• (011) 23274463
  • Help
INR
 
Shopping Cart (0 item)
My Cart

You have no items in your shopping cart.

You're currently on:

Fasadat Ke Afsane

Fasadat Ke Afsane

Availability: In stock

-
+

Regular Price: Rs. 160

Special Price Rs. 144

10%

  • Pages: 294p
  • Year: 2009
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126716722
  •  
    फ़सादात के अफ़साने 1947 से अब तक हमारी राजनीति फ़सादात कराने वाले को पहचानने में, उसे नंगा करने में आगे नहीं आई। कारण ये कि फ़सादात कराना सारे देश की राजनीति के दाँव-पेंच का अंग बन चुका है। राजनीति से जुड़े सारे दल एक दूसरे को इलज़ाम देते रहते हैं लेकिन फ़सादात की जाँच करनेवाले कमीशन कुछ और कहते हैं। इन सबसे अलग फ़सादात का जो चेहरा अपने असली रूप में हमारे सामने आता है वो केवल साहित्यकार, रचनाकार के जरिए ही आता है। लेखक और रचनाकार ही ने फ़सादात के बारे में सच-सच लिखा है। उसी ने फ़सादात के मुजरिम को पहचाना है। दुख झेलनेवाले के दुख को समझा है। इस संग्रह में कुछ अफ़साने तो वो हैं जो बँटवारे के फ़ौरन बाद होनेवाले साम्प्रदायिक दंगों पर लिखे गए और कुछ वो हैं जो बाबरी मस्जिद के गिराए जाने से पहले और उसके बाद होनेवाले फ़सादात पर लिखे गए। इसमें कई अफ़साना-निग़ार ऐसे भी हैं जो खुश्द इस तूफ़ान से गुज़रे थे। फ़सादात के कारण बदलते रहे और साथ ही उनके बारे में लेखक का रवैया भी बदलता रहा, फ़सादात का अधिकतर शिकार बननेवाला समुदाय लेखक की सारी सहानुभूति समेटने लगा। वे राजनैतिक दल भी पहचान लिए गए जो फ़सादात की आग लगाते रहते हैं। पहले के अफश्सानों में हिन्दू मुसलमान की और मुसलमान हिन्दू की जानो-माल की हिफ़ाजत करते हैं लेकिन बाद के फ़सादात में लेखक ने ये महसूस किया कि फ़सादात जब भी भड़कते हैं तो हिन्दू-मुसलमान के मेल-जोल में एक फ़ासला-सा आ जाता है। इस ट्रेजिडी की गूँज ‘नींव की ईंट’, ‘सिंघारदान’, ‘जिन्दा दरगोर’ जैसे अफ़सानों में सुनाई देती है। फ़सादात ने हमारे जीवन और सायकी में एक मुस्तक़िल दहशत और लूटे जाने का खौफ़ और भय पैदा कर दिया है। इस भय, डर और खौश्फश् की सायकी को ‘बग़ैर आसमान की ज़मीन’, ‘आदमी’ और ‘खौफ़’ जैसे अफ़सानों में महसूस किया जा सकता है।

    Customer Reviews

    There are no customer reviews yet.

    Write Your Own Review

    Zubair Razvi

    1936 में अमरोहा के एक मुमताजश् दीनी घराने में पैदा हुए। शुरुआती शिक्षा अमरोहा और हैदराबाद, दकन में। एम.ए. दिल्ली वि.वि. से।

    ऑल इंडिया रेडियो में एक विख्यात ब्राडकॉस्टर की छवि बनाते हुए बतौर डायरेक्टर सेवानिवृत्त हुए। दो साल उर्दू अकेडमी दिल्ली के सचिव रहे। केन्द्र सरकार की एक सीनियर फेलोशिप के तहत ‘उर्दू का रिश्ता हिन्दुस्तानी फ़नूने-लतीफा से’ विषय पर काम किया। इसके अलावा हिन्दुस्तानी ललित कलाओं पर ग़ालिब के प्रभाव पर भी उन्होंने महत्‍वपूर्ण काम किया है जो किताब के रूप में प्रकाशित है। टीपू सुल्तान और कुली कुतुबशाह पर उनके ओपेरा कई बार मंचित हुए। ज़बैर रज़वी की गिनती उर्दू के मशहूर शायरों में होती है।

    1991 से आप त्रैमासिक ‘ज़हने-जदीद’ नियमित रूप से संपादित कर रहे हैं। शायर, ब्राडकॉस्टर और पत्रकार ज़ुबैर रज़वी की संस्मरणात्मक पुस्तक ‘गर्दिशे-पा’ की खासी प्रशंसा हुई है। ‘गर्दिशे-पा’ जुबैर रज़वी के उत्कृष्ट गद्य का नमूना है। उनके लेखों की एक पुस्तक ‘उर्दू-फ़ुनून और अदब’ हाल ही में प्रकाशित हुई है।

    वह 1952 से दिल्ली में रह रहे हैं।

    loading...
      • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Funda An Imprint of Radhakrishna
      • Korak An Imprint of Radhakrishna
    Location

    Address:1-B, Netaji Subhash Marg,
    Daryaganj, New Delhi-02

    Mail to: info@rajkamalprakashan.com

    Phone: +91 11 2327 4463/2328 8769

    Fax: +91 11 2327 8144