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Chak Piran Ka Jassa

Chak Piran Ka Jassa

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  • Pages: 456p
  • Year: 1997
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8171785964
  •  
    हिन्दी के जाने-माने कथाकार बलवंत सिंह के इस बृहद् उपन्यास में विभाजन से कई वर्ष पूर्व के पंजाब की कहानी है । पात्रों के चयन में लेखक ने बहुत ही सजग दृष्टि का परिचय दिया है, और जीवन के केवल उसी क्षेत्र से उनका चुनाव किया है जो उसके प्रत्यक्ष अनुभव की परिधि में आते हैं । मुख्यत: जाट-पात्रों के माध्यम से पंजाब के तत्कालीन जनजीवन का बड़ा ही सजीव चित्र यहाँ प्रस्तुत किया है । उपन्यास का ताना-बाना मुख्य रूप से दो पात्रों के इर्द-गिर्द घूमता है । एक अनाथ लड़का जस्सासिंह है जिसके पालन-पोषण का दायित्व अनिच्छा से रिश्ते के चाचा बग्‍गासिंह को लेना पड़ता है । जब जस्सा जवान हो जाता है तब एक विचित्र समस्या उठ खड़ी होती है । वे दोनों शक्तिशाली है उजड्ड हैं, और एक-दूसरे के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं । दोनों एक-दूसरे से मृणा करते हैं, लेकिन उनके हृदय की गहराइयों में कहीं कोई एक ऐसी सुषुप्त भावना है, जिसे प्रेम तो नहीं, लगाव जरूर कहा जा सकता है । उपन्यास की अपनी एक मौलिक भाषा है जो कथा-क्रम के अनुरूप ढाली गई है । इन दो पात्रों के अतिरिक्त और भी कई पात्र हैं जो उपन्यास की गति को प्रवाहपूर्ण करते हैं । ज्यों-ज्यों उपन्यास का कथा-चक्र आगे बढ़ता है, चाचा-भतीजे की समस्याएँ जटिल होती जाती हैं । उन दोनों की स्थिति न तो मृणा से मुक्त हो जाने की है और न अलगाव को स्वीकारने की । परस्पर-विरोधी भावनाओं के द्वन्द्व का समाधान अंतत: जस्सासिंह ढूँढ़ता है और कथानायक की गौरव-गरिमा प्राप्त करता है । विभिन्न परिस्थितियों के सूक्ष्म मनोविश्लेषण और उपन्यास के जीवंत पात्रों को प्रयासवश भी विस्मृत कर पाना कठिन है । वस्तुत: चकपीरां का जस्सा सशक्त भाषा-शैली में लिखा गया एक प्रभावशाली उपन्यास है!

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    Balwant Singh

    जन्म : 1925,  गुजराँवाला, पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान) ।

    शिक्षा : इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक।

    हिंदी कथा-साहित्य में अकेले ऐसे कृतिकार जिन्होंने पंजाब के ऐतिहासिक काल से लेकर आधुनिक मनोभूमि के विराट चित्र अपनी कृतियों में प्रस्तुत किए हैं। इनकी कितनी ही औपन्यासिक कृतियों को महाकाव्य कहा जा सकता है। जनजीवन के सामाजिक यथार्थ की ऐसी विश्वसनीयता हिंदी साहित्य में प्रायः विरल है। परिवेश ऐतिहासिक हो या समसामयिक - उनकी रचनाओं में संवेदना का तरल प्रवाह विद्यमान है । 12-13 वर्ष की आयु में पहली गद्य रचना । 1964 तक व्यवसाय।

    प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें : रात चोर और चाँद, काले कोस, रावी पार, सूना आसमान, साहिबे-आलम, राका की मंज़िल, चकपीराँ का जस्सा, दो अकालगढ़, एक मामूली लड़की, औरत और आबशार, आग की कलियाँ, बासी फूल (उपन्यास); पहला पत्थर, चिलमन, मेरी प्रिय कहानियाँ, प्रतिनिधि कहानियाँ (कहानियाँ); अमृता प्रीतम (आलोचना)।

    निधन: 27 मई, 1986

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