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Chandragupta Maury Aur Uska Kal

Chandragupta Maury Aur Uska Kal

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  • Pages: 293p
  • Year: 2016, 9th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126780884
  •  
    स्व. प्रो. राधाकुमुद मुखर्जी की गणना देश के शीर्षस्थ इतिहासकारों में होती है और परम्परागत दृष्टि से इतिहास लिखनेवालों में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रस्तुत पुस्तक में प्रो. मुखर्जी के वे भाषण हैं, जो उन्होंने सर विलियम मेयर भाषणमाला के अंतर्गत मद्रास विश्वविद्यालय में दिए थे। इन निबन्धों में भारत के प्रथम सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के जन्म तथा प्रारम्भिक जीवन और उसके विजय-अभियानों की चर्चा करते हुए उन सारे कारकों का गहराई से अध्ययन किया गया है जो एक शक्तिशाली राज्य के निर्माण में और फिर उसे स्थायित्व प्रदान करने में सहायक हुए। चन्द्रगुप्त के कुशल प्रशासन और उसकी सुविचारित आर्थिक नीतियों की परम्परा अशोक के काल तक अक्षुण्ण रहती है। आर्थिक जीवन का राज्य द्वारा नियंत्रण तथा उद्योगों का राष्ट्रीयकरण मौर्यकाल की विशेषता थी। प्रो. मुखर्जी का यह अध्ययन चौथी शताब्दी ई.पू. की भारतीय सभ्यता के विवेचन-विश्लेषण के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसमें कौटिल्य के अर्थशास्त्र की बहुत सारी ऐसी सामग्री का समुचित उपयोग किया गया है, जिसके सम्बन्ध में या तो काफी जानकारी नहीं थी या जिसकी तरफ काफी ध्यान नहीं दिया गया था। साथ ही, शास्त्रीय रचनाओं - संस्कृत, बौद्ध एवं जैन ग्रन्थों के मूल पाठों और अशोक के शिलालेखों-जैसे विभिन्न स्रोतों से लिये गए प्रमाणों का संपादन और तुलनात्मक अध्ययन भी यहाँ मौजूद है। भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति के अन्वेषक विद्वानों ने इस पुस्तक को बहुत ऊँचा स्थान दिया है और यह आज तक इतिहास के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और प्राध्यापकों के लिए एक मानक ग्रन्थ के रूप में मान्य है।

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    Radha Kumud Mukherjee

    राधाकुमुद मुखर्जी

    प्रो. मुखर्जी का जन्म बंगाल के एक शिक्षित परिवार में हुआ। प्रेजीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता से इतिहास तथा अंग्रेजी में एम.ए. की डिग्री लेने के बाद उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. की डिग्री प्राप्त की।

    अपने शैक्षिक जीवन की शुरुआत उन्होंने अंग्रेजी के प्रोफेसर के रूप में की, लेकिन कुछ समय बाद ही वे इतिहास में चले गए और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय इतिहास तथा संस्कृति के महाराजा सर मनीन्द्रचंद्र नंदी प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए। इस पर वे केवल एक वर्ष रहे और उसके तुरंत बाद मैसूर विश्वविद्यालय में इतिहास के पहले प्रोफेसर नियुक्त हुए। सन् 1921 में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के इतिहास विभागाध्यक्ष का पदभार ग्रहण किया और मृत्यु-पर्यंत वहीं बने रहे। सन् 1963 में 83 वर्ष की आयु में उनका देहांत हुआ।

    प्रो. राधाकुमुद मुखर्जी आजीवन प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में लगे रहे और उन्होंने प्राचीन भारत के विभिन्न पक्षों पर विस्तृत एवं आलोचनात्मक शोध-निबंध लिखे। अपने अनेक ग्रंथों में उन्होंने निष्कर्षों तक पहुँचने से पहले सभी उपलब्ध स्रोतों और जानकारियों का भरपूर उपयोग किया।

    प्रमुख ग्रंथ: चन्द्रगुप्त मौर्य और उसका काल, अशोक, हर्ष, प्राचीन भारतीय विचार और विभूतियाँ, हिंदू सभ्यता, प्राचीन भारत, अखंड भारत, द गुप्त एंपायर, लोकल सेल्फ गवर्नमेंट इन एंशिएंट इंडिया, द हिस्ट्री ऑफ इंडियन शिपिंग एंड मैरीटाइम एक्टिविटी फ्रॉम द अर्लियस्ट टाइम्स, एंशिएंट इंडियन एजूकेशन, फंडामेंटल यूनिटी ऑफ इंडिया, नेशनलिज्म इन हिंदू कल्चर, ए न्यू एप्रोच टु कम्युनल प्रॉब्लम, नोट्स ऑन अर्ली इंडियन आर्ट, इंडियाज लैंड सिस्टम आदि।

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