साहिर लुधियानवी का मूल नाम अब्दुल हई है। उनका जन्म 8 मार्च, 1928 को लुधियाना में हुआ। विद्यार्थी जीवन में साहिर को अमृता प्रीतम से प्रेम हो गया था, हालांकि उनका प्रेम असफल रहा। साहिर के बारे अमृता ने अपनी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' में लिखा है-


"वो चुपचाप मेरे कमरे में सिगरेट पिया करता. आधी पीने के बाद सिगरेट बुझा देता और नई सिगरेट सुलगा लेता. जब वो जाता तो कमरे में उसकी पी हुई सिगरेटों की महक बची रहती. मैं उन सिगरेट के बटों को संभाल कर रखतीं और अकेले में उन बटों को दोबारा सुलगाती. जब मैं उन्हें अपनी उंगलियों में पकड़ती तो मुझे लगता कि मैं साहिर के हाथों को छू रही हूँ. इस तरह मुझे सिगरेट पीने की लत लगी."


कैफ़ी आज़मी के लिए साहिर कुछ यूँ थे-


"साढ़े पाँच फ़ुट का क़द, जो किसी तरह सीधा किया जा सके तो छह फ़ुट का हो जाए, लंबी लंबी लचकीली टाँगें, पतली सी कमर, चौड़ा सीना, चेहरे पर चेचक के दाग़, सरकश नाक, ख़ूबसूरत आँखें, आंखों से झींपा –झींपा सा तफ़क्कुर, बड़े बड़े बाल, जिस्म पर क़मीज़, मुड़ी हुई पतलून और हाथ में सिगरेट का टिन."


साहिर कॉलेज के दिनों में ही शेर कहने के लिए पहचाने जाने लगे थे।


Photo Credit : Uma Trilok


उनका पहला संग्रह 'तल्खियाँ'  1944 में आया।


साहिर ने जब लिखना शुरू किया तब इकबाल, फैज़, फिराक आदि शायर अपनी बुलन्दी पर थे, पर उन्होंने अपना जो विशेष लहज़ा और रुख अपनाया, उससे न सिर्फ उन्होंने अपनी अलग जगह बना ली बल्कि वे भी शायरी की दुनिया पर छा गए।


साहिर की बहुत लोकप्रियता थी और वे अपने गीत के लिए लता मंगेशकर को मिलनेवाले पारिश्रमिक से एक रुपया अधिक लेते थे। इसके साथ ही 'ऑल इंडिया रेडियो' पर होनेवाली घोषणाओं में गीतकारों का नाम भी दिए जाने की माँग साहिर ने की, जिसे पूरा किया गया। इससे पहले किसी गाने की सफलता का पूरा श्रेय संगीतकार और गायक को ही मिलता था।


उनकी प्रमुख प्रकाशित रचनाएँ हैं : 'परछाइयाँ' (1955), 'गाता जाए बंजारा' (1967 या 1968, फिल्मी गीत), 'आओ कि कोई ख्वाब बुनें' (1971)

सम्पादन : 'अदब-ए-लतीफ', 'शाहकार' और 'सवेरा'।
वे 'प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन' से भी जुड़े रहे।
पुरस्कार : पद्मश्री (1971), सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड (1971), महाराष्ट्र स्टेट अवार्ड (1971), सर्वश्रेष्ठ गीतकार के रूप में 'फिल्म फेयर अवार्ड'।



साहिर ने विवाह नहीं किया। उनकी ज़िन्दगी बेहद तन्हा रही। पहले अमृता प्रीतम के साथ प्यार की असफलता और इसके बाद गायिका और अभिनेत्री सुधा मल्होत्रा के साथ भी एक असफल प्रेम से ज़मीन पर सितारों को बिछाने की हसरत अधूरी रह गई।


25 अक्टूबर, 1980 को दिल का दौरा पड़ने से साहिर लुधियानवी का निधन हो गया।


 

पढ़िए उनकी कुछ लोकप्रिय रचनाएँ :

 

1. आओ कि कोई ख़्वाब बुनें

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें

गो हम से भागती रही ये तेज़-गाम उम्र
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र

ज़ुल्फ़ों के ख़्वाब, होंठों के ख़्वाब, और बदन के ख़्वाब
मैराज-ए-फ़न के ख़्वाब, कमाल-ए-सुख़न के ख़्वाब
तहज़ीब-ए-ज़िन्दगी के, फुरोग़-ए-वतन के ख़्वाब
ज़िन्दाँ के ख़्वाब, कूचा-ए-दार-ओ-रसन के ख़्वाब

ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल की असास थे
ये ख़्वाब मर गये हैं तो बेरंग है हयात
यूँ है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-संग है हयात

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें

 

2. गांधी हो या ग़ालिब

गांधी हो या ग़ालिब हो
खत्म हुआ दोनो का जश्न
आओ इन्हें अब कर दें दफ़्न

खत्म करो तहज़ीब की बात

बंद करो कल्चर का शोर

सत्य, अहिंसा सब बकवास

हम भी क़ातिल तुम भी चोर

खत्म हुआ दोनो का जश्न
आओ, इन्हें अब कर दें दफ़्न

वो बस्ती वो गांव ही क्या

जिसमें हरिजन हों आज़ाद
वो कस्बा वो शहर ही क्या

जो ना बना अहमदाबाद?

खत्म हुआ दोनो का जश्न
आओ, इन्हें अब कर दें दफ़्न

गांधी हो या ग़ालिब हो

दोनों का क्या काम यहां
अबके बरस भी क़त्ल हुई़

एक की शिक्षा, एक की ज़बां

खत्म हुआ दोनो का जश्न
आओ, इन्हें अब कर दें दफ़्न

 

3. किसी को उदास देख कर

तुम्हें उदास सी पाता हूँ मैं कई दिन से
न जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम
वो शोख़ियाँ, वो तबस्सुम, वो कहकहे न रहे
हर एक चीज़ को हसरत से देखती हो तुम
छुपा छुपा के ख़मोशी में अपनी बेचैनी
ख़ुद अपने राज़ की तशहीर बन गई हो तुम

मेरी उम्मीद अगर मिट गई तो मिटने दो
उम्मीद क्या है बस एक पेशोपस है कुछ भी नहीं
मेरी हयात की ग़मगीनियों का ग़म न करो
ग़मे हयात-ग़मे यक नफ़स है कुछ भी नहीं
तुम अपने हुस्न की रानाइओं पे रहम करो
वफ़ा फ़रेब है तूले हवस है कुछ भी नहीं

मुझे तुम्हारे तग़ाफ़ुल से क्यूं शिकायत हो
मेरी फ़ना मेरे एहसास का तक़ाज़ा है
मैं जानता हूँ के दुनिया का ख़ौफ़ है तुमको
मुझे ख़बर है ये दुनिया अजीब दुनिया है
यहाँ हयात के पर्दे में मौत चलती है
शिकस्त साज़ की आवाज़ रूहे नग़्मा है

मुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहीं
मेरे ख़याल की दुनिया में मेरे पास हो तुम
ये तुमने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूँ
मगर मुझे ये बता दो कि क्यूँ उदास हो तुम
ख़फ़ा न होना मेरी जुर्रत-ए-तख़ातब पर
तुम्हें ख़बर है मेरी ज़िंदगी की आस हो तुम

मेरा तो कुछ भी नहीं है मैं रो के जी लूँगा
मगर ख़ुदा के लिए तुम असीर-ए-ग़म न रहो
हुआ ही क्या जो ज़माने ने तुमको छीन लिया
यहाँ पे कौन हुआ है किसी का सोचो तो
मुझे क़सम है मेरी दुख भरी जवानी की
मैं ख़ुश हूँ मेरी मोहब्बत के फूल ठुकरा दो

मैं अपनी रूह की हर इक ख़ुशी मिटा लूँगा
मगर तुम्हारी मसर्रत मिटा नहीं सकता
मैं ख़ुद को मौत के हाथों में सौंप सकता हूँ
मगर ये बार-ए-मसाइब उठा नहीं सकता
तुम्हारे ग़म के सिवा और भी तो ग़म हैं मुझे
निजात जिनसे मैं एक लमहा पा नहीं सकता

ये ऊँचे ऊँचे मकानों की ड्योढियों के तले
हर एक गाम पे भूके भिकारियों की सदा
हर एक घर में ये इफ़्लास और भूक का शोर
हर एक सिम्त ये इन्सानियत की आह-ओ-बुका
ये कारख़ानों में लोहे का शोर-ओ-गुल जिसमें
है दफ़्न लाखों ग़रीबों की रूह का नग़्मा


ये शाहराहों पे रंगीन साडियों की झलक
ये झोंपड़ियों में ग़रीबों की बेकफ़न लाशें
ये माल रोड पे कारों की रेल पेल का शोर
ये पटरियों पे ग़रीबों के ज़र्दरू बच्चे
गली गली में ये बिकते हुए जवाँ चेहरे
हसीन आँखों में अफ़्सुर्दगी सी छाई हुई

ये जंग और ये मेरे वतन के शोख़ जवाँ
खरीदी जाती हैं उठती जवानियाँ जिनकी
ये बात बात पे कानूनो जाब्ते की गिरफ़्त
ये जिल्‍लतें ये ग़ुलामी ये दौर-ए-मजबूरी
ये ग़म बहुत हैं मेरी ज़िंदगी मिटाने को
उदास रह के मेरे दिल को और रंज न दो


* * *


ये रचनाएँ साहिर लुधियानवी की रचनाओं के संग्रह 'साहिर समग्र' से ली गई हैं।

'साहिर समग्र' : http://rajkamalprakashan.com/default/sahir-samagra-4965