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Dola Bibi Ka Mazaar

Dola Bibi Ka Mazaar

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  • Pages: 210p
  • Year: 2003, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126706534
  •  
    मैंने कब कहा कि मैं कहानियां लिखता हूँ | मैं तो बस अपने आसपास जो कुछ देखता हूँ, महसूस करता हूँ, वही लिखता हूँ | मेरे किरदार मेरी उन अनगिनत लडाइयों की खोज और उपज हैं, जो दशकों बिहार के गांवों में लड़ी गयी हैं, बल्कि आज भी लड़ी जा रही हैं | मैंने ये भी कब कहा कि मेरे पास गांवों के दुखों का इलाज हैं | मैं तो बस अपने किरदारों के यातनापूर्ण सफरनामे का एक अदना साक्ष्य हूँ | एक साक्ष्य, जो कभी अपने किरदारों की रूह में उतर जाता है, और कभी किरदार ही जिस के वजूद का हिस्सा बन जाते हैं | मैं तटस्थ नहीं हूँ | मैं तटस्थ कभी नहीं रहा | आगे भी मेरे तटस्थ होने की कोई गुंजाइश नहीं है | मैं खुद अपनी लडाइयों का एक अहम् हिस्सा रहा हूँ , आज भी हूँ | मेरी नजर में, तटस्थता किसी भी संवेदनशील आदमी या समाज के लिए आत्मघाती होती है | मैंने झंडे उठाये हैं, परचम लहराये हैं, नारे बुलंद किये हैं | जो ताकतें सदियों राज और समाज को अपनी मर्जी से चलाती रही हैं, उनकी बख्शी हुई यातनाएं झेली हैं | लेकिन अपनी डायरी के पन्ने स्याह करते वक्त मैंने, कभी भी, इन यातनाओं को बैसाखी की तरह इस्तेमाल नहीं किया है | न ही मैंने इन्हें अपने डायरी-शिल्प का माध्यम ही बनने दिया है | अतः मैं आप से कैसे कहूँ कि इस पुस्तक में शामिल तहरीरों को आप कहानी के रूप में स्वीकारें |

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    Zabir Hussain

    जाबिर हुसेन
    अंग्रेज़ी भाषा एवं साहित्य के प्राध्यापक रहे। जेपी तहरीक में बेहद सक्रिय भूमिका निभाई। 1977 में मुंगेर से बिहार विधान सभा के लिए चुने गए। काबीना मंत्री बने। बिहार अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष रहे।
    बिहार विधान परिषद् के सभापति रहे। राज्य सभा के सदस्य रहे।
    हिन्दी-उर्दू में दो दर्जन से ज़्यादा किताबें प्रकाशित। उर्दू-फारसी की लगभग 50 पांडुलिपियों का सम्पादन। उर्दू-हिन्दी की कई पत्रिकाओं का सम्पादन।

    रचनाएँ : रेत से आगे, चाक पर रेत, ये शहर लगै मोहे बन (हिंदी-उर्दू), डोला बीबी का मज़ार, रेत पर खेमा, जि़न्दा होने का सबूत, लोगां, जो आगे हैं, अतीत का चेहरा, आलोम लाजावा, ध्वनिमत काफी नहीं, दो चेहरों वाली एक नदी; कविता : कातर आँखों ने देखा, रेत-रेत लहू, एक नदी रेत भरी, उर्दू : अंगारे और हथेलियाँ, सुन ऐ कातिब, बे-अमां, बिहार की पसमांदा मुस्लिम आबादियाँ।

    सम्पादन : छह जिल्दों में बहार हुसेनाबादी का सम्पूर्ण साहित्य, मेरा सफ़र तवील है : अखतर पयामी, दीवारे शब, दयारे शब, हिसारे शब, निगारे शब (उर्दूनामा के अंक)।

    सम्मान : 2005 में उर्दू कथा-डायरी रेत पर खेमा के लिए साहित्य अकादेमी सम्मान। 2012 में नवें विश्व हिन्दी सम्मेलन (जोहान्सबर्ग, दक्षिण अफ्रीका) में विश्व हिन्दी सम्मान।
    सम्पर्क : 247 एमआईजी, लोहियानगर, पटना- 800020

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