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Dharamsatta Aur Pratirodh Ki Sanskriti

Dharamsatta Aur Pratirodh Ki Sanskriti

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  • Pages: 279p
  • Year: 2003
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126706295
  •  
    कभी धर्म राजनीतिक सत्ता के बावजूद पूर्ण स्वायत्त था। मध्यकालीन भारत में धर्मअपनी स्वायत्ता कीरक्षा के लिएसैन्य-संघर्ष तक पर उतारू हो जाता था। मौजूदा दौर में राजनीति धर्म की पारम्परिक सत्ता पर कब्जा कर उसे अपनी सफलता की सीढ़ी बनाना चाहती है। पिछले दो दशकों से धर्म इसीलिए बौद्धिक विमर्श के केन्द्र में रहा है। अतः धर्म-सत्ता में आई विकृति के अध्ययन में अन्य अनुशासनों के विचारकों के तत्पर होने कीआवश्यकता बनती है कि धार्मिक टकराव के कारण क्या हैं? क्या इसका कारण धर्म के बाहर है या धर्म के भीतर? बहुदेववादी हिंदू धर्म की सत्ता कभी केन्द्रीकृत नहीं रही, जबकि एकेश्वरवादी इसलाम, ईसाइयत, यहूदी, पारसी धार्मिक सत्ता केन्द्रीकृत रही। इस अंतर के बावजूद सब में उभयबिन्दु यह है कि सभी धर्म महत् तत्व, सुप्रीम बीइंग, में आस्था रखते हैं। धर्म ने स्वयं को दर्शन और सामाजिक कर्तव्यशास्त्र से जोड़ा, इसलिए उसकाअसर मनुष्य के समस्त ज्ञान-विज्ञान, साहित्य और कलाओं में दिखता है। अपने यहाँ धर्मनिरपेक्षता पर अधिक अध्ययन हुए, धर्म उपेक्षित रह गया। धर्मनिरपेक्षता के प्रवर्तक होली ओक ने 1860 में कहा था, ‘‘धर्मनिरपेक्षतवाद न तो धर्मशास्त्र की उपेक्षा करता है, न उसकी स्तुति करता है और न उसे अस्वीकारकरता है।’ इसीलिए लेखक ने धर्म-निषेध वाले नजरिए के बजाय धर्म की स्वीकार्यता को प्रस्थान-बिन्दु बनाया है। प्रकृतिदेव से शुरू हुई अवधारणा ईश्वर के रूप में विकसित हुई। बीसवीं सदी में ईश्वर की अवधारणा क्या है? कहाँ तक विकसित हुई? हिंदू धर्म के संजाल में पीठ, आश्रम, मठ, धामों के बाद हिंदू अध्यात्म के नए केन्द्र और नए पैगम्बर कौन-कौन से हैं? नई धर्म-सत्ता काबाजार से क्या रिश्ता है? हिंदू धर्म सिकुड़ या फैल रहा है? बहुदेववादी हिन्दू धर्म अनुदारता, धार्मिक कट्टरता और बर्बरता की राह पर कैसे चलने लगा? आज हिन्दू धर्म के सम्बन्ध इसलाम, बौद्ध, जैन और ईसाइयत से तनावपूर्ण हैं। यह तनाव हमारे वृहत्तर समाज के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देगा। ऐसे में हिंदू धर्म के लिए आत्म-परीक्षण का ही मार्ग बचता है। हिंदू धर्म, उसके सम्प्रदायों, धर्मों के पारस्परिक संबंध, अद्यतन धार्मिक विकास के विस्तृत विवरणों और विश्लेषण से सजी यह पुस्तक प्रखर, युवा आलोचक और समाज-अध्येता राजाराम भादू का गंभीर प्रयास है। पाठक आस्थावादी हों या अनास्थावादी, यह दोनों के लिए जरूरी किताब है। - अरुण प्रकाश

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    Rajaram Bhadu

    24 दिसम्बर, 1959 को राजस्थान के भरतपुर जिले में लुधावई ग्राम के कृषक परिवार में जन्म।

    प्रारम्भिक शिक्षा गांॅव और भरतपुर शहर में, तदुपरानत राजस्थान विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. और आगरा विश्वविद्यालय के क.मु. हिंदी एवं भाषा विज्ञान संस्थान से लोक-संस्कृति एवं भाषा विज्ञापन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा।

    छात्र-जीवन से ही कृषक व श्रमिक आन्दोलनों में हिस्सेदारी। लम्बे समय तक जन-प्रतिरोध और सांस्कृतिक आन्दोलनों के साथ जुडत्रकर प्रतिबद्ध पत्रकारिता। ‘समकालीन जनसंघर्ष’ मासिक का सम्पादन। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन। हिंदी के अनूठे सांस्कृतिक और साहित्यिक पाक्षिक ‘दिशाबोध’ का संपादन। ‘महानगर’ दैनिक मुम्बई में सह-सम्पादक।

    शिक्षा और सामाजिक अनुसंधान के क्षेत्र में कार्य। विकास अध्ययन संस्थान, बोध और दिगन्तर शिक्षा संस्थाओं के लिए शोध एवं प्रलेखन। शैक्षिक नवाचार और विकास की वैकल्पिक अवधारणाओं पर अध्ययन। विभिन्न जन-आन्दोलनों और जन-अधिकार संगठनों एवं सांस्कृतिक संस्थाओं से सम्बद्ध। साहित्य के अलावा सांस्कृतिक अध्ययनों में रुचि। ‘कविता के संदर्भ’ (आलोचना); ‘स्वयं के विरुद्ध’ (गद्य-कविता) और ‘सृजन-प्रसंग’ (निबंध) कृतियांॅ प्रकाशित।

    फिलहाल राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की मासिक पत्रिका ‘समय माजरा’ के संपादक-मंडल में और मासिक पत्रिका ‘शिक्षा-विमर्श’ का संपादन।

    संपर्क: 43, हिम्मत नगर, टोंक रोड, जयपुर-302018

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