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Jamuni

Jamuni

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  • Pages: 168p
  • Year: 2010
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126719655
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    जमुनी ‘‘मिथिलेश्वर ग्रामीण परिवेश के सशक्त कथाकार हैं। उनकी लम्बी कहानी जमुनी को कृषक-जीवन की महागाथा कहा जा सकता है, जिसमें एक सामान्य भारतीय कृषक परिवार के प्रेम-घृणा, आस्था-विश्वास, आशा-निराशा, हर्ष-विषाद, सम्पत्ति-विपत्ति और उत्थान-पतन का मार्मिक एवं सजीव चित्र प्रस्तुत किया गया है...। शिल्प का रचाव निश्चय ही कहानी को महत्त्वपूर्ण बना देता है, किन्तु कहीं-कहीं अनायास सादगी ही शिल्प का शृंगार बन जाती है। प्रेमचन्द का कथाशिल्प ऐसा ही था। वर्तमान कथाकारों में मिथिलेश्वर का कथाशिल्प भी इसी प्रकार का है।’’ - डॉ. राकेश गुप्त एवं डॉ. ऋषिकुमार चतुर्वेदी हिन्दी कहानी 1991-95, खण्ड-2 का भूमिकांश शीर्षक कथा जमुनी एक लम्बी कहानी है जिसमें एक कृषक परिवार का संघर्ष जीवन्त हो उठता है और जहाँ अपनी भूख-प्यास और नींद-आराम को दरकिनार करते हुए हर एक की चिन्ता बीमार भैंस को मृत्यु के मुख में जाने से बचाने की है, क्योंकि वह भैंस ही उनकी सुख-समृद्धि का केन्द्र है। जमुनी के अतिरिक्त इस संग्रह की अन्य कहानियाँ भी जीवन और जगत के जरूरी सवालों के जवाब तलाशती अमिट प्रभाव कायम करनेवाली कहानियाँ हैं। निःसन्देह यह कहानी-संग्रह समर्थ कथाशिल्पी मिथिलेश्वर के प्रौढ़ कथा-लेखन की सार्थक यात्रा का द्योतक है। ‘बाबूजी’ के कथाकार ने अपने लेखकीय नैरन्तैर्य और श्रेष्ठ कथा-लेखन के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट मौजूदगी का एहसास कराते हुए हिन्दी कथा-जगत को और अधिक ऊर्जस्वित और विकसित किया है...।

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    Mithileshwar

    मिथिलेश्वर

    जन्म : 31 दिसम्बर, 1950, बैसाडीह, भोजपुर (बिहार)

    शिक्षा : एम.ए., पी-एच.डी. (हिन्दी साहित्य)

    साहित्य-सेवा : कहानी संग्रह-एक और मृत्युन्जय, बाबूजी, बंद रास्तों के बीच, दूसरा महाभारत, मेघना का निर्णय, तिरिया जनम, हरिहर काका, एक में अनेक, एक थे प्रो. बी. लाल, भोर होने से पहले, चल खुसरो घर आपने तथा जमुनी ।उपन्यास- झुनिया, युद्धस्थल, प्रेम न बाडी उपजै, यह अन्त नहीं, सुरंग में सुबह, माटी कहे कुम्हार से ।आत्मकथा -पानी बीच मीन पियासी, कहाँ तक कहें युगों की बात, जाग चेत कुछ करौ उपाई ।लोक साहित्य- भोजपुरी लोककथाएँ।नबसाक्षरोपयोगी- उस रात की बात, बाल-साहित्य-गाँव के लोग, एक था पंकज | विचार साहित्य-साहित्य की  सामयिकता । संचयन-मेरी पहली रचना, संपादन- 'मित्र' अनियतकालीन साहित्यिक पत्रिका । पुरस्कार : अखिल भारतीय मुक्तिबोध पुरस्कार, सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार, यशपाल पुरस्कार, अमृत पुरस्कार, अखिल भारतीय वीर सिह देव पुरस्कार, श्रीलाल शुक्ल इफ्को स्मृति सम्मान से विभूषित ।सम्प्रति-सेवानिवृत्त, प्रोफ़ेसर/लेखन कार्य के लिए पूर्वकालिक |

    सम्पर्क : महराजा हाता, आरा- 802301 (बिहार)

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