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Criminal Race

Criminal Race

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  • Pages: 163p
  • Year: 2003
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126706570
  •  
    हिन्दी पट्‌टी के टोन और टेंपरामेंट, अंडरटोंस एवं अंडरकरेंट्‌स को न तो दूर रहकर 'आह-वाह' के भाववादी नजरिये से जाना जा सकता है, न ही नजदीक रहकर आग्रही नजर से । वर्ग, वर्ण, लिंग, जाति-उपजाति, परंपरा और परिवेश एवं धर्म और राजनीति के मकड़जाल में उलझे आदमी के मर्म तक पहुँचना आज के सही रचनाकार का दायित्व है । मनुष्य की प्रकृति-नियति, उसकी कमजोरियाँ और उसकी ताकत, उसके जहर और उसके अमृत से जूझते-सीझते हेमंत के कथाकार ने कितनी वयस्कता अर्जित कर ली है, इसका साक्ष्य हैं 'क्रिमिनल रेस' की कहानियाँ । यहाँ हेमंत न सिर्फ अपने कई समकालीनों को अतिक्रमित करते हैं बल्कि खुद अपने 'पिछले हेमंत' को भी...! विज्ञान का बीज शब्द है- 'क्यों ?' 'ऐसा क्यों ?' 'ऐसा ही क्यों ?' हेमंत का बीज शब्द है-फंशय !' इतने चिकने-चुपड़े चेहरे, संवाद उघैर आचरण- 'आखिर मंशा क्या है ?', 'हासिल क्या होगा ?' यह संशय कभी संपूर्ण कथा में प्रच्छन्न भाव से व्याप्त है (क्रिमिनल रेस) कभी अंदर से बाहर फैलता हुआ (धक्का)! कभी देश की आदिम शौर्य परंपरा बनकर गुलाम बनाने वाली गलीज औपनिवेशिक शक्तियों से लेकर आज के मल्टीनेशनल्स के ऐटीट्‌यूड्‌स को सूँघता-झपटता है (ओवरकोट) तो कभी औरतों के तन-मन के साथ धन पर भी काबिज होने की पुरुष-चाल पर सवाल उठाता है (लाश-तलाश) तो कभी सभ्यता के उषा-काल और मिथकीय कुहासों से लेकर वर्तमान के तपते द्विप्रहर तक को खंगालते हुए प्रश्नवाचक बन बैठता है कि जीवन के महाभारत में औरत के प्रति यदि कौरवों और पांडवों का रवैया एक-सा है तो ऐसा युद्ध से क्या बदल जाएगा और अगर युद्ध होता ही है तो स्त्रियाँ युद्ध में शामिल क्यों नहीं होंगी सका हुआ क्षण) । अंतत: क्रिमिनल रेस के केन्द्र दिल्ली की आपराधिकी की भूल-भुलैया में भटक कर मासूम देशवासी को रास्तों और गंतव्य तक पर संशय होने लगता है-मैं कहाँ हूँ? सुबह का भूला) । संघर्ष और जन आदोलनों की आग में जीकर रची हुई अपनी नफीस भाषा-शैली की हेमंत की कहानियाँ अपने पाठकों को किसी आनन्द वन या नकली उसाँसों के मरुस्थल में नहीं ले जातीं बल्कि धसकते धरातलों, गिरते आसमानों और हरहराते तूफानों की क्राइसिस के सम्मुख ला खड़ा करती हैं-तुम यहाँ हो और तुम्हारी मंजिल यहाँ! -संजीव

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    Hemant

    जन्म: 24 अक्टूबर, 1949; जमशेदपुर (झारखंड)।

    शिक्षा: तेलुगु ने खड़ा किया, हिंदी ने चलना सिखाया।

    योग्यता: मेकैनिकल इंजीनियरिंग, बी.आई.टी., सिंदरी (धनबाद)।

    पेशा: पत्रकारिता।

    प्रकाशित रचनाएँ: धर्मयुग, हंस, इंडिया टुडे, कथादेश, अब, संवेद, दस्तक, प्रभात खबर (दैनिक), आज (दैनिक) सहित कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में बच्चों के लिए कविता, कहानी और नाटक। जनसंघर्ष, आबादी और जनसंख्या नीति, बिहार के बच्चे, शिक्षा का गतिशास्त्र, एनजीओ सेक्टर, चुनाव, राजनीति और सामाजिक न्याय, हिंदी पत्रकारिता का भविष्य और भविष्य की पत्रकारिता आदि विषयों पर सैकड़ों फीचर-आलेख और कथा-रिपोर्ताज।

    गाँव (राजनीतिक स्वायत्तता बनाम सांस्कृतिक अस्मिता), बिहार की आधी आबादी, अहिंसा के लिए अनुशासन (रिचर्ड बी. ग्रेग की किताब का अनुवाद), बतकही बिहार की (कथा रिपोर्ताज), भारत का विवेक (कहानी- संग्रह, नवसाक्षरों के लिए), क्रिमिनल रेस (कहानी-संग्रह)।

    संपादन: जब नदी बँधी (संदर्भ: बिहार में बाढ़-सुखाड़ और बड़े बाँध), गुरु कुम्हार शिष कुंभ (संदर्भ: ग्रामीण बच्चों के स्कूल में पढ़ानेवाले मास्टर की डायरी, लेखक: डॉ. योगेन्द्र), जमीन किसकी, जोते उसकी (संदर्भ: बोधगया भूमि आंदोलन, लेखक: प्रभात), : ष्टि और दिशा (संदर्भ: वन और आदिवासी संस्कृति, लेखक: घनश्याम और हेमन्त)।

    सम्मान: रणधीर प्रसाद वर्मा सम्मान, 1997 (पत्रकारिता); रामजी मिश्र मनोहर अवार्ड, 2000 (पत्रकारिता)।

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