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Bhoogol Ke Darwaje Par

Bhoogol Ke Darwaje Par

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  • Pages: 116p
  • Year: 2014
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126726080
  •  
    तरुण भटनागर हिन्दी के उन थोड़े से रचनाकारों में से हैं जिन्होंने पूर्वग्रहों को तोड़ने तथा नए क्षेत्रों में कदम रखने का साहस किया, साथ ही अनूठी भाषा से और कहानी में प्रयोग के स्तर पर अपनी सशक्त पहचान बनाई। हिन्दी के समकालीन रचना संसार में तरुण भटनागर की कहानियों की प्रभावी उपस्थिति की एक माकूल वजह यही है। इन कहानियों में एक तरह का वैविध्यपूर्ण रचना संसार है जो थोड़ा अलग है और चौंकाता है। नए आस्वाद से भरी-पूरी ये कहानियाँ न सिर्फ रोचक हैं बल्कि पाठक पर अपना सशक्त प्रभाव छोड़ती हैं। विदेशी और अछूती भूमि पर घटती कथाओं से लेकर लोक और मिथकों के गिर्द बुनी गई रचनाओं तक एक विस्तृत फलक इन कहानियों में दीखता है। यह संग्रह भी, जिसमें लेखक की आठ कहानियाँ हैं, इसी तरह से अपनी मुकम्मल जगह बना रहा लगता है। पर इसकी कई आन्तरिक परतें हैं। कुछ ऐसे प्रयोग भी लेखक ने इन कहानियों में किए हैं, जिनसे इनकी एक सुस्पष्ट पहचान बनती है। ये कहानियाँ कई-कई बार उन जगहों पर पहुँचती हैं, दस्तक देती हैं जो हिन्दी कहानी लेखन में लगभग वर्जित रहे हैं। निश्चय ही यह साशय नहीं है। यह स्पष्टत: असहमति और प्रतिरोध का स्वर ही है जो अंतत: मनुष्यता के पक्ष में है। 'पतलून में जेब’, 'द रॉयल घोस्ट’, 'भूगोल के दरवाजे पर’ तथा 'चाँद चाहता था कि धरती रुक जाए’ इसी तरह की कहानियाँ हैं। इन कहानियों का हिन्दी साहित्य जगत में चर्चित होना भी इसी तरह से यानी लगभग वर्जित से क्षेत्र में सृजनात्मक दखल की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। असहमति और प्रतिक्रिया का जो स्वरूप इन रचनाओं में है, वह एकदम से लाउड न होकर बेहद संवेदनात्मक है। यह बात खासकर जंगलों पर लिखी गई कहानियों के साथ-साथ 'सब्जेक्ट फ्लैट नम्बर टू थर्टी वन’, 'लॉर्ड इर्विन ने इग्नोर किया’ तथा 'द रॉयल घोस्ट’ में दीखती है जहाँ अपने फार्म और कंटेंट दोनों स्तरों पर जबरदस्त किस्म के प्रयोग किए गए हैं। इन प्रयोगों में इतिहास तथा समय के अतिक्रमण हैं तथा दो-तीन कथानकों को उनके धुर विरोधाभासी होने के बावजूद लम्बे किस्से में गूँथने की प्रभावकारी युक्ति भी। बावजूद इसके कहानियाँ की तरलता पर इसका प्रभाव नहीं है। 'दादी, मुल्तान और टच एंड गो’ एक ऐसे विषय पर आख्यान के रूप में लिखी गई है जिस पर इधर कहानियाँ देखने को नहीं मिलीं। इन कहानियों में कई तरह के मैटाफर हैं, कहने का अनोखापन है और एक भिन्न भाषा विन्यास है जो इकहरा न होकर कई-कई बार बदलता है। संवाद, वृत्तान्त, पात्र और घटनाओं की बेहद कल्पनात्मक और रोचक जुगलबन्दी से लबरेज ये कहानियाँ बेहद रोचक और पठनीय हैं। अपने कहन और असहमति के स्तर पर प्रगतिशील संवेदनात्मक चेतना की ये कहानियाँ जीवन और आम आदमी के संकटों का दस्तावेज हैं। काव्यात्मकता से युक्त अत्यन्त सुन्दर भाषा में लिखी गई ये कहानियाँ हमारे समय के कई अनछुए पहलुओं को सामने लाती हैं। सुख, दु:ख, प्रेम, यातना, संकट, करुणा, त्रासदी, अकेलेपन और हास्य के जिन विविध रंगों को इसके पात्र जी रहे हैं, वे आधुनिक इनसान के अनुभवों और समय का जीवन्त चित्रण करते हैं। ये कहानियाँ अपने कथ्य की सार्थकता, वैविध्य, असहमतियाँ, सरल और प्रवाहपूर्ण भाषा तथा विस्तृत फलक पर मानवीय संवेदनाओं के पड़ताल की कहानियाँ हैं जो नि:संदेह रोचक हैं और पाठक के अन्तर्मन में इन तमाम वजहों से गूूँजती हैं। यह संग्रह निश्चय ही न सिर्फ पाठकों को पसन्द आएगा बल्कि अपनी एक प्रभावकारी उपस्थिति भी दर्ज करेगा।

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    Tarun Bhatnagar

    जन्म : 24 सितम्बर, 1968 को रायपुर छत्तीसगढ़ में। बचपन बस्तर, डिण्डोरी, जशपुरनगर तथा सरगुजा जिलों के जन-जातीय क्षेत्रों में बीता।

    शिक्षा : स्कूली शिक्षा छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों और कस्बों में। बस्तर से गणित और इतिहास में स्नातकोत्तर।

    जनजातीय क्षेत्रों में लगभग सात बरसों तक अध्यापन का कार्य और उसके बाद मध्यप्रदेश की राज्य प्रशासनिक सेवा में। वर्तमान में ग्वालियर में पदस्थ।

    लेखन का प्रारम्भ कविताओं से। कुछ कविताएँ विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित।

    प्रथम चर्चित कहानी 'गुलमेहँदी की झाड़ियाँ’ वागर्थ के नवलेखन विशेषांक में वर्ष 2004 में प्रकाशित।

    लगभग 24 कहानियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। कहानियाँ 'हैलियोफोबिक’ (पहल 79 तथा बाद में रचना समय में प्रकाशित), 'भूगोल के दरवाजे पर’ (क्रमश: संवेद, अन्यथा, बहुवचन तथा रचना समय में प्रकाशित) और 'श्रद्धांजलि : एक अमेरिकी मौत पर’ (हंस, जून, 2008) चर्चित रहीं।

    एक कहानी संग्रह 'गुलमेहँदी की झाड़ियाँ’ वर्ष 2008 में प्रकाशित। कुछ रचनाएँ मराठी, उड़िया और अंग्रेजी में अनूदित। कुछ अनुवाद कार्य हिन्दी से अंग्रेजी में।

    'गुलमेहँदी की झाड़ियाँ’ को युवा रचनाशीलता का वागीश्वरी पुरस्कार 2009।  कहानी 'मैंगोलाइट’ जो बाद में थोड़ा संशोधित नैरेशंस के साथ 'भूगोल के दरवाज़े पर’ शीर्षक से आई थी, शैलेश मटियानी कथा पुरस्कार से पुरस्कृत। कुछ चुनिन्दा कहानियों पर 'रचना समय’ का एक समग्र अंक जून, 2012 में प्रकाशित।

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