हाल ही में राजकमल प्रकाशन से छपकर आई किशोर साहू की आत्मकथा पर जयप्रकाश चौकसे ने कुछ समय पहले यह लिखा था, पढ़िए।


मेरी आत्मकथा : किशोर साहू - https://goo.gl/Fb3T2F



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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह की पहल और प्रयास से फिल्मकार किशोर साहू की 41 वर्ष पूर्व लिखी आत्मकथा का प्रकाशन संभव हो पाया और राजकमल प्रकाशन ने अपनी परम्परा के अनुरूप गरिमापूर्ण कार्य किया है। कथा फिल्मों के प्रारंभिक दौर की कार्यप्रणाली पर प्रकाश डालने वाली यह किताब एक तरह से उस दौर का 'क्लोजअप' प्रस्तुत करती है, जिसे लॉन्ग या मिड शॉट में हम उद्योग के इतिहास की किताबो में देख चुक हैं जैसे कि मनमोहन चड्‌ढा की बार्नी या बीडी गर्ग की किताबों में। स्वयं किशोर साहू ने अपनी आत्मकथा के प्रकाशन हेतु राजेन्द्र यादव से मुलाकात की थी परंतु किताब का उनका आकल्पन भव्य फिल्म की तरह था और प्रकाशन संस्था के साधन सीमित थे। फिल्म से जुड़े व्यक्ति की विचार प्रक्रिया पूरी तरह फिल्ममय हो जाती है। लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती व्यक्ति के लिए वे कहते हैं कि 'क्लाइमैक्स' लंबा खिंच रहा है या कम उम्र में मृत्यु होने पर यह करना कि मुहूर्त शानदार था परंतु फिल्म अधूरी ही रह गई।

बहरहाल, जीवनी पढ़कर लगता है कि किशोर साहू की विचार प्रक्रिया और जीवन का घटनाक्रम उनके महज खूबसूरत होने के इत्तफाक के गिर्द घूमता है परंतु यह बात उनकी बहुमुखी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं करती और अगर किसी एक घटक को ही केंद्रीय विचार के रूप में प्रस्तुत करना था, तो वह है उनका कल्पनाशील लेखक होना गोयाकि फिल्म की रहस्यमय गुफा का द्वार उनके लेखक होेने के कारण खुला और आज उनकी मृत्यु के सैंतीस वर्ष पश्चात भी वे लिखने के कारण ही याद किए जा रहे हैं। उनकी आत्मकथा पढ़कर युवा वर्ग को प्रेरणा मिलेगी। अनेक युवा उनकी फिल्मों को देखना चाहेंगे। उनकी निर्देशित 'दिल अपना और प्रीत पराई' में एक गीत है 'अजीब दास्तां है ये, कहां शुरू, कहां खतम, ये मंजिलें हैं कौन-सी, न वे समझ सकें न हम।' किशोर साहू का जीवन भी इसी गीत की तरह छत्तीसगढ़ के छोटे शहर दुर्ग में शुरू होता है और उनकी मृत्यु बैंकॉक के एयरपोर्ट पर 22 अगस्त 1980 को हुई।

किशोर साहू ने 'दिल अपना और प्रीत पराई' निर्माता कमाल अमरोही के लिए बनाई थी। शूटिंग पूरी होेने के बाद निर्माता कमाल अमरोही फिल्म में अनेक परिवर्तन करना चाहते थे परंतु किशोर साहू इसके पक्ष में नहीं थे। इस विवाद को के. आसिफ ने सुलझाया परंतु फिल्म से असंतुष्ट कमाल अमरोही ने प्रचार सामग्री में अपने सचिव बाकर को निर्माता बताया। फिल्म के सफल होते ही नई प्रचार सामग्री बनाई गई, क्योंकि कमाल अमरोही अपना नाम बतौर निर्माता देना चाहते थे। फिल्म उद्योग में बॉक्स ऑफिस सफलता सारे जीवन मूल्यों को बदल देती है परंतु किशोर साहू किसी भी शर्त पर अपने जीवन मूल्य से समझौता नहीं करते थे। इसे उनकी सनक या जिद नहीं वरन् आत्मविश्वास कहना होगा।

किताब में सविस्तार विवरण है कि कैसे किशोर साहू ने एक बार अपनी पत्नी से मिलने विपरीत परिस्थितियों में एक खतरनाक पहाड़ी यात्रा की थी। यह प्रकरण कुछ हद तक संत कवि तुलसीदास के अनुभव के समान है, जब सांप को रस्सी समझकर, उसके सहारे युवा तुलसीदास अपनी पत्नी रत्नावली से मिलने पहुंचे। यहां किशोर साहू और तुलसीदास की तुलना नहीं की जा रही है वरन यह कहने का प्रयास है कि सृजनशील लोग भावना की लहर पर सवार होकर भवसागर पार करते हैं।

प्राय: यह माना जाता है कि हर सफल व्यक्ति के पीछे एक स्त्री की प्रेरणा होती है। किशोर साहू के पीछे,आगे,दाएं और बाएं दसों दिशाओं में इसी तरह का विवरण है। किशोर साहू की अंतरंगता देविका रानी से लेकर माला सिन्हा तक रही गोयाकि उन्होंने कई दशकों की प्रतिनिधि नायिकाओं के साथ काम किया। प्रेमल हृदय किशोर साहू ताउम्र आकंठ प्रेम में लीन रहे। उनकी बनाई 'हेमलेट' के एक दृश्य में दुविधाग्रस्त हेमलेट अपने सुरक्षाकर्मियों की निरंतर मौजूदगी से व्यथित होकर उन्हें डांटता है तो एक सुरक्षाकर्मी कहता है, 'हमारा फर्ज़ है कि आपकी रक्षा करें और आपको आवारा लड़कियों की नज़रों से बचाए।' हेमलेट कहता है, 'क्या मैं कब्र में चला जाऊं?' गोयाकि संपूर्ण हिफाजत और चैन कब्र में ही मिलता है। एक शायर फरमा गए हैं कि कब्र में भी चैन नहीं आए तो कहां जाएं? संभवत: किशोर साहू की सदैव बेचैन रहने वाली आत्मा को इस किताब के प्रकाशन से चैन मिलेगा। इस दृष्टि से देखें तो ह छत्तीसगढ़ सरकार के अनुग्रही हैं। इसके प्रकाशन में डॉ.रमन सिंह को अपने संस्कृति सचिव संजीव बख्शी से यथेष्ठ सहायता मिली। काश! सभी प्रांतीय सरकारें अपने प्रदेश में जन्मे सृजनशील लोगों का स्मरण करें। प्रगति का यह महत्वपूर्ण सोपान माना जाना चाहिए। केवल सड़कें और इमारतें बनाने से विकास नहीं होता।