• (011) 23274463
  • Help
INR
 
Shopping Cart (0 item)
My Cart

You have no items in your shopping cart.

You're currently on:

Boli Baat

Boli Baat

Availability: In stock

-
+

Regular Price: Rs. 150

Special Price Rs. 135

10%

  • Pages: 118p
  • Year: 2007
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126713232
  •  
    ‘बोली बात’ युवा कवि श्रीप्रकाश शुक्ल का दूसरा काव्य-संकलन है जिसमें कवि ने न सिर्फ अपनी विकास यात्रा को रेखांकित किया है, बल्कि समाज और उसके जन-जीवन के प्रति अपनी सरोकारों को और भी गहरे ढंग से जताया है। संग्रह में शामिल ‘गाजीपुर’ कविता की ये पंक्तियाँ स्पष्ट रूप से बताती हैं कि कवि अपने आसपास को कितनी संवेदनशीलता के साथ ग्रहण कर रहा है: ‘‘यह एक ऐसा शहर है / जहाँ लोग धीरे-धीरे रहते हैं / और धीरे-धीरे रहने लगते हैं / यहाँ आनेवाला हर व्यक्ति कुछ सहमा-सहमा रहता है / कुछ-कुछ अलग-अलग रहता है / जैसे उमस-भरी गर्मी में दूसरे का स्पर्श / लेकिन धीरे-धीरे ससुराल गई महिला की तरह / जीना सीख लेता है।’’ कवि का पहला संकलन कुछ वर्ष पहले आया था, जिसका नाम था - ‘जहाँ सब शहर नहीं होता’। ‘बोली बात’ पिछले संग्रह के नाम से ध्वनित होने वाली भाव-भूमि और दृष्टि-भंगिमा का ही अगला सोपान है यह कहा जा सकता है। एक नए कवि का दूसरा संग्रह एक तरह से उसके विकास की कसौटी भी होता है और इस संग्रह की कविताओं को देखते हुए यह आश्वस्तिपूर्वक कहा जा सकता है कि इस संग्रह में काफी कुछ ऐसा है जो कवि के रचनात्मक विकास की ओर ध्यान आकृष्ट करता है और कहें तो प्रमाणित भी। ‘प्रभु से प्रार्थना’ कविता का प्रस्तुत अंश आस्था की संरचना पर सवाल उठाते हुए मनुष्य की इयत्ता पर जोर देता है: ‘‘हजार वर्षों के तुम्हारे इतिहास में प्रभु / हमारे हाथ सिर्फ तुम्हारी पूजा में उठे हैं / हमारी करुणा सिर्फ तुम्हारे भय के आश्रित रही है / तुम्हारे रंध्रों में सिर्फ और सिर्फ / या तो दूध व गंगाजल उतरता रहा है / या फिर तुम्हारे मिट्टी के बने पुतलों का खून।’’ इस पूरे संग्रह को एक साथ पढ़ा जाए तो इसकी एक-एक कविता के भीतर से एक ऐसी दुनिया उभरती हुई दिखाई पड़ेगी, जिसे समकालीन विमर्श की भाषा में ‘सबाल्टर्न’ कहा जाता है। संग्रह की पहली कविता हड़परौली - इसका सबसे स्पष्ट और मूर्त्त उदाहरण है। इस प्रवृत्ति को सूचित करनेवाली एक साथ इतनी कविताएँ यहाँ मिल सकती हैं, जो कई बार एक पाठक को रोकती-टोकती-सी लगें। पर एक अच्छी बात यह है कि इसी के चलते अनेक नए देशज शब्द भी यहाँ मिलेंगे, जिन्हें पहली बार कविता की दुनिया की नागरिकता दी गई है। कुल मिलाकर यह एक ऐसा संग्रह है जो अपने खाँटी देसीपन के कारण अलग से पहचाना जाएगा।

    Customer Reviews

    There are no customer reviews yet.

    Write Your Own Review

    Shriprakash Shukla

    जन्म : 18 मई, 1965, बरवाँ, सोनभद्र (उत्तर प्रदेश)।

    शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी), पी-एच.डी. (हिन्दी) (इलाहाबाद विश्वविद्यालय)।

    प्रकाशित कृतियाँ  :

    कविता-संग्रह : अपनी तरह के लोग, जहाँ सब शहर नहीं होता, बोली बात, रेत में आकृतियाँ।

    आलोचना : साठोत्तरी हिन्दी कविता में लोक-सौन्दर्य, नामवर की धरती।

    सम्पादन : साहित्यिक पत्रिका 'परिचय’ का प्रकाशन / सम्पादन।

    पुरस्कार : रेत में आकृतियाँ पर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का नरेश मेहता कविता पुरस्कार, बोली बात पर वर्तमान साहित्य का मलखान सिंह सिसोदिया पुरस्कार, परिचय पत्रिका सम्पादन हेतु उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का सर्जना पुरस्कार।

    सम्प्रति : प्रोफेसर हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी-221005

    सम्पर्क : सुमेधस, 909, काशीपुरम कालोनी, सीरगोवर्धन, पोस्ट डाफी, वाराणसी-221011

    मो. : 09415890513

    email : shriprakashshuklabhu@gmail.com

    loading...
      • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Funda An Imprint of Radhakrishna
      • Korak An Imprint of Radhakrishna
    Location

    Address:1-B, Netaji Subhash Marg,
    Daryaganj, New Delhi-02

    Mail to: info@rajkamalprakashan.com

    Phone: +91 11 2327 4463/2328 8769

    Fax: +91 11 2327 8144