अपने कुँवारे और ब्याहता सपने हैं। उनकी जिद्दोजहद, छोटी-बड़ी दुखान्तिकाएँ और जीवन-परिवर्तक उपलब्धियाँ भी हैं। क्या भारत सरीखे जटिल समाज में ‘फेमिनिस्ट’ सरीखे सीमित और भ्रामक शब्द की जगह ‘एक कस्बे के नोट्स’ को हम ‘मातृवादी’ या ‘बेटीवादी’ या ‘बहनापावादी’ कह सकते हैं? और यदि पिता को लेकर इतनी समझदारी और स्नेह है तो ‘पितावादी’ भी क्यों नहीं? शायद यह हिन्दी का पहला उपन्यास है जिसमें किसी लेखिका ने एक निम्न-मध्यवर्गीय कस्बाई पारिवारिक जीवन को इतनी अन्तरंगता और असलियत से जीवन्त किया हो। प्रतिभा के लिए सृजन में तो कुछ भी असम्भव नहीं, किन्तु किसी पुरुष के लिए ऐसे घर-परिवार का इतना अन्दरूनी अनुभव मुश्किल ही था। सच तो यह लगता है कि लेखिका ने इस एक कस्बे के बहाने लगभग सभी उत्तर भारतीय कस्बों को चेहरा दे दिया है। हम सब यदि (अब) छोटे शहरों में नहीं भी रहते हैं तो कभी-न-कभी उनमें हमारी बूद-ओ-बाश थी, वहाँ से गुजरते, लौटते रहते हैं, हमारे कितनी ही दोस्तियाँ और रिश्ते, और सबसे ऊपर, स्मृतियाँ, अब भी वहीं बसी हुई हैं। हिन्दी लेखन से एक झटके से कस्बा काट दो, वह हलाल हो जाएगा। नीलेश रघुवंशी ने बेशक अपने कस्बे को सजीव पात्रों से आबाद किया है लेकिन उसमें हरकत और जान तभी आती है जब सारे कस्बाई दृश्य, ध्वनियाँ, रंग, गंध, स्पर्श और वे मौसम और धूल-धस्सर जो सिर्फ कस्बों में नसीब होते हैं, उस अल्बम को मूक सीपिया से परदे के वाचाल रंगीन में बदल देते हैं। टेलीविजन पर अपने लम्बे अनुभव के कारण लेखिका अपना शिल्प नियंत्रित रखना जानती है, और पठनीयता के स्तर पर पिछले कुछ वर्षों में ऐसे उपन्यासों का दुर्भिक्ष-सा रहा है। - विष्णु खरे

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    Nilesh Raghuwanshi

    जन्म: 4 अगस्त, 1969, गंज बासौदा (मध्यप्रदेश)

    शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी साहित्य), एम.फिल. (भाषा विज्ञान)।

    रचनाएँ: घर निकासी: 1997, पानी का स्वाद: 2004, अन्तिम पंक्ति में: 2008 (कविता-संग्रह); एलिस इन वंडरलैंड, डॉन क्विगजोट, झाँसी की रानी (2006)

    (बच्चों के नाटक); छुटी हुई जगह स्त्री कविता पर नाट्य आलेख, अभी न होगा मेरा अन्त निराला पर नाट्य आलेख, ए क्रिएटीव लीजेंड सैयद हैदर रजा एवं ब.व. कारन्त पर नाट्य आलेख और भी कई नाटक एवं टेलीफिल्म में पटकथा लेखन।

    सम्मान: भारतभूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार (हण्डा कविता पर 1997), आर्य स्मृति सम्मान (घर निकासी पर 1997), दुष्यन्त कुमार स्मृति सम्मान (घर निकासी 1997), केदार सम्मान (पानी का स्वाद पर 2004), प्रथम शीला स्मृति पुरस्कार (पानी का स्वाद 2006), भारतीय भाषा परिषद कोलकाता का युवा लेखन पुरस्कार (अन्तिम पंक्ति में 2009)।

    गाथा एक लम्बे सफर की वृत्तचित्र के लिए ;ठमेज स्पजमतंतल ।कंचजंजपवद व ि।बबसंपउमक ूवताद्ध डी.डी. अवार्ड 2003

    वृत्तचित्र जगमग जग कर दे डी.डी. अवार्ड 2004

    सम्प्रति: दूरदर्शन केन्द्र, भोपाल में कार्यरत।

    सम्पर्क: ए-40, आकृति गार्डन्स नेहरू नगर, भोपाल (म.प्र.)।

    फोन: 0755-2775062 मो.: 9826701393

    email : neeleshraghuwanshi67@gmail.com

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