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Bhoolane Ke Viruddha

Bhoolane Ke Viruddha

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  • Pages: 224p
  • Year: 1990
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8171781276
  •  
    रचना और आलोचना का सम्बन्ध सनातन है और दोनों ही एक-दूसरे की पूरक हैं। रचना यदि जीवन का भरपूर और संश्लिष्ट संवेदन है तो आलोचना उसका बौद्धिक समतुल्य। पाठक इन दोनों से जुड़ता है, लेकिन रचना से गुजरना उसकी पहली शर्त है। इससे रचना और पाठक के बीच जो सम्बन्ध बनता है, आलोचना उसे और अधिक गहरा और तर्कसंगत बनाने का कार्य करती है। सुपरिचित कवि, कथाकार और साहित्य-समीक्षक रमेशचन्द्र शाह की यह कृति रचना और आलोचना के इसी सम्बन्ध-निर्वाह की सार्थक परिणति है। लेखक के शब्दों में, आलोचना स्वैरिणी नहीं, बल्कि स्वाधीन बुद्धि की उत्तरदायी गतिविधि है। उसकी यह भी मान्यता है कि ''साहित्य की दुनिया हमारे व्यापक सांस्कृतिक दृश्य का ही एक हिस्सा—गोकि सबसे अन्दरूनी और सबसे गझिन बुनावटवाला हिस्सा—है।’’ इस सन्दर्भ में इस कृति का 'आलोचना, परम्परा और इतिहास’ नामक पहला निबन्ध अत्यन्त महत्त्वपूर्ण निष्कर्षों तक ले जाता है। पूरी पुस्तक 'प्राचीन और नवीन’ तथा 'अस्ति और स्वराज’ नामक दो उपशीर्षकों में विभाजित है। इनमें जो पन्द्रह निबन्ध संग्रथित हैं, उनमें एक ओर जहाँ लेखक ने 'भारत-भारती’ के माध्यम से मैथिलीशरण गुप्त का और छायावाद की प्रासंगिकता पर विचार करते हुए प्रसाद का पुनर्मूल्यांकन किया है, वहीं उसने अज्ञेय, निर्मल वर्मा, मलयज और श्रीकान्त वर्मा इत्यादि परवर्ती और समकालीन लेखकों की रचनात्मकता की गम्भीर विवेचना की है। दूसरे खंड के अन्तिम निबन्ध में उसने अनुवादजीवी संस्कृति और वैचारिक स्वराज का सवाल उठाकर पाठकीय चेतना को गहरे तक झकझोरा है। संक्षेप में, लेखक के ही शब्दों का सहारा लें तो इस कृति में ''पिछले दसेक वर्षों के दौरान लिखी गई कुछ समीक्षाएँ, पुनर्मूल्यांकन और कुछ स्वतंत्र विवेचनात्मक लेख भी संकलित हैं। शुद्ध साहित्यिक चिन्तन की आलोचना को भी शामिल करने का औचित्य, आशा है, मर्मज्ञ पाठक स्वयं ही इस पुस्तक के क्रम-विन्यास से गुजरते हुए समझ सकेंगे और संकलित सामग्री के व्यापक वैविध्य का ही नहीं, उसकी अन्त:संगति का भी पर्याप्त आश्वासन पा सकेंगे।’’

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    Ramesh Chandra Shah

    जन्म : वैशाखी त्रयोदशी, 1937 अल्मोड़ा, उत्तरप्रदेश।

    शिक्षा : अल्मोड़ा  तथा  प्रयाग विश्वविद्यालय में।

    प्रकाशित कृतित्व—काव्य : कछुए की पीठ पर, हरिश्चन्द्र आओ, नदी भागती आई, प्यारे मुचकुन्द को, चाक पर समय तथा देखते हैं शब्द भी अपना समय के अतिरिक्त तीन बाल कविता-संग्रह। उपन्यास : गोबरगणेश, कि़स्सा ग़ुलाम, पूर्वापर, आखि़री दिन, पुनर्वास। छठा उपन्यास 'विभूतिबाबू की आत्मकथा’ शीघ्र प्रकाश्य। 'कि़स्सा ग़ुलाम’ आठ भारतीय भाषाओं में अनूदित। कहानी-संग्रह : जंगल में आग, मुहल्ले का रावण, मानपत्र, प्रतिनिधि कहानियाँ (राजकमल सीरीज़); थिएटर। निबन्ध-संग्रह : शैतान के बहाने, रचना के बदले, पढ़ते-पढ़ते, सबद निरन्तर, आड़ू का पेड़, स्वधर्म और कालगति तथा स्वाधीन इस देश में। यात्रा-वृत्तान्त : बहुवचन में दो यात्रा-वृत्तान्त संकलित तथा एक लम्बी छाँह। अंग्रेज़ी में : येट्स एंड एलियट : पर्सपैक्टिव्ज़ ऑन इंडिया, जयशंकर प्रसाद तथा टेमेनोए अकादमी लन्दन द्वारा चार व्याख्यानों की पुस्तिका प्रकाशित।

    सम्मान : सर्जनात्मक उपलब्धियों के लिए मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग का शिखर-सम्मान, कविता-संग्रह नदी भागती आई के लिए मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् का भवानीप्रसाद मिश्र पुरस्कार, उपन्यास पूर्वापर के लिए भारतीय भाषा परिषद्, कलकत्ता तथा निबन्ध-संग्रह स्वधर्म और कालगति के लिए उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सम्मानित।

    सम्प्रति : भोपाल के हमीदिया कॉलेज से अंग्रेज़ी विभाग के प्रोफ़ेसर-विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त होने के उपरान्त निराला सृजनपीठ, भोपाल के निदेशक पद पर कार्यरत।

    सम्पर्क : निराला  सृजनपीठ  सी-165/1, प्रोफ़ेसर्स कालोनी, भोपाल-462 002

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