आज राही मासूम रज़ा की पुण्यतिथि है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर में  1 सितम्बर 1925 को हुआ। उन्होंने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से 'उर्दू साहित्य के भारतीय व्यक्तित्व’ पर पी-एच.डी. की। अध्ययन समाप्त करने के बाद अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में अध्यापन-कार्य से जीविकोपार्जन की शुरुआत। कई वर्षों तक उर्दू-साहित्य पढ़ाते रहे। बाद में फिल्म-लेखन के लिए बम्बई चले गए। जीने की जी-तोड़ कोशिशें और आंशिक सफलता। फिल्मों में लिखने के साथ-साथ वो हिन्दी-उर्दू में समान रूप से सृजनात्मक लेखन भी करते रहे। राही मासूम रज़ा फिल्म-लेखन को बहुत से लेखकों की तरह 'घटिया काम’ नहीं, बल्कि 'सेमी क्रिएटिव’ काम मानते थे। बी.आर. चोपड़ा के निर्देशन में बने महत्त्वपूर्ण दूरदर्शन धारावाहिक 'महाभारत’ के पटकथा और संवाद-लेखक के रूप में लोकप्रिय हुए।

 

राही मासूम रज़ा एक ऐसे कवि-कथाकार हैं, जिनके लिए भारतीयता आदमीयत का पर्याय रही।

 

उनकी प्रकाशित पुस्तकें : आधा गाँव, टोपी शुक्ला, हिम्मत जौनपुरी, ओस की बूँद, दिल एक सादा काग़ज़, कटरा बी आज़ूर्, असन्तोष के दिन, नीम का पेड़, कारोबारे तमन्ना, क़यामत (हिन्दी उपन्यास); मुहब्बत के सिवा (उर्दू उपन्यास); मैं एक फेरीवाला  (हिन्दी  कविता-संग्रह);  नया  साल, मौजे-गुल : मौजे सबा, रक्से-मय, अजनबी शहर : अजनबी रास्ते (उर्दू कविता-संग्रह); अट्ठारह सौ सत्तावन

 

(हिन्दी-उर्दू महाकाव्य) तथा छोटे आदमी की बड़ी कहानी (जीवनी)।


15 मार्च 1992 को उनका निधन हो गया।

 

पढ़िये 'टोपी शुक्ला' उपन्यास का एक अँश

Rahi Masoom Raza


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संसार के तमाम छोटे-बड़े लोगों की तरह टोपी भी बेनाम पैदा हुआ था। नाम की ज़रूरत तो मरनेवालों को होती है। गांधी भी बेनाम पैदा हुए थे और गोडसे भी। जन्म लेने के लिए आज तक किसी को नाम की ज़रूरत नहीं पड़ी है। पैदा तो केवल बच्चे होते हैं। मरते-मरते वह हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, नास्तिक, हिन्दुस्तानी, पाकिस्तानी, गोरे, काले और जाने क्या-क्या हो जाते हैं।


इस जगह हमें इन झगड़ों से कोई मतलब नहीं। अभी तो हमारे लिए केवल इतना जान लेना बहुत है कि टोपी ने जन्म लिया। हज़ारों, लाखों, करोड़ों दूसरे बेटों की तरह वह भी दूसरा बेटा था। एक भाई उसकी पीठ पर था और एक भाई की पीठ पर वह था।


जिस रात उसने जन्म लिया वह बरसात की एक सड़ी हुई काली रात थी। हवा बिलकुल बन्द थी। आकाश बादल से ठसा पड़ा था। एक तारे तक की जगह नहीं थी।


इधर उसकी माँ के पेट में दर्द शुरू हुआ और उधर बिजली चमकी। बादल में दरार पड़ गई। पानी की चादर गिरने लगी। ऐसा लगता था जैसे बादल ओलती में फँस गए हों। आँगन में पानी चमकने लगा। फ़्यूज़ उड़ गया। अँधेरा सम्पूर्ण हो गया।


उसकी दादी ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण’ का जाप करने लगीं कि न जाने कैसा राक्षस जन्म लेनेवाला है जिसने जन्म लेने से पहले ही अन्धेर मचा दिया था। उसके पिता डॉक्टर भृगु नारायण शुक्ला नीले तेल वाले भी काफ़ी परेशान थे। इस तूफ़ान में न दाई ही आ सकती थी और न डॉक्टरनी ही।


ग़रज कि पण्डित बलभद्र नारायण शुक्ला को रात के ठीक बारह बजे खु़द से पैदा हो जाना पड़ा। पैदा होते ही टोपी ने अपनी छोटी-छोटी आँखों से दुनिया को देखा। उसे जो चीज़ दिखाई दी वह बड़ी भयानक थी। वह डरकर रोने लगा और उस अन्धकार को ढूँढ़ने लगा जिसमें वह अब तक कुलबुलाया करता था। परन्तु इतिहास और समय का पहिया उलटा नहीं चलता। टोपी को संसार ही में रहना था जब कि यह भी सत्य है कि प्रकाश जानलेवा था। यही तो कारण है कि बड़ी-बूढ़ियाँ सौरी की कोठरी में प्रकाश और हवा दोनों ही को नहीं आने दिया करती थीं, (जहाँ बड़ी-बूढ़ियों का ज़ोर चलता है वहाँ अब भी यही होता है।)


यह बात ग़लत है कि हव्वा ने आदम को गेहूँ खिला दिया था और बेचारे इस अपराध में जन्नत से निकाले गए। जन्नत का वह पेड़ वासना का पेड़ भी नहीं है जैसा कि मानव-विज्ञान वाले कहते हैं। वह पेड़ है प्रकाश का। गुलामी, धर्म और प्रकाश का पुराना बैर है। आदम को जब प्रकाश मिला तो अल्लाह मियाँ ने उन्हें तुरन्त जन्नत से निकाल दिया।


प्रकाश का यह पेड़ कई पुरानी कहानियों में भी दिखाई देता है। पण्डितों और नजूमियों ने हिसाब लगाया और कहा कि राजकुमार वैसे तो क़िस्मत का धनी है परन्तु चौदह बरस तक इस पर चाँद और सूरज का साया नहीं पड़ना चाहिए। फिर क्या था ? एक ख़ूबसूरत वाटिका बनाई गई जिस पर एक मोटा शामियाना या तम्बू तान दिया गया। राजकुमार अपनी उन्नाओं, छूछूओं, ख़वासों, बाँदियों, कहारियों...ग़रज़ कि महल के पूरे तामझाम के साथ उस वाटिका में भेज दिया गया। एक दिन (जब चौदहवाँ बरस ख़त्म हो रहा था) राजकुमार ने देखा कि एक चमकदार चीज़ छत से ज़मीन तक उग आई है। यह उलटा पेड़ प्रकाश ही का था। प्रकाश ने तम्बू में छेद कर दिया था। बस जैसे ही राजकुमार ने प्रकाश के पेड़ को देखा वैसे ही मुसीबतें आने लगीं। नेचर सुपर-नेचुरल बनकर आई और अन-नेचुरल वातावरण में पलनेवाले बच्चे को प्रकृति से टकराना पड़ा। नतीजा यह कि अन्त में नेचर ने नेचर को पहचान लिया। बड़ी मुसीबतें आईं, परन्तु राजकुमार ने प्रकाश को हाथ से न जाने दिया। अन्त में राजकुमार और उसकी प्रेमिका का विवाह हो गया। कहानी समाप्त हुई। हो सकता है कि बाबा आदम की कहानी भी बिलकुल यही हो। जन्नत पर तने हुए तम्बू में छेद हो गया हो...बूढ़ा बादशाह राजकुमार की राह देख रहा है, क्योंकि कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है। अभी तो राजकुमार डॉक्टर वार्ड और हाइडरोजन बम और काले-गोरे और हिन्दू-मुसलमान-दंगों के जंगल में रास्ता ढूँढ़ रहा है।


परन्तु अपना बलभद्र नारायण शुक्ला न आदम था और न राजकुमार। इसलिए उसे न शैतान का डर था और न नजूमियों का। वह तो केवल पण्डित भृगु नारायण शुक्ला नीले तेल वाले का दूसरा बेटा था। इसी ‘केवल’ में टोपी के जीवन की ट्रैजिडी थी। यह कहानी सच पूछिए तो इसी ‘केवल’ की है।


डॉक्टर पण्डित भृगु नारायण नीले तेल वाले मुहल्ले-पड़ोस वालों के ख़याल में बड़े भलेमानस थे। बहुत धार्मिक आदमी थे। मन्दिर कभी-कभी जाते थे। कभी-कभार पूजा भी कर लिया करते थे। परन्तु उन्होंने शहर में एक बड़ा सुन्दर मन्दिर बनवा दिया था। उन्हें केवल एक शौक़ था - चुनाव लड़ने का। सदा हारे पर हिम्मत न हारे और हर चुनाव में खड़े होते रहे। पहले कांग्रेस के टिकट पर लड़े। हार गए। आज़ाद लड़े। हार गए। जनसंघ के टिकट पर लड़े। हार गए। पार्लामेंट से म्युनिसिपैलिटी तक का चुनाव लड़े और हारे। ऐसे हारनेवाले कहाँ मिलते हैं।


 डॉक्टर साहब फ़ारसी के रसिया और मसनवी मौलाना रूम के दीवाने थे। अक्सर ‘उर्फ़’ और ‘बेदिल’ के शेर गुनगुनाते रहते थे। धुली हुई उर्दू बोलते थे और उर्दू के कट्टर विरोधी थे। इनशा अल्लाह और माशा अल्लाह और सुबहान अल्लाह के नीचे बात नहीं करते थे। मुसलमानों से नफ़रत करते थे। परन्तु इसलिए नहीं कि उन्होंने भारत की प्राचीन सभ्यता को नष्ट किया है और पाकिस्तान बना लिया है। बल्कि इसलिए कि उनका मुक़ाबला डॉक्टर शेख़ शरफ़उद्दीन लाल तेल वाले से था। यह डॉक्टर शरफ़उद्दीन उनके कम्पाउण्डर हुआ करते थे और उनके बेटे उन्हें शर्फू चाचा कहा करते थे। शेख़ शरफ़उद्दीन ने हरकत यह की कि नीले तेल का रंग बदल दिया। बस तेल का रंग बदलकर वह डॉक्टर बन गए और भोली-भाली पब्लिक को दोनों हाथों से लूटने लगे। रंग बदलने से भी आदमी क्या-क्या हो जाता है। टोपी एक ही है। सफ़ेद हो तो आदमी कांग्रेसी दिखाई देता है, लाल हो तो प्रजा सोशलिस्ट और केसरी हो तो जनसंघी !


फिर भी डॉक्टर भृगु नारायण का कारोबार ज़ोरों पर था। नीला तेल रग-पट्ठों में जान डालता था। और आजकल के नौजवानों को रग-पट्ठों की बीमारियाँ अधिक होती हैं। नीला तेल लुजलुजे पट्ठों को तलवार की तरह सख्त बना देता था। (लाल तेल भी यही करता था !) इसलिए डॉक्टर भृगु नारायण के घर अल्लाह के फ़ज़्ल या भगवान् की दया से एक बीवी, चार नौकरानियाँ, दो नौकर, एक भैंस, दो अलसेशियन कुत्ते, एक मोटर और तीन बच्चे थे। 
परन्तु बाबू भृगु नारायण इस कहानी के हीरो नहीं हैं। डॉक्टर साहब का परिचय तो मैं इसलिए करवा रहा हूँ कि उन्हें जाने बिना पण्डित बलभद्र नारायण टोपी शुक्ला के व्यक्तित्व को समझना कठिन हो जाएगा।


टोपी की माँ रामदुलारी भी सीधी-सादी धार्मिक टाइप की घरेलू औरत थी। बड़ा भाई मुनेश्वर नारायण शुक्ला उर्फ़ मुन्नी बाबू रामराज्य परिषद् में गले-गले खड़े थे। और टोपी के छोटे भाई भैरव नारायण को कांग्रेसी बनने का शौक़ था, क्योंकि इस पेशे में ऊपर की आमदनी नीले तेल से भी अधिक थी। जब भी वह यह सुनता कि फ़ुलाँ प्रान्त का मुख्यमन्त्री मरा तो उसने सुइज़रलैण्ड के बैंकों में पचास लाख की रक़म छोड़ी। और फ़ुलाँ प्रान्त का मुख्यमन्त्री तो मुख्यमन्त्री होने से पहले बस कण्डक्टर था और अब देश के हर बड़े नगर में उसकी कोठियाँ हैं और वह कई मिलों का मालिक है, तो उसकी आँखें चमकने लगतीं और वह अपनी माँ रामदुलारी की गोद में घुस जाता और कहता-  ”हम तो मुख्यमन्त्री बनेंगे।“


”प्रभू की लीला अपरम्पार है। अवश्य बनोगे।“ वह कहतीं और यह सुनकर भैरव को यक़ीन हो जाता कि वह एक-न-एक दिन मुख्यमन्त्री अवश्य बनेगा। परन्तु वह अपने पिता से दिल की बातें कभी नहीं करता था। वह पेट-पोंछना था, इसलिए माँ का चहीता था। डॉक्टर साहब तो मुन्नी बाबू पर फ़िदा थे और मुन्नी बाबू मुन्नीबाई पर।


मुन्नी बाबू को मुन्नीबाई की एक अदा पसन्द आ गई थी। वैसे तो शहर की सौ-सवा सौ रंडियों की तरह वह भी एक रंडी थी। परन्तु मुन्नीबाई ने अपने पेशे में भी धर्म का दामन नहीं छोड़ा था। उसे मालूम था कि एक-न-एक दिन तो भगवान् को मुँह दिखलाना ही पड़ेगा। इसलिए उसने मकान की एक कोठरी में एक शिवालय बना रखा था। रोज़ सवेरे नहा-धोकर वह नटराज, भोले शंकर, भूतनाथ की पूजा कर लिया करती थी। और शाम को जब वह बत्तीसों हथियार सजाकर अपनी दूकान खोलती तो इसका ख़याल रखती कि गाना तो जो चाहे वह सुन ले परन्तु कोई शूद्र या मलेच्छ ‘रहने’ न पाए। उसे इसका बड़ा दुःख था कि एक मुसलमान ने उसका नथ उतारा था। मुन्नी बाबू इन्हीं बातों पर तो जान देते थे। वह मुन्नीबाई से दस बरस छोटे थे। परन्तु प्रेम में कहीं उम्र देखी जाती है !


यही कारण है कि जब मुन्नी बाबू के लग्न की बात चली तो उन्होंने मुँह लटका लिया। और न केवल यह कि मुँह लटका लिया बल्कि विवाह करने ही से इनकार कर दिया। डॉक्टर साहब बहुत परेशान हुए क्योंकि लड़की वाले तगड़ी असामी थे। एक लाख नक़द। एक मोटर। पाँच सेर सोना। तीन सेर चाँदी।...डॉक्टर साहब ने ऊँच-नीच पर विचार किया और मुन्नी बाबू को समझाने का फ़ैसला किया। परन्तु मुन्नी बाबू को मुन्नीबाई के सिवा भला और कौन समझा सकता था ! पाँच हज़ार लेकर मुन्नीबाई समझाने को तैयार हो गईं। वह साल-भर के लिए बम्बई चली गईं। डॉक्टर साहब ने उन्हें अपने एक मरीज़ के नाम खत भी दिया (उनका मरीज़ हीरो हो गया था।) जब मुन्नीबाई कुछ कहे-सुने बिना ही एक दिन रफ़ूचक्कर हो गईं तो मुन्नी बाबू को डॉक्टर साहब की बात मान लेनी पड़ी।


पण्डित सुधाकर लाल की इकलौती बेटी लाजवन्ती से मुन्नी बाबू का विवाह हो गया।


लाजवन्ती बड़ी अच्छी लड़की थी। बस एक आँख ज़रा ख़राब थी। बाएँ पैर को घसीटकर चलती थी। रंग ज़रा ढँका हुआ था। और मुँह पर माता के निशान थे। परन्तु इन बातों से क्या होता है ? शरीफ़ लोगों में कहीं बहुओं की सूरत देखी जाती है ! सूरत तो होती है रण्डी की। बीवी की तो तबीअत देखी जाती है। लाजवन्ती सीरत और तबीअत दोनों ही की अच्छी थी - यानी वह पण्डित सुधाकर लाल की इकलौती बेटी थी। पण्डितजी शहर के सबसे बड़े वकील थे। दस-बारह हज़ार की आमदनी थी। बड़े ज़मींदार थे। कई कल-कारखानों के हिस्सेदार थे। उनके पिताजी ने बड़े ठाठ की थानेदारी की थी। और दादा ने उससे भी ज़्यादा ठाठ की तहसीलदारी। कहते हैं कि पण्डितजी के घर में अनाज की तरह नोटों को धूप दिखलाई जाती थी। बाप-दादा ने डेढ़ सौ दूकानों और पाँच हवेलियों के अलावा सत्रह लाख का बैंक बैलेंस भी छोड़ा था। परन्तु लाजवन्ती केाई बिगड़ा हुआ मुक़दमा तो था नहीं कि वकील साहब उसे सँभाल लेते। वह तो एक बिगड़ी हुई शक्ल थी। बराबर वालों में कोई वर नहीं मिला। नीचे के लोगों ने भी लक्ष्मी की भद्दी मूर्ति पर बेटों की बलि देना स्वीकार नहीं किया। बस एक पण्डित भृगु नारायण नीले तेल वाले ऐसे मिले जिन्होंने कहा कि लक्ष्मी लक्ष्मी होती हैं।


मुन्नी बाबू और लाजवन्ती की कहानी भी टोपी शुक्ला की कहानी का अंग नहीं है। असल में मैं चाहता यह हूँ कि आप लोग उन तमाम लोगों को देख लें जो टोपी को हर तरफ़ से दबोचे हुए हैं।


परन्तु मैं यह देख रहा हूँ कि बातें कुछ बेतरतीब हुई जा रही हैं। अभी मुन्नी बाबू और लाजवन्ती के विवाह की बात बिला वजह निकल आई। तभी तो बरसात की एक काली रात में वह बच्चा पैदा हुआ है जो आगे चलकर पण्डित बलभद्र नारायण शुक्ला और उससे भी आगे बढ़कर टोपी शुक्ला बनने वाला है।


टोपी शुक्ला की सूरत खराब थी। परन्तु थे बड़े शर्मीले। नंगे पैदा नहीं हुए। सिर के बाल सारे बदन पर उगाकर पैदा हुए। नतीज़ा यह हुआ कि सुबह को जब चमाइन आई और रामदुलारी को मल-मलाकर अपने घर गई तो उसने अपने पति से कहा:
”दागदर साहब के घर बनमानुस भइल बाय।“


टोपी का सारा ननिहाल-दादीहाल खँगाल डाला गया कि पता तो चले कि यह बच्चा किस पर गया है। परन्तु दूर-दूर इस कैंडे का कोई दिखाई नहीं दिया। फिर क्या था ! सास की ज़बान चल पड़ी। बेचारी रामदुलारी हैरान कि इस बच्चे को जन्म देकर वह किस मुसीबत में फँस गई। वह तो ख़ैरियत यह थी कि जब उसकी सास को गुस्सा आता था तो वह लगभग फ़ारसी बोलने लगती थी। और रामदुलारी की समझ ही में नहीं आता था कि सास कह क्या रही है।


सुभद्रादेवी, यानी डॉक्टर भृगु नारायण शुक्ला की माँ फ़ारसी की रसिया और हिन्दी की दुश्मन थीं। उनके पिता यानी नीले तेलवाले डॉक्टर के नाना पण्डित बालमुकुन्द फ़ारसी-अरबी के स्कॉलर और उर्दू-फ़ारसी के कवि थे। सुभद्रा इकलौती बेटी थीं। उन्होंने इन्हें जी भर के फ़ारसी पढ़ाई। सुभद्रादेवी चोरी-चोरी फ़ारसी में शेर भी कहने लगीं। जिस घर में ब्याहकर आईं वहाँ भी फ़ारसी का वातावरण था। डॉक्टर भृगु के पिता खु़द उर्दू-फ़ारसी के आशिक़ थे। सुभद्रादेवी जब घर के नौकर-चाकरों से छिपाकर कोई बात कहना चाहतीं तो पति से फ़ारसी बोलने लगतीं। उन पति-पत्नी के ख़याल में हिन्दी गँवारू भाषा थी।


बेचारी रामदुलारी तो अपनी सास की घरेलू भाषा भी ठीक से नहीं समझ पाती थी। उसके घर में विद्या की परम्परा कुछ और थी। परन्तु वह इतना अवश्य समझ गई कि सास पोते की पैदाइश से खुश नहीं हैं।
उसने डरते-डरते बच्चे की तरफ़ देखा। वह अब भी उतना बदसूरत था। और अपनी बेहद ब्लैक एण्ड ह्नाइट आँखों से छत की तरफ़ देख रहा था।


रामदुलारी का कलेजा सास की बातों से पक गया। उसका दिल खट्टा हो गया। और शायद इसी खटास के कारण उसका दूध फट गया। दूध फटा हो या न फटा हो, परन्तु दूध उतरा नहीं। उसे तरह-तरह के हरीरे पिलाए गए, भाँति-भाँति के हलवे और लड्डू खिलाए गए। सैकड़ों टोने-टोटके किए गए। पीरों-फ़कीरों की ख़ुशामदें की गईं। अघोरियों की गालियाँ सुनी गईं। साधुओं के चरन छुए गए - परन्तु दूध नहीं उतरा।


उधर टोपी शुक्ला की बदसूरती ने मुन्नी बाबू का बाजार और चढ़ा दिया। जो चीज़ आती वह पहले मुन्नी बाबू को मिलती। कपड़े मुन्नी बाबू के बनते और टोपी को उनकी उतरन पहननी पड़ती। सुभद्रा देवी तो उसे अपने पास फटकने भी नहीं देती थीं। वह शायद डरती थीं कि अगर उन्होंने टोपी को छू भी लिया तो उनके चम्पई रंग पर दाग़ पड़ जाएगा। मुन्नी बाबू अलबत्ता जब देखो तब दादी की गोद में अँड़से हुए हैं। कभी दादी उन्हें ‘गुलिस्ताँ’ की कहानियाँ सुना रही हैं, कभी ‘तिलस्मे-होशरुबा’ की सैर करा रही हैं। कभी ‘रामायण’ सुना रही हैं और कभी ‘महाभारत’ के वीरों की कथाएँ याद करवा रही हैं।


अपने बलभद्र का भी जी चाहता कि कोई उसे भी इसी प्यार से कहानियाँ सुनाए। परन्तु उसके चारों ओर तो गहरा सन्नाटा था। जब भी वह किसी चीज़ के लिए ज़िद करता, डाँट दिया जाता कि कैसा निर्लज्ज बच्चा है कि बड़े भाई का दाज करता है।


नतीजा यह हुआ कि टोपी को शेख़ सादी, अमीर हमज़ा की कथा, रामायण, महाभारत - और बड़ों से नफ़रत हो गई। वह इन सबको मुन्नी बाबू की पार्टी का समझने लगा। और एक दिन तो उसने ग़जब ही कर दिया। दादी से बोला: ”दादीजी, आप उस काले-कलूटे कृष्न को पूजती हैं ना, तो एक-न-एक दिन आपकी पूजा जरूर काली हो जाएगी।“


उस दिन दादीजी को दो बातों पर गुस्सा आया। पहली बात तो यह थी कि उनका पोता ‘ज़रूर’ को ‘जरूर’ बोल रहा था। (टोपी उन्हें चिढ़ाने के लिए उनके जीवन-भर यही करता रहा।) और दूसरी बात यह कि उसने प्रभु का मज़ाक उड़ाया था। उन्होंने ताने की कमान चढ़ाकर रामदुलारी का कलेजा छलनी कर दिया। उस दिन रामदुलारी ने टोपी को जी भरके ठोंका।


टोपी घर से भाग गया।


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