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Hindi Upanyas Ka Stree-Path

Hindi Upanyas Ka Stree-Path

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  • Pages: 232p
  • Year: 2015, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126728732
  •  
    कहा जाता है कि आज की जमीन पर खड़े होकर पुरानी कृतियों का पाठ नहीं किया जाना चाहिए, खासकर स्त्री एवं दलित दृष्टि से क्योंकि उस समय समाज स्त्री एवं दलित प्रश्नों को लेकर न इतना संवेदनशील था, न सजग। यह भी तर्क दिया जाता है कि लेखक अपने युग की वैचारिक हदबंदियों के बीच रहकर ही अभिव्यक्ति की राह चुनता है। मुझे इस मान्यता पर आपत्ति है। एक, यदि युगीन वैचारिक हदबंदियाँ ही रचना की घेरेबंदी करती हैं, तब वह कालजयी कृति कैसे हुई? दूसरे, यदि साहित्यकार रचयिता/स्रष्टा है तो उसे अपनी गहन अंतर्दृष्टि, उन्नत भावबोध और प्रखर कल्पना द्वारा वह सब साक्षात् करना है जो उसके अन्य समकालीनों की कर्मेंद्रियों और ज्ञानेंद्रियों की पहँुच से बाहर छूट रहा है। सृजन के समय अंतर्दृष्टि के पंखों पर सवार लेखक जब कल्पनाशीलता के आकाश में विचरण करता है तो सोलहों आने लेखक होता है। मुक्ति की आकांक्षा से दिपदिपाती उसकी चेतना जड़ता और पराधीनता, बंधन और व्यवस्थागत दबावों का निषेध कर व्यक्ति को ‘मनुष्य’ रूप में देखने लगती है। मनुष्य को केंद्र में रखने वाला, मनुष्य-संसार की गति, ऊर्जा और सपनों से स्पंदित होने वाला साहित्य निर्वैयक्तिक हो ही नहीं सकता। एक ठोस सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान मनुष्य और समाज की तरह साहित्य और साहित्यकार की भी है। लाख छुपाने की कोशिश करे इंसान, बड़े-बड़े दावों और डींगों के बीच अपनी क्षुद्रताओं और शातिरबाजियों को रंचमात्र भी नहीं छुपा पाता। लेखक भी इसका अपवाद नहीं। पात्रों-स्थितियों-घटनाओं के जरिए बेशक वह नए वक्त की आहटें लेने में सजग भाव से सन्नद्ध रहे, लेकिन इन्हें पाटती दरारों के बीच वह अभिव्यक्त हो ही जाता है। प्रेमचंद से बहुत पहले पहली स्त्री शिक्षिका सावित्रीबाई फुले पर सड़े अंडे-टमाटर फेंककर स्त्रीद्वेषी दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करता रहा है पुरुष-समाज। यह पुस्तक प्रतिष्ठित रचनाकारों के दायित्वपूर्ण योगदान को धुँधलाने की धृष्टता नहीं, आलोचना के पुंसवादी स्वर के बरअक्स स्त्री-स्वर को धार देने की कोशिश है। यों भी साहित्य शब्दों-पंक्तियों-पन्नों-जिल्द में बँधी हदबंदियों का मोहताज नहीं कि लाइब्रेरियों में पड़ा सड़ता रहे। जब वह एक नई समाज-संस्कृति, विचार या चरित्र बनकर लौकिक जगत के बीचोबीच आ बैठता है तब उसे नई चुनौतियों और नए बदलावों के बीच निरन्तर अपने को प्रमाणित भी करते रहना पड़ता है।

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    Rohini Agrawal

    रोहिणी अग्रवाल

    जन्म : 9 दिसम्बर 1959 मानसा, पंजाब ।

    शैक्षणिक योग्यता : एम.ए. (हिंदी एवं अंग्रेजी), पी-एच.डी. (हिंदी), पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा।

    प्रकाशित पुस्तकें :  हिंदी उपन्यास में कामकाजी महिला; एक नजर कृष्णा सोबती पर; इतिवृत्त की संरचना और स्वरूप (पन्द्रह वर्ष के प्रतिमानक उपन्यास); समकालीन कथा साहित्य : सरहदें और सरोकार (आलोचना) । घने बरगद तले (कहानी संग्रह); कहानी यात्रा सात (संपादित कहानी-संग्रह); लगभग डेढ़ दर्जन कहानियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित ।

    सम्मान : कहानी कोहरा छँटता हुआ तथा आर्कीटैक्ट वर्ष 1987 तथा 2003 में हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत; आलोचनात्मक पुस्तक समकालीन कथा साहित्य : सरहदें और सरोकार वर्ष 2008 में हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत; स्पंदन आलोचना पुरस्कार (वर्ष 2010) ।

    सम्प्रति: प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक (हरियाणा) ।

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