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Desh Sewa Ka Dhandha

Desh Sewa Ka Dhandha

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  • Pages: 148
  • Year: 2018, 2nd Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126715633
  •  
    विष्णु नागर ने एक कवि के अलावा खुद को एक व्यंग्यकार के रूप में भी प्रतिष्ठित किया है। उन्होंने अपने समय को कविता, कहानी, निबन्ध, लेख, व्यंग्य आदि अनेक विधाओं में पकड़ने की कोशिश की है। दरअसल व्यंग्य उनका इतना सहज भाव है कि वह इन सभी विधाओं में बिखरा पड़ा है जिनमें उन्होंने रचनाएँ की हैं। अपने समय की तीखी राजनीतिक-सामाजिक विडम्बनाओं को उन्होंने इस पुस्तक में शामिल सभी व्यंग्यों के माध्यम से पकड़ा है। इनके व्यंग्य की यह विशेषता है कि इनमें एक निर्भीक भाव है। विष्णु नागर शब्दों का खेल करके व्यंग्य या हास्य पैदा करने की कोशिश नहीं करते। वह अपनी बात को स्पष्टता से कहते हैं, शायद इसी कारण ये व्यंग्य अपने समकालीन व्यंग्यकारों के व्यंग्यों से अलग नज़र आते हैं। इनमें कविता की कोमलता और करुणा भी है और कहानी का आख्यान भी। निबन्ध का लालित्य भी है और लेख की विचारशीलता भी। इनमें भाषा का विलक्षण रचाव और सधाव देखने को मिलता है। व्यंग्यकार किसी भी राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति को उसके विभिन्न आयामों में देखने की सतर्क सजग कोशिश करता है इसलिए ये व्यंग्य समकालीन स्थिति पर होकर भी महज़ समसामयिक बनकर नहीं रह गए हैं। इनमें अपने समय के क्रूर तथा नंगे यथार्थ का इतिहास और भूगोल दोनों मिलंेगे। ये व्यंग्य तत्कालीन राजनीतिक स्थितियों के बारे में होकर भी चँूकि कोरे राजनीतिक- सामाजिक नहीं हैं इसलिए राजनीतिक-सामाजिक यथार्थ का बाहरी स्वरूप किंचित बदलने के बावजूद हम पाते हैं कि कुल मिलाकर यथार्थ अपने मूल आशय में वैसा ही आज भी है जैसा कि वह इन व्यंग्यों में दिखता है। विष्णु नागर उन व्यंग्यकारों में हैं जिन्होंने हरिशंकर परसाई, रघुवीर सहाय, बर्टोल्ट ब्रेख्त आदि से सीखा है और उसे अपने ढंग से एक बिल्कुल नया स्वरूप देने की कोशिश की है।

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    Vishnu Nagar

    शिक्षा : बचपन और छात्र-जीवन शाजापुर (मध्य प्रदेश) में बीता। 1971 से दिल्ली में स्वतंत्र पत्रकारिता शुरू की। 'नवभारत टाइम्स’ में पहले मुम्बई और बाद में दिल्ली में विशेष संवाददाता सहित विभिन्न पदों पर 1974 से 1997 के आरम्भ तक रहे। इस बीच 1982 से 1984 तक जर्मन रेडियो 'डोयचे वैले’ में सम्पादक रहे। 1997 से 2002 तक 'हिन्दुस्तान’ (दैनिक) के विशेष संवाददाता। 2003 से 2008 तक हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप की पत्रिका 'कादम्बिनी’ के कार्यकारी सम्पादक रहे। कुछ समय तक दैनिक 'नई दुनिया’ से सम्बद्ध रहे।

    प्रकाशित कृतियाँ : कहानी-संग्रह—'आज का दिन’, 'आदमी की मुश्किल’, 'कुछ दूर’, 'ईश्वर की कहानियाँ’, 'आख्यान’, 'रात-दिन’ तथा 'बच्चा और गेंद’; उपन्यास—'आदमी स्वर्ग में’; निबन्ध—'हमें देखती आँखें’, 'आज और अभी’, 'यथार्थ की माया’, 'आदमी और उसका समाज’ तथा 'अपने समय के सवाल’; व्यंग्य संग्रह—'जीव-जन्तु पुराण’, 'घोड़ा और घास’, 'राष्ट्रीय नाक’, 'नई जनता आ चुकी है’ तथा 'देश-सेवा का धंधा’, 'भारत एक बाज़ार है’; कविता संग्रह—'मैं फिर कहता हूँ चिड़िया’, 'तालाब में डूबी छह लड़कियाँ’, 'संसार बदल जाएगा’, 'बच्चे, पिता और माँ’, 'कुछ चीजें कभी खोई नहीं’, 'हँसने की तरह रोना’।

    'सहमत’ के लिए धर्मनिरपेक्ष रचनाओं के तीन संकलनों तथा 'रघुवीर सहाय’ पुस्तक का सम्पादन असद ज़ैदी के साथ। सुदीप बॅनर्जी की प्रतिनिधि कविताओं के संकलन का सम्पादन लीलाधर मंडलोई के साथ। 'बोलता लिहाफ’ (श्रेष्ठ कथाकारों की कहानियों का संकलन) का सम्पादन मृणाल पाण्डे के साथ।

    इसके अलावा नवसाक्षरों के लिए कई पुस्तकें लिखीं तथा सम्पादित कीं।

    सम्मान : 'कथा’ संस्था का 'अखिल भारतीय कथा पुरस्कार’, हिन्दी अकादमी, दिल्ली का 'साहित्य सम्मान’, कविता के लिए 'शमशेर सम्मान’, मध्य प्रदेश सरकार का 'शिखर सम्मान’ तथा व्यंग्य के लिए 'व्यंग्य श्री’ सम्मान आदि।

    सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन।

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