"अनुगूँज, माई, हमारा शहर उस बरस, तिरोहित, वैराग्य एवं ख़ाली जगह जैसी विविध व सशक्त कृतियों की मार्फ़त गीतांजलि श्री की हिन्दी कथा-जगत में एक विशिष्ट पहचान बनी है। अनुगूँज में संकलित दस कहानियों से ही शुरू हुआ था इस पहचान का सिलसिला। एक नई संवेदना जो विद्रोह और प्रतिरोध को उजागर करते वक्त भी उनको कमज़ोर बनाती हताशा को अनदेखा नहीं करती, इशारों और बिम्बों के सहारे चित्रण करने वाला शिल्प, और शिक्षित वर्ग की आधुनिक मानसिकता को दिखाती उनकी बोलचाल की भाषा, ऐसे तत्त्वों से बनती है गीतांजलि श्री की लेखकीय पहचान। यूँ तो इन कहानियों का केन्द्र लगभग हर बार- एक ‘दरार’ को छोड़कर, बनता है शिक्षित मध्यमवर्गीय नारियों से, पर इनमें वर्णित होते हैं हमारे आधुनिक नागरिक जीवन के विभिन्न पक्ष। जैसे वैवाहिक तथा विवाहेतर स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, पारिवारिक परिस्थितियाँ, सामाजिक रूढ़ियाँ, हिन्दू-मुस्लिम समस्या, स्त्रियों की पारस्परिक मैत्री इत्यादि। यहाँ सीधा, सपाट कुछ भी नहीं है। हर स्थिति, हर सम्बन्ध, हर संघर्ष में व्याप्त रहते हैं परस्पर विरोधी स्वर। यही विरोधी स्वर रचते हैं हरेक कहानी का एक अलग राग।"

पढ़िए गीतांजलि श्री के संग्रह अनुगूँज से यह कहानी कसक।


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Geetanjali shree


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कभी सोचो तो अजीब लगता है कि हम दोनों इतने घनिष्ठ मित्र थे, क्योंकि कहीं हमारी भावनाओं में एक-दूसरे के प्रति प्यार के साथ-साथ जुगुप्सा का अंश भी था। पर फिर सोचो तो आश्चर्य नहीं होता, क्योंकि दोस्ती का केवल प्रशंसा-भाव से ओत-प्रोत होना कोई ज़रूरी नहीं। और जुगुप्सा थी तो कहीं पर रश्क भी तो था। सच, कम से कम मुझे उससे बात-बात पर रश्क हो आता था और आज तक होता है।


मान लो वह आज मुझसे मिलती तो क्या हम मित्र बन पाते? शायद नहीं। वह मेरी चुप्पी से पल-भर में ऊबकर मुँह फेर लेती और हो-हल्लड़ में जुट जाती, मैं उसके रंगीले ठहाकों पर चिढ़कर ‘इन ऐश-परस्तों’ पर दो-टूक फैसला सुना देती और अपने मकसद-भरे कार्यों में रत हो जाती।


पर बचपन की उदारता दूसरी होती है। उसमें हर फ़र्क के बावजूद, हर ‘कॉम्प्लेक्स’ के बावजूद कुछ ऐसे धागे होते हैं कि यह कहूँ कि किसी को भी किसी से जोड़ सकते हैं, तो लेश-मात्र की अतिशयोक्ति होगी। आपस की हर दूरी, अन्दर की सारी हीनभावनाओं से बढ़कर एक ‘कल’ जो होता है- दूर-दूर तक फैला, वह ‘कल’ जब हम बड़े हो जाएँगे। यह हम सब को जोड़ देता है। उस ‘कल’ में अपार शक्ति है। कल होने तो दो, हर चीज़ मुमकिन हो जाएगी, हर हिम्मत खुल जाएगी। मैं ही थी, स्कूल की और लड़कियों को भरतनाट्यम् सीखते देखकर मेरी बाल्य आँखें किस उत्कंठा से उनकी एक-एक अदा पर फिसलती थीं। पर कभी भी तो मन हताशा से सुन्न नहीं हुआ। हमेशा ख़्वाब डुलाती रही कि एक दिन बस बड़ी हो जाने दो तो देखना- कहीं बर्फ़ीली पहाड़ी पर, अपने पोलियोवाले हाथ को ढीले से आस्तीन में छिपाए परियों की तरह क्या खूब आइस स्केटिंग करूँगी, हवा के झोंके की तरह इधर से उधर, लौ की तरह लहराती हुई, इन सबकी तेज़ी से आगे...।


पर उन ख़्वाबों के दिन लद गए। अब इस बाँह को लेकर सोचने को कुछ बाकी नहीं है, इसलिए उस पर सोचती ही कब हूँ ?
अजीब है, ख़्वाबों के लदने की बात कर रही हूँ, जबकि मेरी उस दोस्त के ही दिन...।
वह दोस्त, जो मेरी बचपन की सहेली है। उस बचपन की जिसने मेरे घुन्नेपन और उसकी चपल बहिरंगता को लेकर हमें किसी किस्म की असंगति के एहसास से पीड़ित नहीं होने दिया। कितने अच्छे मित्र बन गए हम- वह खिलाड़ई, मैं पढ़ाकू, वह बिगाड़ई, मैं सँभालू !


होस्टल के अपने कमरे में कभी लौटती और पाती कि ताली-लगे दरवाजे के बीच में फँसा पर्दा फहरा रहा है या अन्दर मेज़ पर स्याही की दवात उलटी पड़ी कागज़-पत्तर को नीला किए जा रही है, या ट्रांजिस्टर ही पूरे ज़ोर-शोर से सूनी दीवारों को गाना सुना रहा है तो समझ जाती कि आ गईं मैडम, छुट्टियों के बाद, घर से !
पर वह तो कॉलेज का होस्टल था। उसके पहले तो हम स्कूल में भी साथ थे। तब मुझे उसके जीवन से कितना रश्क होता था- हा-हा, हू-हू करते भाई-बहन, जिनके संग वह तैरने जाती थी, घुड़सवारी करने जाती थी, और पहाड़ों पर ‘ट्रैक’ करने जाती थी।


उन दिनों वह अक्सर मुझे अपनी साइकिल पर बिठाकर घुमाने ले जाती थी। हम लोग कैंटूनमैंट के इलाके में- जो बढ़ती लड़कियों के लिए सुरक्षित स्थान माना जाता था- पिकनिक मनाते। किसी छोटी-सी बात पर हँसते चले गए थे एक दिन। हाँ, याद आ रहा है, एक कॉलोनी में फँस गए थे। सड़क गोलाकार थी। एक जगह पर दायाँ मोड़ था जिस पर आकर गोल सड़क से हट सकते थे, किन्तु उसी मोड़ पर ढलान था बाईं ओर, यानी वापस गोल सड़क पर। अब दोस्त हैं कि ज़िद्दिया गईं कि साइकिल से बिना उतरे एक जोरदार मोड़ दूँगी और हम दाईं तरफ़ निकल जाएँगे। पहली दो-एक बार हवा ने हमारे संग दगा किया। फिर हमने हँसना शुरू किया, मोड़ आता तो हँसी रोकते, हँसी रोकते तो कमज़ोरी आती, और कमज़ोर पड़ते तो फिर वही बाईं तरफ़ ढुलक आते ! और अगली कोशिश के लिए राउंड मार रहे हैं !


एक था हँसना। दूसरा था फ़लसफा झाड़ना। बचपन की प्रगाढ़ता से भरपूर। जीवन के मर्म की बातें, हमारी निजी कवायदों की बातें, घंटों बहस चलती, जिसका सार निकलता- क्या फ़र्क पड़ता है, हाऊ डज़ इट मैटर।
‘हाऊ डज़ इट मैटर !’ यही उसका तकिया-कलाम था, जो वक्त के साथ नई अनुभूतियों से भरता चला गया, हर उम्र का अपना असर सोखता चला गया। अन्त तक।
अन्त तक ? न जाने किस झोंक में यह लिख गई मैं। अन्त तक का मुझे पता ही कहाँ। इतने बरस मुलाकात ही कहाँ हुई ?
कोई पूछ बैठेगा, मुलाकात ही नहीं हुई तो दोस्त कैसे ? जवाब सीधा-सादा है कि दोस्त थे तभी तो मुलाकात नहीं हुई। वह तो अपनी है ही, जब होगा मिल लेंगे। इसी ‘अपनापे’ के दौर में वर्ष बीत गए। हमने ताज्जुब भी नहीं किया, बल्कि गौर ही नहीं किया कि मिले नहीं। होस्टल में ही, तीसरे वर्ष में जब हम दोनों को सिंगल रूम मिल गए थे तो कभी हफ़्ता-दो हफ़्ता नहीं मिलते थे। उसके अपने क्लास, मेरे अपने। हाज़री भी अलग-अलग वक्त दे आते। यह इत्मीनान जो था कि दस कमरे अलग दोस्त है, इच्छा होते ही मिल सकते हैं।
उम्र बढ़ने के साथ दस कमरे दस शहरों में बदल गए। पर इत्मीनान वही रहा।


यही वजह थी कि हम बरसों न मिलते। यों ही कभी लम्बा-सा पोथा आ जाता। या दो लाइन पोस्टकार्ड पर। या ख़ुद ही पहुँच लेते। इसी तरह मिलते- बिछड़ते दोस्ती चलती रहती।
अगर...यह ख़त...जो उसके पति ने लिखा...न आया होता...।
कहना चाहती हूँ वह अचानक धमक पड़ेगी। पर कहीं इस निहायत घिसे- पिटे ख़याल का कौंधना मन को बेतरह सालने लगता है।
पर वह ऐसे ही तो धमक पड़ती थी। अचानक। बिन बताए। या ऐसे बताकर कि न बताती तो ही ख़ैर थी !


एक बार एक तार मिला था- ‘रीचिंग सिक्स्टींथ रिसीव स्टेशन।’ तब मैं इस शहर में आई ही थी। पर तार भी तो ऐसा था कि उसका नाम न होता तो भी मैं समझ लेती कि यह काबलियत किसमें है। लेकिन दोस्ती का अपना तकाज़ा है, क्या-क्या नहीं माफ़ उसमें। बस, पहुँच लिए हम स्टेशन। करीब दस घंटों की अवधि और छह गाड़ियाँ, जिनमें से किसी एक में वह आ सकती थी। अब हम हैं और स्टेशन की भीड़-भाड़ है और अपनी बेवकूफ़ी का निरन्तन चुभता एहसास। बैठे हुए हैं एक बेंच पर किसी किताब के पन्ने उलटते-उलटते ? पल-पल चौकन्नी निगाहें उठाकर किसी की व्यंग्यभरी मुस्कान को पकड़कर अपनी गौरवान्वित नज़रों से भस्म करने। गाड़ी आई, आगे-पीछे दौड़ गए, दोस्त नदारद। अगली गाड़ी के प्लेटफ़ॉर्म पर बेंच ढूँढ़ते पहुँच गए, मानो अभी-अभी स्टेशन पहुँचे हैं, जीवन में पहली बार। फिर भी जो सामने पड़े उसी की शक्ल जानी-पहचानी लगे और सीता-सा अन्त पाने को तरस उठें। मन को आश्वासन देते, आँखों ने धोखा खाया है, ज़रूर देखनेवाला चढ़ने आया है या उतरा है और एक बार नज़र मिलाकर चला जाएगा। और मान लें हमारी तरह वह भी लल्लू है, बार-बार यहीं चक्कर काट रहा है, तो फिर भई उससे शर्म क्या ? वही गम्भीर मुद्रा में बैठे रहे, गाड़ी आई, हरकत हुई फिर बैठ गए...। वही किस्सा, दोस्त नदारद। रात के ग्यारह बजे आखि़री गाड़ी छान मारी, फिर उसे लाख-लाख गालियाँ देते गुस्से से कार का ‘एक्सेलेटर’ दबाते घर लौटे...।


तो वहाँ ताले को गुस्से से ताकते हुए मैडम खड़ी थीं !
‘‘यह क्या तरीका है ?’’ हम फौरन लड़ पड़े।
लड़ तो हम आज भी पड़ते। यह क्या तरीका है ? पर यही लगने लगता है कि लडँ़ई किससे ? बेहद गुस्सा आता है। कहना तो चाहती हूँ, यह क्या तरीका है पर सोचती हूँ, कहूँ किससे ?
कहती भी क्या ? वही अपना कोई निर्णय सुना देती- शर्म की बात है
कि...कि...
वह लड़ पड़ती। शुरू से मेरी इस ‘जजमेंट’ देनेवाली आदत को टोकती थी- ‘तुम होती कौन हो, सब क्या है, क्यों है समझा देनेवाली ?’ मेरा बात-बात पर मीन-मेख निकालना, सबको क्या, कैसे सोचना, करना चाहिए, सब क्या क्यों करते हैं, मेरी स्पष्टबयानी, उसको हैरान कर देती।
बचपन में मैं कहा करती थी कि मैं दूसरे के मन के अन्दर का खूब भाँप लेती हूँ, कब कोई डींग हाँक रहा है, कब कोई ख़ास मतलब से बात बना रहा है, कौन निर्दोष है, कौन कपटी, सब मुझसे पूछ लो। आगे चलकर वह मेरी इस प्रवृत्ति को मेरी ‘पॉलिटिक्स’ से जोड़ने लगी- ‘तुम लोगों को अपना कपट, अपनी तानाशाही नहीं दिखती ? क्या कैसे होना चाहिए, किसे क्या चाहना चाहिए, तुम तय कर देते हो।’ घंटों लड़ाइयाँ होतीं।


वैसे हमारे साथ बिताए वक्त का लेखा-जोखा कहीं है तो ज़रूर तीन-चौथाई भाग हमारी लड़ाइयों का ही हिसाब देगा। बात-बेबात जंग छिड़ जाती।
याद है मुझे इसी घर के बरामदे में सुबह-सुबह का वह चाय का दौर और लड़ाई का दौर। सामने यही पेड़ था जिस पर लाल-लाल फूल लदे हैं। प्रतिदिन तड़के ढेरों पिद्दियाँ चाँय-चाँय करती इन फूलों का पराग चूसने आ जातीं। उन्हें चोंच मारते देखकर वह मुस्कराई और मुझे कुछ खिझाती हुई बोली- ‘‘मैं तो बस पिद्दी हूँ, मज़े से चोंच मार रही हूँ, और कुछ नहीं जानती।’’


वह चिढ़ा रही थी, मैं चिढ़ गई। वैसे हमारे विचारों की टक्कर बार-बार होती ही रहती थी, इसलिए कब गम्भीर हैं, कब नहीं, इस सबसे फ़र्क कम पड़ता था। अधिकतर दोनों भावों का समावेश होता। नहीं, सच तो यह है कि ज़्यादातर चिढ़ती मैं ही थी और चिढ़कर और चिढ़ जाती। पर वह गम्भीर होते-होते छेड़ देती, फिर छेड़ते-छेड़ते गम्भीर हो जाती।
असल में मुझे किसी का भी ग़ैर ज़िम्मेदाराना अन्दाज़ बर्दाश्त नहीं कि हम तो बस जीते हैं अपने हिसाब से, अपने मज़े के लिए, अपने किए के आगे-पीछे से, दूर-दूर फैलते उसके असर से, हमें कोई मतलब नहीं।


‘‘जस्ट व्हाट डू यू मीन ?’’ मैं फूट पड़ी। ‘‘तुम्हें इस क़दर मासूम बनने का कोई हक नहीं। पिद्दी ने चोंच मारी बस बात वहीं ख़त्म हो गई, ऐसा नहीं है। बहुत-सी चीज़ें़ जुड़ी हैं इस बात से।’’
‘‘होंगी,’’ वह लापरवाही से बोली, ‘‘पर पिद्दी को क्या ख़बर या दिलचस्पी ? जो भी असर हो, वह अपना काम नहीं रोकनेवाली।’’
‘‘बस मुझे यही तुम्हारा अन्दाज़ नहीं पसन्द।’’ मैं चिढ़ती रही, ‘‘तुम जानती हो तुम पिद्दी नहीं हो, सोच सकती हो, अपने कर्म ख़ुद चुनती हो, अपने किए के असर को देखती हो, समझती हो... ?’’


‘‘यार, क्या असर-असर चीख रहीे हो ? क्या हम इतने दम्भी हो सकते हैं कि अपने और दूसरों के किए का दूर-दूर तक होता असर समझें समझ लिया ? हम तो इतना असर देख पाते हैं कि तुम्हें थप्पड़ मारा तो तुम रो पड़ीं, जो हमें बुरा लगा। इसलिए हमने ठान लिया कि अब थप्पड़ नहीं मारेंगे। बस।’’
‘‘जीऽऽ नहीं’’, मैंने ताने-भरी आवाज़ में कहा, ‘‘थप्पड़ मारा तो इतना-सा ही नहीं होता कि हम रो पड़े। और भी असर हो सकते हैं। थप्पड़ देकर बच्चे को ज़हर खाने से रोका जा सकता है, थप्पड़ देकर ‘हिस्टीरिया’ ठीक किया जा सकता है, आप हमें थप्पड़ मारें तो यह भी हो सकता है कि हम आपकी असलियत को समझ लें और यह निर्भरता छोड़, बाहर निकलें, औरों को दोस्त बनाएँ।’’


‘‘तो फिर’’ वह मानो जीत रही हो, ऐसे बोली, ‘‘हमारी बात सही है। जब यह भी हो सकता है, वह भी हो सकता है तो कब क्या हो सकता है, हम क्या जानें ? कहाँ से अपने को ऐसा सर्वज्ञानी समझ लें ? और हम तो यह भी नहीं मानते कि हमें चुनने की भी उस पिद्दी से ज़्यादा आज़ादी है।’’
‘‘यार, गधी की तरह बात न करो। हम ‘पैटर्न्ज़’ देखते हैं, अन्दाज़ लगाते हैं कि किन तत्त्वों का साथ होना कैसा प्रभाव, कैसा विस्फ़ोट पैदा कर सकता है।’’
‘‘सुनिए आप गधी हैं, इसलिए स्पष्ट अन्दाज़ लगा लेंगी और गलत साबित होंगी। वरना आपके अन्दाज़ भी रोज़ बदला करेंगे। रहने दीजिए, हमें इन बेवकूफ़ियों में सिर खपाने की फ़ुर्सत नहीं। हम पिद्दी ही ठीक हैं। हमारा मन चाहता है फूलों का रस लेने को और हम प्यार से वही करते हैं। इससे आगे हमारा कोई दावा नहीं।’’
‘‘दावा हो या न हो,’’ मुझे गुस्सा आए जा रहा था, ‘‘आपके चोंच मारने का मकसद है। एवरी ऐक्ट इज़ अ पॉलिटिकल ऐक्ट, आपको यह देखना ही पड़ेगा।’’
‘‘नहीं देखते हम।’’ उसने शैतानी से कहा।


‘‘तो भी हर ऐक्ट पॉलिटिकल ऐक्ट है। आपका यह न मानना भी इज़ अ ब्लडी पॉलिटिकल ऐक्ट।’’
उसके स्वर में हल्की-सी थकान छलक आई, ‘‘तो फिर आपका यह कहना कि एवरी ऐक्ट इज़ आ पॉलिटिकल ऐक्ट कुछ ऐसा ही मतलब रखता है कि हम सब जी-जी के मर रहे हैं या हर पल मरते-मरते ही जी रहे हैं। यह क्यों न कहूँ कि एवरी ऐक्ट इज़ अ मॉरल ऐक्ट ?’’
‘‘यार,’’ मैं जल-भुन रही थी, ‘‘क्यों मेरी बातों को इस तरह दोहराती हो कि शब्द वही रहें, पर मायने हास्यास्पद हो जाएँ ?’’
इस पर उसने आँखें फाड़ी, ‘‘वाह जी वाह ! मेरे कथ्य की अर्थहीनता आपको फ़ौरन समझ आ गई, अपनी बात की क्यों नहीं ? आप ज़रा मेरे किसी भी कथन को गलत साबित तो करिए।’’


‘‘देखो,’’ मैं समझाते लहजे में बोली, ‘‘हुज्जत करोगी तो हर बात इतनी व्यापक, इतनी अस्पष्ट हो जाएगी कि सच होकर भी बेमाने हो जाएगी।’’
तब वह गम्भीर हो गई, ‘‘हाँ, यही मुझे कहना है कि ये सारे कथन वहीं तक सही हैं जहाँ तक वे इतने व्यापक हैं कि बेमाने हैं। जहाँ इनमें कुछ अर्थ आने लगता है, वह ख़ास मेरा या तुम्हारा अर्थ हो जाता है। हमारी अपनी-अपनी समझ, नैतिकता की, राजनीति की, जीवन की, वह उसमें घुस जाती है। एक बात और, जब मेरी ख़ुद की समझ भी स्थिर नहीं, बदल सकती है, तो कैसे मैं अपने यकीन पर ही भरोसा करूँ ? ठीक है भई, आज यह मानती हूँ पर कम से कम यह सतर्कता तो रहे कि कल कुछ और मानने लग सकती हूँ ?’’
‘‘मुझे तुम्हारी यह लपेटवाँ दलीलें नहीं पसन्द,’’ मैंने झुँझलाकर कहा, ‘‘फिर तो कुछ भी करती रहो, फ़र्क क्या पड़ता है ?’’


‘‘क्यों, मुझे फ़र्क पड़ सकता है। मैं नहीं जानती यह मेरी नियति ही है कि मैं पिद्दी रहूँ, शायद मजबूरी है कि इन्हीं फूलों में चोंच मारूँ, पर मुझे रस मिलता है। कुछ फूलों में ज़्यादा मिलता है। तो खुशी से करती हूँ। अब मुझे पढ़ने में वह शौक नहीं है जो ख़ुद जाकर, नई पुरानी चीज़ों को जानने में तो...’’
इसीलिए उसने पढ़ना बन्द कर दिया था। बी. ए. में ही उसे इस परीक्षा- केन्द्रित पढ़ाई की निरर्थकता समझ आ गई। बोली, ‘‘एम. ए. की डिग्री से मेरा क्या वास्ता, जो करना है वह फ़ौरन क्यों न करूँ ?’’ तब वह वाइल्ड लाइफ़ प्रेज़र्वेशन सोसायटी के लिए काम करने लगी। नौकरी उसने कई दफ़े बदली पर हमेशा ही पर्यावरण की समस्याओं से जूझनेवाली किसी संस्था से जुड़ी रही। इन्हीं मसलों पर लिखती रही।


तब भी मुझे रश्क हो आया था, क्योंकि इस शिक्षा-प्रणाली को बेकार मानते हुए भी मेरे मन में एम.ए. की डिग्री होना एक अनिवार्य बात थी। हालाँकि सच, उस डिग्री ने मुझे आज कुछ नहीं दिया है। ऐसी भी नहीं है कि फ्रेम करके ड्राइंगरूम की दीवार पर ही टाँग दूँ।
पर और जो भी व्यर्थता मुझे समझ आए अपने ‘कॉज़’ के लिए हमेशा खड़ी हुई। वह हँसकर कहती, ‘‘क्यों नहीं तुम लाल कलम से लिखने लगतीं, मिशनरी बहन ?’’
मैं भी हँस देती पर मुझे अच्छा नहीं लगता, ‘‘क्या फ़ायदा कुछ सोचने का, अगर उसे काम में न लाओ ?’’
‘‘फिर वही बात। काम में तो वह ख़ुद-ब-ख़ुद रिस आता है, हमें कोशिश नहीं करनी पड़ती। इसमें कहना क्या है ? अपना काम किए जाओ, उसके बारे में इतना ढिंढोरा क्यों ? विनम्रता भी कोई चीज़ है, दुनिया चलती है, हमारी- तुम्हारी सोच से नहीं, सहस्रों अदृश्य ताकतों के तहत, जिन्हें समझते-समझते तुम खत्म हो जाओगे और दुनिया आगे बढ़ चुकी होगी और जो आएँगे वे फिर समझते-समझते जान दे देंगे।’’


‘‘तो आप कौन-सा बड़ा तीर मारने में जान दे देंगी ?’’ मैं बिफरकर बोली।
‘‘मुझे बड़ा तीर मारना ही नहीं है। मैं बड़े तीर मारती ही नहीं।’’
‘‘अय्याश कहीं की !’’ यह शब्द मुझे मिशनरी कहने का मेरा बदला होता, ‘‘बस जिओ ख़ुद के लिए, स्वार्थ के लिए।’’
‘‘अच्छा...ऽ...ऽ...ऽ,’’ उसने मासूमियत के अन्दाज़ में पूछा, ‘‘तुम सब तो दूसरों के लिए जीते हो न !’’ वह मेरे कमरों में रखे ताम-झाम पर नज़र फेरती, ‘‘यह सब चीज़ें तो उस परोपकार की तैयारी में हैं, किसी निजी मोह में थोड़ी हैं, क्यों ?’’


‘‘देखो, फिर मखौल उड़ाने लगी। मैं जीवन में एक ‘फ़ोकस’ होने की बात कर रही हूँ, ऐसा कुछ नहीं कह रही कि...’’
‘‘न मैं ऐसा कुछ कह रही हूँ,’’ उसने बीच ही में काटा, ‘‘मेरा ‘फोकस’ जीवन है, तुम्हारा जीवन के बाहर कुछ...। मैं जीना चाहती हूँ इत्मीनान से, तुम लोगों की राय के बिना।’’
पर उसका स्वर मेरा पारा गरम ही रखता- ‘‘सच ब्लडी इनडिफरैंस मैडंस मी। मैं जीती हूँ, बाकी मरें-कटें, भाड़ में जाएँ, सब जायज़ !’’
‘‘क्यों, भाड़ में क्यों जाएँ ? मैं बचा सकती हूँ तो बचा लेती हूँ। ओड़िसा में जितनों को खींच पाई थी, पानी से निकाल लाई। पर हाँ, यह नहीं कहूँगी कि लोग मर-कट रहे हैं और तुम शॉपिंग करने चलीं !’’


यह कटाक्ष मुझ पर था। कॉलेज के दिनों में हम लोगों ने साम्प्रदायिक दंगों के खिलाफ़ एक शान्ति-मार्च की व्यवस्था की थी। वह बस में मिली तो मैंने कहा, ‘चल रही हो न।’ ‘जूते फट गए हैं, नए खरीदने जा रही हूँ’ वह बोली। और मैं आपे में न रही, ‘तुम्हें शर्म नहीं आती ? लोग मर-कट रहे हैं और तुम शॉपिंग करने चलीं !’
‘‘यह क्यों होता है कि तुम मेरी बात को हमेशा अतिरंजनावाले उदाहरण देकर बताती हो और अपनी को सहज, सँभले, योग्य तर्कों से ?’’ मैं संजीदा हो जाती।


अचानक वह प्यार से बोलने लगती- ‘‘दोस्त, तुम्हारी ईमानदारी पर आरोप नहीं लगाती पर यह तो समझो कि सहृदयता, लगन, परोपकार, तुम्हीं लोगों की बपौती नहीं है। अपनी बौद्धिक आक्रामकता का ज़रा भी अन्दाज़ है ? हर चीज़ का मतलब तुम्हारे लफ़्जों में- बुर्जुआ, लुम्पेन, क्या-क्या। हालत यह कि जमादारिन रोए तो आप लोग ज़ार-ज़ार आँसू बहाएँगे। मिस लिली रोएँ तो हिकारत से फब्तियाँ कसेंगे- ‘भई इन्हें इंगलैंड के आराम याद आ रहे हैं !’ पर ढूँढ़ो...तो भी तुम्हारे गुट में दो जन ऐसे न मिलेंगे जो किसी गरीब के संग दो दिन इज़्ज़त-स्नेह से रह पाएँ। पॉलिटिकल ऐक्ट, पॉलिटिकल ऐक्ट चीखते हो। होगा साला पॉलिटिकल ऐक्ट सब कुछ। तुम्हारा यह जम्हाई लेना भी...क्योंकि शायद यह तुम्हारी सामाजिक स्थिति, तुम्हारे वर्ग से ताल्लुक रखता है, मज़दूर की रात की ड्यूटी की थकान का प्रतीक है या...’’ वह अपनी सूझ पर मुस्कराई, ‘‘या पूँजीवाद की बू तो नहीं आ रही ? रात-भर की अय्याशी के बाद का हैंगओवर तो नहीं यह...?’’


मैं फिर लाल-पीली होने लगती, ‘‘क्या होगा संसार का जब तुम जैसे अनास्थावादी बढ़ेंगे ? भगवान नहीं, हैवान नहीं, कोई कॉज़ नहीं, तो जियो ही क्यों ?’’
‘‘क्यों ? जीने के लिए नहीं जी सकते ? हर डकार, हर मुस्कान का पॉलिटिकल मुआवज़ा नहीं लेना चाहती, बस। भरपूर जीना चाहती हूँ। तुम क्या समझती हो तुम्हारे जैसा कॉज़ न हो तो शान्ति, खुशी, प्यार, इनकी चाह मर जाएगी ?’’
दो अलग धरातलों से बात हो तो नतीजा कभी मिलनेवाला नहीं। लड़ते रहते और जबरन नेचर्स कॉल या ऐसी ही किसी अजेय तीसरी शक्ति का हवाला देकर लड़ाई स्थगित हो पाती।
अन्तहीन लड़ाइयाँ।


नहीं, आज वह मिलती तो हम कतई दोस्त न बनते, अब तक हमारे नज़रिए हम पर पूरी तरह हावी हो चुके थे, ठोस हो गए थे, हम शायद दुआ-सलाम भी न कर पाते।
यह भी वह कहती थी, ‘‘गुटबाज़ी का ज़माना है, अपने गुट के बाहर कोई नहीं जाना चाहता। दूसरों की भाषा ही उसे अलग लगती है। बस गुटबन्दों से बोलो, उन्हें ही शाबाशी दो, और कोई न सुनता है, न समझ सकता है।’’
‘‘हाँ, और क्या,’’ कभी-कभी मैं भी न चूकती, ‘‘तभी तो तुम अपनी बात कर रही हो, मेरी कुछ नहीं सुन रहीं, समझना तो दूर।’’
पर बचपन की दोस्ती कुछ ऐसी नींव डालती है कि यह सारी लड़ाइयाँ हमारी अन्तरंगता का प्रतीक ही थीं। हमारी राजनैतिक विचारधारा कुछ भी हो- और वह तो अपनी कोई विचारधारा मानती ही नहीं थी- उस सबके ऊपर एक ‘हाथ’ था जिसने इशारा कर दिया था कि दोस्त हो और खोल के सब रख दो। याद नहीं पड़ता कि कुछ भी एक-दूसरे से कहने में सकुचाते रहे हों। खोपड़ी पर सवार होना हो तो, दिल दुखा दें तो।


जैसे जब उसके भाई के लिए लड़की देखी जा रही थी। मैंने पूछा, ‘‘कैसी थी ?’’ बोली, ‘‘मिलनसार।’’ मैंने पूछा, ‘‘देखने में ?’’ बोली, ‘‘ठीक है, दाँत अजीब हैं।’’ दाँतों का क्या ज़िक्र करूँ, बचपन से उन्हें लेकर रोती रही हूँ टेढ़े-मेढ़े, ठीक असली मोतियों जैसे। नसीब को बहुत कोसती तो वह दिलासा देती, ‘‘बेवकूफ़, अच्छे लगते हैं, यह क्या कि बोरिंग, सीधी कतार हो।’’ तो जब वह बोली दाँत अजीब हैं, मेरा पीड़ित हृदय कराह उठा- ‘‘आह, मेरी तरह।’’ बोली, ‘‘नहीं, उसके बाहर को नहीं निकले हैं !’’
ज़ाहिर है तब भी लड़ पड़े थे। हर उल्लू-पंथी की बात पर लड़ पड़ते।
गोआ याद आ गया। कितने झगड़े हुए वहाँ। कितना आनन्द भी आया था।


उसी ने लिखा था, चलो मिलें, न तुम्हारे घर, न मेरे, किसी तीसरी जगह, अपनी रोज़ की चिल्ल-पों से अलग। जगह उसी ने चुनी, उसे समुद्र से कितना लगाव था।
बस से उतरकर मैंने इधर-उधर ताका, कहाँ है जी बीच ? उसने अधीरता से मेरी बाँह खींची और एक सड़क पर चल दी। कितने अचानक सड़क का छोर आ गया और सामने खुला था लाइफ़ साइज़ पिक्चर पोस्टकार्ड ! गोआ का समुद्र देखते ही बनता है। वहीं बीच पर हम ठहरे, ‘पाम ग्रोव’ होटल में, बातों का ओर-छोर नहीं, मस्ती की मियाद नहीं। बस हम और रेत और समुद्र और फ़ेनी और झूमते लोग और ललक, केवल खुशी की ललक।


एक दिन चलते चले गए थे। हाथ पकड़े हुए, जहाँ समुद्र पाँव से बार-बार लिपटने आ जाता, वहाँ। फ़ोर्ट अगुआडा से कालंगूट से बागा तक। एक तरफ़ रेत, दूसरी तरफ़ अनन्त सागर। मैं बेहद घबराती हूँ सागर से। कुछ इतना सिहरता है वह, कुछ इतना ज़िन्दा है वह कि उसको समझ नहीं पाती, उससे घिरती चली गई तो क्या होगा, क्या हो सकता है...? न जाने कौन-सा विश्व है वहाँ ! पर उस दिन ? उस दिन की बात और थी। नशे का दौर था। एक तरफ़ रेत, दूसरी तरफ़ फैली असीम ममता जो बार-बार पुलकित होकर पैरों को चूमने लगती, स्नेह से आलिंगन में भरे जाती थी। लहरों के बजते सुरों में मानो हम एकदम सुरक्षित हो गए थे, मानो बस बढ़ते जाना है और धीरे-से समुद्र की तरफ़ घूम जाना है, और भीतर, उसके बाहुपाश में, इसी तरह, दो दोस्तों को, जो हाथ में हाथ दिए चले जा रहे थे।


फिर बागा बीच पर किसी ने डाँट दिया था, लो टाइड है, जब सागर शान्त दीखता है पर सबसे खतरनाक होता है, सबको अपने में समेट लेता है।
वहीं कहीं अंजना बीच पर कुछ हिप्पी नाच रहे थे और हम मदहोश बैठे थे कि मैंने पूछ लिया, ‘‘क्या टाइम है ?’’
मानो उसकी कविता में बाधा पड़ गई। वह बरस पड़ी...‘‘टाइम, टाइम से क्या मतलब तुम्हें ? यहाँ टाइम की क्या जगह है ? यह टाइमलैस गोआ है पर तुम हो कि यहाँ भी टाइम...टाइम...’’
और वहीं किसी शाम कालंगूट बीच पर हम गोआ की मछुआरिनों की तरह पीठ समुद्र की तरफ़ करके उसके एकदम करीब बैठ गईं। पानी के हल्के-से हिचकोले आते और हम भी हल्के-से डोल जाते।
वह संजीदगी से बोली थी, ‘‘तुम क्यों नहीं कभी ख़ुद को भूल जाती हो, जीवन में रम जाती हो, क्यों नहीं केवल जीती हो ?’’
मैं सकपका गई, ‘‘क्या मतलब ?’’
‘‘मुझे लगता है,’’ वह बोलती गई, ‘‘तुम जीती नहीं हो, हमेशा याद करती हो। इन औरतों के संग हमें कतार में बैठे देख रही होगी। हमारे आनन्द को देख रही होगी। और बाद में याद करोगी कितना मज़ा आया था।’’
‘‘क्यों,’’ मैंने अपनी रक्षा करनी चाही, ‘‘मैं देख रही हूँ तो क्या रस नहीं ले रही ?’’


उसे शक था। किसी भी अनुभव को भोगने के लिए उसके बीच होना पड़ता है, देखने के लिए उससे पृथक हो जाना पड़ता है। ‘‘अलग हो गईं तो आनन्द से विभाजित हो गईं, आनन्द तो उसके बीच था। अलग होते ही तुम और भी कुछ देखने लगोगी। जैसे कि यह मछुआरिनें फटी फ्ऱाक पहने हैं और हम तुम पहने हैं महँगे, फै़शनेबल कपड़े। कि अगल-बगल बैठे हैं पर उनमें-हममें कितना फ़र्क है। और भी न जाने क्या-क्या जो जल्दी ही तुम्हारे अपराध-बोध को जगाएगा।’’ फिर वह मेरी तरफ़ घूमकर बोली, ‘‘क्यों तुम हर वक्त इतना ‘गिल्टी’ फ़ील करती हो ? सबका सलीब तुम्हारे कन्धों पर, यह ठेका कैसे ले लिया ?’’


मैं अपने ‘कॉज़’ पर लाँछन नहीं सह पाती- ‘‘क्यों, मैं अगर दूसरों के बारे में सोचती-विचारती हूँ तो यह कहाँ से प्रमाणित होता है कि मुझे जीने में रस नहीं ?’’
‘‘नहीं,’’ वह गम्भीर रही, ‘‘तुम कभी खुश नहीं रहोगी। हर बात की परतें कुरेदोगी, दस ऐब निकालोगी, दस दुख निकलेंगे...। सुनो, तुम्हें कभी दूसरों की वकालत करते शर्म नहीं आती, उनकी आवाज़ बनने में ‘गिल्ट’ नहीं होता ?’’
मैं गोआ बिगाड़ना नहीं चाहती थी। दब रही थी। पर इतना ज़रूर बोली, ‘‘यह सब फिर कभी। फ़िलहाल बात इतनी है कि यह साबित नहीं होता कि मैं जीवन में आनन्द लेना नहीं जानती।’’
‘‘तुम जीवन में हो ही कहाँ ? तुम तो हमेशा जीवन के बाहर हो।’’ उसने निर्णय सुना दिया।
आज मुझे लगता है जैसे हर तरफ़ सागर की तरह बहता जीवन है और केवल मैं ठोस हूँ, ठोस पत्थर, जो थिरकते सागर से अलग है, उससे बाहर है, उससे घिरा होकर भी उसमें रमा नहीं है...
और वह ? वह उस सागर में लहर है, उसी के साथ इधर-उधर उमड़ती हुई।
वह जीवन के बीच है, मैं जीवन के बाहर ? मैं देख रही हूँ वह आज भी उसी में विलीन है, क्योंकि मौत भी जीवन में है।
मौत ? यह कैसा शब्द है ? किस सहजता से लिख गई मैं ! किसी प्रियजन की मौत का ख़याल कैसा व्याकुल कर देता है। नहीं, इसे कुछ न हो...। पर ख़याल ही तो व्याकुल कर देता है। जब ख़याल नहीं, ख़ुद मौत आ जाती है तो क्या बचता है ? एक सुन्नाहट, एक शून्य ? सोचने को है ही क्या ?


वह कहती थी, तुम जीवन को केवल याद करती हो। उसे भी केवल याद करती हूँ। पर उस याद करने में और इस याद करने में फ़र्क है न कि नहीं, बताओ ? सब कितना अवास्तविक लगता है, वह भी एक ख़्वाब-सी मँडराती है। गले में अटकन-सी होती है पर तभी बड़े बेमौके उसकी हँसी सुनाई दे जाती है। रुलाई का ख़याल ऐसी बेरहमी से जुड़ गया है उसकी हँसी से कि अपने पर काबू नहीं। वह हँसती थी तो शक हो आता था कि रो तो नहीं रही, कुछ ऐसी आवाज़े़ं निकालती थी ! बस वह मज़ाक अब थमके नहीं देता। हँसने-रोने के नाम पर वह सारा अनुभव ताज़ा होकर हँसा देता है, इतने बेमौके कि फिर चोरों की तरह हँसी ख़ुद से ही छिपाने की कोशिश करती हूँ।


वैसे वह हमेशा ही गलत मौकों पर हँसती और हँसाती थी। स्कूल में खुसुर-पुसुर कर रहे हैं, क्लास में मन नहीं लग रहा। मैंने जान-बूझकर दवात नीचे खिसका दी और डेस्क के नीचे, सफ़ाई करने के बहाने, दो सिर मिले हुए हैं। सब शान्ति से चल रहा है पर आप हैं कि हँसी रोकते-रोकते हँस देती हैं और मैं चौंककर देखती हूँ हँस रही हैं या रो पड़ी हैं और ख़ुद भी हँसने लगती हूँ तो वह और खिल-खिल करने लगती हैं। बस फिर ‘बेंच पर खड़ी हो जाओ’ ‘या ‘गेट आउट ऑफ़ द क्लास !’
ऐसे ही बस से उतरने में किसी लफंगे ने हाथ फेरा। आप आग-बबूला- ‘साले तमीज़ से करो !’ जूती उतार के दो-एक सलामी दीं ज़रूर, पर साथ ही अपने मुँह से निकली फटकार पर खी-खी भी कर पड़ीं।


वाकई बड़े बेमौके हँसाती थी वह। एक बार बाज़ार तक का शॉर्ट कट मारने हम एक मैदान पार करने चले। उसके चारों ओर लगी काँटेदार फ़ेंस को लाँघने वह झुकी, दो तारों के बीच, एक पैर अन्दर, एक बाहर, और पैंट का ठीक सीट पर का कपड़ा ऊपर की तार में फँस गया। अब वह हैं- हाथ ज़मीन पर, एक पैर हवा में, और वह दिलचस्प हिस्सा, तार में अटका, ऊँचा, आसमान को घूरता, और आते-जाते लो