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Bhupen Khakhkhar : Ek Antrang Sansmaran (Raza Pustak Mala)

Bhupen Khakhkhar : Ek Antrang Sansmaran (Raza Pustak Mala)

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Special Price Rs. 1,796

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  • Pages: 286p
  • Year: 2020, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9789389577556
  •  
    भूपेन पर पहली किताब महेन्द्र देसाई ने लिखी। गाढ़े दोस्त थे भूपेन और महेन्द्र। लिखने वाला हो महेन्द्र जैसा औघड़, और लिखा जा रहा हो भूपेन जैसे खिलन्दड़े और उस की कला पर, तो किताब असामान्य होनी ही थी। हुई। विलक्षण, मस्त, अपने विषय की आत्मा में प्रवेश करने को आतुर और, उसी कारण, अपनी विश्वसनीयता के प्रति लापरवाह। अकारण नहीं कि इस से बिलकुल उलट संवेदना से लैस अँग्रेज़ टिमथी हाइमन ने महेन्द्र की किताब से बहुत कुछ पाने के बावजूद महेन्द्र के वर्णन को 'गार्बल्ड’ कहा। काश! मैं भी देखने, सोचने और लिखने में महेन्द्र जैसा दुस्साहस बरत पाता। भूपेन पर दूसरी किताब है इन्हीं टिमथी हाइमन की। ब्रिटिश कलाकार, कला मर्मज्ञ और भूपेन के परम मित्र। एक पारखी की पैनी नज़र है टिमथी की किताब में। ऐसी किताब भी नहीं लिख पाऊँगा मैं। फिर भी लिख रहा हूँ। महेन्द्र जैसा फक्कड़ी सृजनशील न सही, दुस्साहस तो है ही मेरे इस प्रयास में। दोषी दरअसल भूपेन है। अपने जीते जी देश और विदेश में होने वाली अपनी प्रदर्शनियों के आधे दर्जन ब्रोशर मुझ से लिखवा कर बगैर कुछ कहे समझा गया कि मण्डन मिश्र के तोता-मैना शास्त्रार्थ कर सकते थे तो मैं अपने दोस्त के अन्तरंग संस्मरण तो लिख ही सकता हूँ। 23 साल की निरन्तर गहराती दोस्ती रही भूपेन के साथ। अनेक रूप देखे उस के। उन सब के बेबाक विवरण हैं यहाँ। वह भी है जो इस किताब को लिखने के दौरान जाना : कि भूपेन नितान्त विलक्षण लेखक है और उस के साहित्य के साथ न्याय नहीं हुआ है। —इसी पुस्तक से

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    Sudhir Chandra

    सुधीर चन्द्र

    वर्षों से सुधीर चन्द्र आधुनिक भारतीय सामाजिक  चेतना के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करते रहे हैं। राजकमल से ही प्रकाशित—हिन्दू, हिन्दुत्व, हिन्दुस्तान (2003), गाँधी के देश में (2010), गाँधी : एक असम्भव सम्भावना (2011), रख्माबाई : स्त्री, अधिकार और क़ानून (2012), बुरा वक्त अच्छे लोग (2017) के बाद हिन्दी में यह उनकी छठी पुस्तक है।

    अँग्रेज़ी में उनकी पुस्तकें हैं : डिपेंडेंस एण्ड डिसइलूज़नमेंट : नैशनल कॉशसनेस इन लैटर नाइन्टींथ सेंचुरी इण्डिया (2011), कांटिन्युइंग डिलेमाज़ : अण्डरस्टैंडिंग सोशल कांशसनेस (2002), एस्लेव्ड डॉटर्स : कॉलोनियलिज़्म,

    लॉ एण्ड विमेन्स राइट्स (1997) और

    द ऑप्रेसिव प्रज़ैन्ट : लिटरेचर एण्ड सोशल कांशसनेस इन कॉलोनियल इण्डिया (1992)।

    सुधीर चन्द्र देश-विदेश के अनेक अकादेमिक संस्थानों से सम्बद्ध रहे हैं।

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