घूमने-फिरने के बारे में कई सारे मिथक गढ़कर हमें डराया जाता है। रोकने के लिए समाज में बहुत सारी बाधाएँ खड़ी कर दी जाती हैं। अकेले घूमने वाली लड़कियों को एक अलग नज़र से देखते हैं लोग। अनुराधा बेनीवाल का बहुचर्चित यात्रा-वृतान्त  'आज़ादी मेरा ब्रांड' हमें बहुत तार्किक ढंग से बताता है कि जब हमारे अंदर आत्मविश्वास आ जाता है तो फिर इन बाधाओं से आसानी से पार पा लेते हैं।  'आज़ादी मेरा ब्रांड' से पढ़िए यह अंश-

 


 


Azadi Mera Brand

 

जब मैं पहली बार अकेले घूमने निकली थी पुणे से राजस्थान, एक महीने के ट्रिप पर, तब मैंने काफी हद तक जाना था कि पैसा घूमने की प्री-कंडीशन नहीं है। पैसा जरुरी है, लेकिन इतना नहीं जितना हमने बना दिया है। ज्यादातर दुनिया घूमने वाले बैक-पैकर्स अमीर घरों में पले हुए लोग नहीं होते। वे बस घूमने की आग में पके होते हैं। उन्हें सस्ते से सस्ता ठिकाना, एक छत भर की तलाश होती है। वे स्विमिंग पूल वाले होटल नहीं ढूंढते। वे पूरा दिन मूंगफली और केलों पर भी चल जाते हैं। उन्हें भारत में भी मिनरल वाटर की तलाश नहीं होती। वे ब्रांडेड कपड़े और बैग्स पर पैसे नहीं खर्चते। और नाहीं वे पैसे जोड़-जोड़ के बुढ़ापे में आरामदायक जिंदगी के ख़्वाब बुनते हैं। वे आज के लिए जीते हैं और दुनिया के सबसे खुश लोग होते हैं!


राजस्थान में बिताये उस एक महीने में मैं कई घुमक्कड़ों से मिली और उन सबमें जो बात एक जैसी थी, वह था उनका आत्मविश्वास। वह पैसों से ख़रीदा या सामाजिक रूतबे पर पला आत्मविश्वास नहीं था। खुद को जानने से आया था। अपनी मानसिकता और अपने जज्बात, अपनी ताक़त और अपनी कमजोरियां जानने से ही ऐसा आत्मविश्वास पा सकना संभव है. ऐसा नहीं है कि इन लोगों का जीवन किसी तरह से सरल था या इनके जीवन में किसी तरह के बंधन या डर नहीं थे। लेकिन इन्होंने अपने डर और बंधन को समझा था, उनको अपने जीवन में बसा लेने के बजाय उनसे पार पाने की कोशिश की थी। उन्होंने अपने जीवन की ज़िम्मेदारी खुद ली थी। कोई और नहीं था ब्लेम थोपने खातिर इनकी लाइफ में। ये अपनी ख़ुशी और अपने दुख के जिम्मेदार खुद थे। और जब आप आगे बढ़कर अपनी जिम्मेदारी आप लेते हैं तो बदल सकना आसान होता है। जब खुद ही चुनना हो तो कोई दुख क्यों चुने?


तीन महीने से दुनिया घूमती फ्लाविया मुझे जैसलमेर में मिली। फ्लाविया ब्राज़ील से थी और वह एशिया में थाईलैंड, बाली, वियतनाम और चीन होते हुए भारत आई थी। दिखने में एकदम नार्मल थी और कोई पंख भी नहीं लगे थे उसकी पीठ पर, लेकिन उसकी कहानी एकदम परियों वाली थी। फ्लाविया ने बतौर डेंटिस्ट सात साल काम करके घर ख़रीदने के लिये पैसे जोड़े थे। अपनी सारी जान काम और घर खरीदने के सपने को सच करने की कोशिश में झोंक दी थी। जब घर मिला और डाउन पेमेंट के पैसे देने का वक़्त आया तो फ्लाविया ने सोचा कि सात साल दिन-रात काम करके तो ये डाउन पेमेंट जोड़ी है, आगे बीस साल दिन-रात काम करके लोन उतारूंगी। इस घर को जीवन के सताईस साल दूंगी! घर तो अभी भी है, नेम-प्लेट अपना नहीं तो क्या हुआ? इतना काम करके भी बंधी ही रही तो क्या पाया? फ्लाविया ने घर तो छोड़ा ही, नौकरी भी छोड़ दी; और जमा पैसों से दुनिया घूमने निकल पड़ी! बाली में एक जर्मन लड़के के प्यार में पड़ी और अब जर्मनी में बसने का सोच रही थी। फ्लाविया का साथ नये-नये प्यार में पड़ी लड़की का साथ था— खुश, रोमांचित, बेखबर और दुस्साहसी! यहाँ से मैंने बेफिक्री सीखी।


पुष्कर में मिला मुझे फर्नांदो रेन्नी अपने को नंदू बुलाता था। नंदू ना कभी स्कूल गया था और नाहीं कभी दफ्तर! नंदू के हाथों में कला थी, मेटल और पत्थर को सुन्दर ज्वैलरी में तब्दील करने की। वह उसी कला के दम पर अपने देश ब्राजील से बाहर निकल दुनिया घूम रहा था। अपने हाथों से बनाई ज्वैलरी को सड़कों पे बिछा कर बेचता हुआ नंदू अपनी चालीस साल की उम्र में अस्सी से ज्यादा देशों में घूम चुका था। उसने मुझे पुष्कर में सबसे सस्ती रहने और खाने की जगह दिखाई. उसने अपने लिए बहुत जरूरी, लेकिन मेरे लिए पर्सनल सवाल पूछ लिया, “विदेशी लड़कियों को भारतीय लड़को के साथ सोने में कोई दिक्कत नहीं होती, लेकिन भारतीय लड़कियां कभी विदेशी लड़कों को भाव नहीं देती, ऐसा क्यों? भारतीय लड़कियों से तो बात करना तक मुश्किल है!” मैंने बिना अचकचाए कहा— “इस बारे में कभी सोचा तो नहीं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि हमें विदेशी लड़कों से कोई दिक्कत है। हमें तो सब लड़कों से दिक्कत है। लड़कों से नहीं, हमे यों ही कैज़ुअल सेक्स से दिक्कत है। और भारतीय लड़का तो रहेगा, एक दिन शादी कर लेगा। लेकिन विदेशी तो चला जाएगा। हम सिर्फ शादी के बदले सेक्स करती हैं!” मैं अपने दिए जवाब पर हैरान थी! खैर, अगर उसने किसी खास मकसद से वह सवाल पूछा था तो वह पूरा नहीं हुआ. यह जरूर हुआ कि मैंने एक अजनबी को नम्रतापूर्वक ‘ना’ कहना सीखा। बिना चप्पल निकाले, हाथ जोड़ कर अलविदा बोलना सीखा। अपनी मर्जी जानी और अपनी मर्जी की इज़्ज़त करना सीखा।


जैसलमेर में ही मिली मार्लुस रेगिस्तान से जुड़ी हर चीज़ की दिवानी थी। उसने सब ऊंट वालों से दोस्ती कर ली थी और उन्हीं के साथ हफ्तों-हफ्तों रेगिस्तान में घूमती रहती। मुझे उसके लिये कभी डर लगता, तो वह हंसती और कहती, “सब भारतीय लड़के मुझसे डरते हैं।“ लगभग पौने छः फुट लम्बी-तगड़ी जवान थी जर्मनी से आई मार्लुस। एकदम निडर! अकेले घर से निकलने से पहले मार्लुस की माँ ने उसे खूब सारी सलाहों के साथ एक सलाह यह भी दी थी, “अपना ढेर सारा ख्याल रखना. पागल कुत्ते तो कहीं भी हो सकते हैं, तो अगर रेप हो जाये तो प्रेगनेंसी से बचने के लिये पिल अपने साथ रखना!”


मैंने पहली बार किसी माँ को रेप होने के सिलसिले में सलाह देते हुए जाना था। मैंने या तो माओं को इस बारे में बात करते ही नहीं सुना, या सुना है कि “यहाँ/वहां इस वक्त सेफ नहीं है, बाहर मत जाओ!” लेकिन अपनी बेटी को रोकने की बजाय, हादसा होने पर क्या किया जाए— इस बारे में सलाह देना पहली बार सुना था! मार्लुस की माँ कहती है कि “रेप भी एक एक्सीडेंट है जो नहीं होना चाहिये, लेकिन होने पर शर्म की बजाय उस बारे में क्या किया जाए, यह पता होना चाहिये।” ऐसी माँ की बेटी कैसे निडर नहीं होगी? यहाँ से मैंने साहस सीखा।


फ्लाविया और मार्लुस के साथ जैसलमेर के आसपास के गाँवों में साइकिल चलाते, मार्लुस ने हमें एक जर्मन गाना सिखाया था— “mein herz tanzt”. इसका मतलब था— मेरा दिल नाच रहा है। वो दोनों तो चली गईं, लेकिन मेरा दिल नाचता रहा। मैंने पहली बार महसूस किया कि दिल का नाचना क्या होता है! मैं अकेले रेगिस्तान में घूमते, गुम होते, खोते-पाते खुश थी। वह ख़ुशी मेरी थी। उस दिन मुझे लगा कि शायद मेरी रचना प्रकृति ने घूमने के लिए की है, अकेले घूमने के लिए! यही शायद मेरी निज़ता है।

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