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Biyaban Mein

Biyaban Mein

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  • Pages: 143p
  • Year: 2005
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126710799
  • ISBN 13: 9788126710799
  •  
    सारा राय की कहानियाँ अनेक स्तरों पर सजग चेतना द्वारा रचित संसार है। उनके यहाँ भीतर की सम्पन्नता और भीतर का खालीपन, बाहर की सम्पन्नता और बाहर का उजाड़ एक-दूसरे के आमने-सामने होते रहते हैं, बल्कि एक दूसरे के बरक्स रखे आईनों की तरह वे परस्पर को कई गुना करते चलते हैं। व्यक्त और अव्यक्त यथार्थ एक-दूसरे के साथ नाजश्ुक संतुलन साधते हुए एक सम्पूर्ण अनुभव की रचना करते हैं। दृश्य, परिवेश, पात्र और अनुभव का ही नहीं, समय का भी एक पूरेपन के करीब ले जाता हुआ बोध, यानी एक साथ भंगुरता और अंतहीनता का बोध उनकी कहानियों में आपको कभी भी हो सकता है। इसी तरह किसी सीमित घटना या व्रि$या का अंतहीनता में फिसल जाना उसे एक दूसरे ही आयाम में ले जाता है और सीमित जीवन काल के आर-पार फैला अनंत समय बड़ी सहजता से आपके समय बोध का हिस्सा बन जाता है। एक साथ समय की रवानी और ठहराव का चित्र उनके यहाँ कुछ यों उभरता है - ‘‘समय के बड़े-बड़े चकत्ते तैरते हुए निकल जाते हैं, जैसे वे कुछ हों ही ना। ऐसा लगता है जैसे दिन एक-एक करके नहीं, कई-कई के झुंड में बीत रहे हों, कभी कभी पूरा एक मौसम एक अकेले दिन की तरह निकल जाता है।’’ सारा राय की ताक़त उनके बहुत बारीक, बहुत मामूली मगर उन चुने हुए ब्यौरों में है, जिन्हें वे भीतरी और बाहरी दुनिया के तानों-बानों से कुछ इस तरह बुनती हैं कि एक रहस्य सा उनके गिर्द घिर आता है। ये रहस्य उनकी कहानियों को हर बार पढ़ने पर नए सिरे से खुलता है। उनके बिम्ब, उनकी उपमाएँ हम सबकी जानी-पहचानी चीज़ों को एकदम अछूता सा कोई संदर्भ देकर ऐसा एक मायालोक खड़ा कर देती हैं जिसमें - सेमल की फलियों से उड़ती रुई बर्फ के तूफान में बदल जा सकती है, आसमान कुएँ में पड़े रूमाल में, लाल स्वेटर पहने स्कूल के फाटक से लुढ़कते-पुढ़कते बच्चे बीर बहुटियों में और ‘‘आह सारा! द होल वर्ल्ड!’’ कहते हुए पकड़ाई गई पनीर पूरी एक दुनिया में तब्दील हो जा सकती है। किसी भी सम्बन्ध को परिणति तक पहुँचाने की हड़बड़ी उनके यहाँ नहीं है। सम्बन्धों के महीन रेशों को वे हल्के इशारों से कहे-अनकहे शब्दों में, बिम्बों में थामती हैं। वो ‘बियाबान में’ कहानी की नायिका का अपने लेखन के साथ का रिश्ता हो या रश्मि किरण के साथ का, ‘परिदृश्य’ कहानी की सीमी का अनामिका और उसके भाई के साथ धीरे-धीरे अस्तित्व में आया सम्बन्ध हो, मकड़ी के जाले की सुुंदर संरचना के निमित्त, बाबू देवीदीन सहाय का अपनी रूह के साथ पहली बार स्थापित हुआ सम्बन्ध हो या अनामिका का गंगा के कछार के साथ का तादात्म्य हो - ये सम्बन्ध जितनी देर के लिए, जितने भी, जैसे भी होते हैं, अपनी सम्पूर्ण सत्ता के साथ होते हैं। गंगा का कछार अलग मौसम में, किसी दूसरे समय पर, किसी अलग मनःस्थितियों में अलग ही रूप धर ले सकता है। ‘भूलभुलैयाँ’ जैसी कहानी में वे भव्य अतीत के कोणों-अंतरों को तलाशती हैं। इस प्रक्रिया में अतीत के साथ-साथ सम्भावित का भी एक लोक खुलता चला जाता है। बनारस की साकीन नूर मंज़िल हवेली के उस प्राचीन वैभव - ‘‘जब हर कमरे में लोग अंगूर के गुच्छों की तरह होते थे’’ - के बरक्स बची थीं ‘‘किले की दीवार जैसे कंधोंवाले सैयद हैदर की बड़ी बेटी कुलसुम बानो, जिन्हें नूर मंज़िल जैसी विशाल हवेली में बंद रहने के बावजूद नाचने और नाचते नाचते लट्टू की तरह एक जगह सिमट आने के तथा छत की काई लगी काली मुंडेर से डैनों की तरह बाजुओं को फैलाकर उड़ने के एहसास से कोई वंचित नहीं कर पाया था। दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं जिससे सारा को परहेज़ हो। आज की कहानी की तरह सिर्फ लोगों को ही नहीं, सब कुछ को उनकी कहानियों में आने की छूट है। लोगों के अलावा ‘बियाबान में’ की लुटी-पिटी पुरानी खंडहर बस हो, कहीं नहीं से कहीं नहीं तक जाता पुल हो, मेक्वायरी का चार एकड़ का बीहड़ हो, गंगा के किनारे तम्बुओं, लाइटों का उग आया नया नगर हो, हरी आग की तरह सारे में फैल जानेवाली लम्बी-लम्बी घास हो, पूरी सृष्टि ही चली आती है जीवन की सी सहजता के साथ। रामबाँस पर तीस सालों में सिर्फ एक बार आने वाला फूल भी नहीं बचता उनकी आँख से। सुनहरी कलियों का वह नज़ारा मालती को एक उपलब्धि की तरह लगता है और दो दीवारों के बीच तथा मकड़ी का जाला बाबू देवदीन सहाय के साथ हमें भी एक करिश्मे की तरह लगता है। इन छोटी-छोटी चीज़ों की एक करिश्मे की शक्ल में पहचान और जीवन में इनकी जादुई उपस्थिति में सारा की गहरी आस्था है। उनके यहाँ हिंदी के पूर्ववर्ती कथाकारों की अनुगूँज के साथ खुद उनकी रोयों की तरह संवेदनशील और उड़ानक्षम भाषा का विरल संयोजन है। चीज़ों को देखने का, उसे भाषा में सहेजने का सारा का ढंग अनोखा है। चीज़ें और उनका आस-पास वही है जिसे हम सब रोज़ देखते हैं या नहीं देखते। उन्हें सारा के साथ उनकी आँख से देखना आज की हिंदी कहानी के परिदृश्य में एक अलग तरह का देखना है। ‘‘उ$पर का आकाश डालों से घटाटोप हो उठा और जमीन पर बरगद ने जड़ों के महल खड़े किए, कई-कई महल, एक दूसरे की अनुगूँज की तरह।’’ - ज्योत्स्ना मिलन

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    Sara Rai

    जन्म: 15 सितम्बर, 1956।

    शिक्षा: इतिहास में और फिर अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए.।

    साहित्यिक कार्य: पहला कहानी-संग्रह ‘अबाबील की उड़ान’ 1997 में प्रकाशित। हिंदी और अंग्रेज़ी में कहानियाँ, लेख, रिव्यू और अनुवाद अनेक पत्रिकाओं में। ‘पेंग्विन’ से प्रकशित ‘दि गोल्डेन वेस्ट चेन’ पुस्तक का सम्पादन और अनुवाद। ‘कथा’ से ‘इमेजिंग दि अदर’ और ‘हिंदी हैंडपिक्ड फिक्शन’ का सम्पादन और अनुवाद। नेशनल बुक ट्रस्ट और स्कौलैस्टिक के लिए अनुवाद। कहानियाँ उर्दू और अंग्रेज़ी में भी प्रकाशित।

    सम्मान: दो बार अनुवाद के लिए ‘कथा’ पुरस्कार। तीन भाषाओं में सहज रूप से काम करने के लिए

    ‘ए.के. रामनुजन’ पुरस्कार। 2003 में यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट ऐंग्लिया, यू.के. में चार्ल्स वॉलेस फैलोशिप। 2003 में ही ‘जापान-इंडिया राइटर्स कैरावान’ के अंतर्गत टोक्यो और यामागाता में हुई गोष्ठी में सहभागिता।

    सम्प्रति: मुंशी प्रेमचन्द मेमोरियल स्कूल का संचालन और देख-रेख।

    सम्पर्क: 12/6 ड्रमंड रोड, इलाहाबाद-211001 (उत्तर प्रदेश)।

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